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क्या रावण था दुनिया का पहला कांवड़िया? जानें कांवड़ यात्रा से जुड़े चौंकाने वाले रहस्य

Kanwar Yatra: सावन (श्रावण) का पवित्र महीना शुरू होते ही सड़कें ‘बम-बम भोले’ और ‘हर-हर महादेव’ के जयकारों से गूंज उठती हैं. केसरिया वस्त्र धारण किए लाखों कांवड़िए गंगाजल भरकर शिवलिंग पर अर्पित करने के लिए मीलों पैदल यात्रा करते हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि कांवड़ यात्रा की शुरुआत कब हुई और सबसे पहले कांवड़ यात्रा किसने की थी? भारतीय लेखक और मोटिवेशनल स्पीकर अक्षत गुप्ता ने इस विषय पर एक वीडियो साझा किया, जिसमें उन्होंने कांवड़ यात्रा की परंपरा से जुड़ी एक रोचक पौराणिक कथा बताई.

कौन था दुनिया का पहला कांवड़िया?

अक्षत गुप्ता के अनुसार, दुनिया का पहला कांवड़िया स्वयं रावण था. उन्होंने बताया कि जब रावण विद्वान बनने की प्रक्रिया में शास्त्रों का अध्ययन कर रहा था, तब उसे भगवान शिव और समुद्र मंथन की कथा के बारे में पता चला. समुद्र मंथन के दौरान निकले भयंकर हलाहल विष का पान करने के बाद भगवान शिव का कंठ नीला पड़ गया था. विष की तीव्र गर्मी के कारण उनके शरीर में असहनीय जलन होने लगी. इस जलन को शांत करने के लिए सभी देवी-देवता लगातार भगवान शिव पर जल अर्पित कर रहे थे.

यह जानने के बाद रावण के मन में पहली बार भगवान शिव के प्रति सच्ची भक्ति जागृत हुई. उसने संकल्प लिया कि वह गंगाजल लाकर भगवान शिव का जलाभिषेक करेगा. इसके लिए उसने एक स्थान पर शिवलिंग की स्थापना की, लेकिन वहां गंगा नदी नहीं थी.

इसके बाद रावण लंबी पैदल यात्रा करके गंगा से जल लेकर आया. उसने एक बड़े पात्र में गंगाजल भरा और वापस लौटकर शिवलिंग का जलाभिषेक किया. साथ ही उसने यह प्रण लिया कि वह दुनिया के किसी भी स्थान पर रहे, लेकिन गंगाजल लाकर भगवान शिव का अभिषेक अवश्य करेगा. मान्यता है कि रावण के इसी संकल्प से कांवड़ यात्रा की परंपरा की शुरुआत हुई.

एक कथा के अनुसार, भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम को भी पहला कांवड़िया माना जाता है. पौराणिक कथा के अनुसार, सहस्त्रबाहु का वध करने के बाद उनके पिता ऋषि जमदग्नि ने उन्हें प्रायश्चित करने और भगवान शिव की आराधना करने का निर्देश दिया. इसके बाद भगवान परशुराम गढ़मुक्तेश्वर (ब्रजघाट) से पवित्र गंगाजल लेकर उत्तर प्रदेश के बागपत स्थित पुरा महादेव मंदिर पहुंचे और वहां शिवलिंग का जलाभिषेक किया. मान्यता है कि सावन के महीने में गंगाजल लाकर भगवान शिव का अभिषेक करने की परंपरा यहीं से प्रारंभ हुई.

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