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साहित्य एवं शासन एक दूसरे पर परस्पर पूरक स्तंभ हैं :- कलेक्टर डॉ. गौरव सिंह

*शासन और साहित्य विषय पर पूर्व आईएएएस अधिकारियों के साथ सूत्रधार कलेक्टर डॉ. गौरव सिंह ने की चर्चा*

*प्रेमचंद, शरद जोशी, सार्त्र और वाक्लाव हैवेल जैसे साहित्यकारों विचारकों के उद्दरणों के साथ सार्थक चर्चा का हुआ आयोजन*

*लाला जगदलपुरी मंडप में हुआ आयोजन, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्वर्गीय केयूर भूषण को किया गया नमन*

रायपुर, 25 जनवरी 2026। शासन और साहित्य विषय पर आज लाला जगदलपुरी मंडप में दिलचस्प चर्चा हुई। सूत्रधार थे कलेक्टर डॉ. गौरव सिंह और अतिथि वक्ता थे पूर्व आईएएस अधिकारी श्री बीकेएस रे, श्रीमती इंदिरा मिश्रा, डॉ. सुशील त्रिवेदी और डॉ. संजय अलंग। साहित्य में गहरी दिलचस्पी रखने वाले और अपनी प्रशासनिक क्षमता से प्रदेश में पहचान छोड़ने वाले अधिकारियों ने सूत्र बताए कि किस तरह साहित्य शासन-प्रशासन को जनकल्याण के लिए लगातार सकारात्मक दिशा में लेकर जाता है। कलेक्टर डॉ. गौरव सिंह ने कहा कि साहित्य समाज को जगाता है। डॉ. सिंह ने कहा कि अगर साहित्य केवल प्रशंसा करता है तो वो कमजोर हो जाता है और शासन यदि केवल नियंत्रण करता है तो वो कठोर हो जाता है इसलिए लोकतंत्र की असली ताकत यही है कि आलोचना को सुना जाए और संवेदना को नीति में बदला जाए। उन्होंने हिंदी साहित्य के इतिहास के प्रसंग बताते हुए कहा कि किस प्रकार वीरगाथा काल में कवियों ने राष्ट्रबोध जगाया और भक्तिकाल में उन्होंने वो मानक बताये जिससे शासन को चलाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि साहित्य हमेशा केंद्र में रहा है और साहित्यकारों ने अपने प्रखर विचारों को हमेशा रखा। इस मौके पर डॉ. सुशील त्रिवेदी ने कहा कि साहित्य की शक्ति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि स्वतंत्रता संग्राम में हमारे अनेक नेता साहित्यकार रहे। उस दौर में अंग्रेजों की आलोचना करने वाले साहित्यकारों की किताबों पर बैन लगाया गया। यह साहित्य की शक्ति है। उन्होंने दिनकर को उद्धृत करते हुए कहा कि जब राजनीति फिसलती है तो साहित्य उसे संभालता है। यह साहित्य की बड़ी शक्ति है। डॉ. संजय अलंग ने कहा कि साहित्यकार जो देखते हैं उसे लिख देते हैं यह आलोचना भी होती है और प्रशंसा भी होती है। नमक का दरोगा कहानी पढ़े तो ये ईमानदार अधिकारी की कहानी है और इस कहानी ने न जाने कितने लोगों के भीतर ईमानदारी के भाव भरे लेकिन सिस्टम में विसंगतियों को भी अनेक कहानियां अथवा निबंध सामने लाते हैं। उन्होंने शरद जोशी के लिखे व्यंग्य लेख जीप पर सवार इल्लियां का जिक्र किया। श्रीमती इंदिरा मिश्रा ने लेखिका तसलीमा नसरीन का जिक्र किया कि उन्होंने सच्चाई को सामने लाने की हिम्मत दिखाई और उन्हें निर्वासन सहना पड़ा। साहित्य सच को सामने लाता है और समाज को आइना दिखाता है। साहित्य संवेदनशीलता लाता है और जनकल्याणकारी शासन की नींव तैयार करता है। इस मौके पर बीकेएस रे ने कहा कि साहित्य हमारे मनोविज्ञान को बदलता है और एक संवेदनशील मनुष्य बेहतर प्रशासक बनता है। श्री रे ने फ्रांस के स्टूडेंट मूवमेंट का उदाहरण बताते हुए कहा कि नोबल पुरस्कार प्राप्त जीन पाल सार्त्र के नेतृत्व में हो रहे मूवमेंट को रोकने कैबिनेट के बैठक में चर्चा चली। जब किसी ने सार्त्र को गिरफ्तार करने की बात कही तो चार्ल्स डी गाव ने कहा कि हम इस सदी के वाल्तेयर को गिरफ्तार करने का जोखिम नहीं उठा सकते। यह साहित्य की शक्ति है। श्री रे ने वाक्लाव हैवल जैसे विचारकों के प्रमुख उद्दरणों को रखा और इसके माध्यम से अपनी बात कही। सूत्रधार डॉ. गौरव सिंह ने अंत में चर्चा के निष्कर्ष के रूप में कहा कि साहित्य संवेदनशीलता प्रदान करता है समझ प्रदान करता है इसलिए हर युग में वो केंद्र में रहा है। उन्होंने कहा कि रायपुर साहित्य उत्सव जैसे आयोजनों से साहित्य के प्रति लोगों की जागरकूता बढ़ाने में मदद मिलती है।

इस अवसर पर उप संचालक श्री सौरभ शर्मा ने शासकीय गमछा पहनाकर स्वागत किया एवं संयुक्त संचालक श्री हीरा देवांगन ने प्रतीक चिन्ह प्रदान किया। साथ ही कुछ नवोदित साहित्यकारों के पुस्तक का विमोचन भी किया गया।

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