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अफ्रीकन बोयर नस्ल से सरगुजा में बकरी पालन बना आर्थिक सशक्तिकरण का आधार

कृत्रिम गर्भाधान के नवाचार से ग्रामीणों को मिलेगी अतिरिक्त आमदनी

अम्बिकापुर 02 मई 2025/ जिले में ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने और गरीब किसानों की आय में बढ़ोतरी के उद्देश्य से बकरी पालन को बढ़ावा देने की दिशा में प्रशासन ने अभिनव पहल की है। अब जिले में जल्द ही अफ्रीकन नस्ल ’बोयर’ के बकरा-बकरी नजर आएंगे, जिनका वजन स्थानीय नस्ल की तुलना में तीन से चार गुना अधिक होगा है। इससे ग्रामीणों को अतिरिक्त आय का सशक्त माध्यम मिलेगा।
बकरी पालन आर्थिक रूप से कमजोर और छोटे किसानों के लिए ’एटीएम’ की तरह कार्य करता है। इसे पालना आसान होता है और जरूरत पड़ने पर बेचकर तत्काल नकद आय अर्जित की जा सकती है। स्थानीय नस्ल के बकरों का अधिकतम वजन 20 से 25 किलोग्राम तक होता है, लेकिन अब कृत्रिम गर्भाधान से अफ्रीकन बोयर जैसे भारी भरकम नस्ल के बकरा-बकरी पालने की सुविधा उपलब्ध होगी, जिनका वजन 80 से 100 किलो तक होता है।

प्रशासनिक पहल से नवाचार को मिला बल
कलेक्टर श्री विलास भोसकर के निर्देश पर पशुपालन विभाग द्वारा 7800 सीमेन डोज मंगवाए गए हैं, जिनमें भारतीय नस्ल जमुनापारी, सिरोही, बारबरी के साथ पहली बार अफ्रीकन बोयर नस्ल के सीमेन भी शामिल हैं। ये सीमेन उत्तराखंड लाइव स्टॉक डेवलपमेंट बोर्ड, ऋषिकेश के माध्यम से उपलब्ध कराए गए हैं। इस योजना में जिला पशु रोगी कल्याण समिति से भी आर्थिक सहयोग मिला है।
वरिष्ठ पशु चिकित्सक डॉ. सी.के. मिश्रा ने बताया कि, यह पहली बार है जब अफ्रीकन बोयर नस्ल का सीमेन सरगुजा में उपलब्ध कराया गया है। सफेद रंग की इस नस्ल का गला और सिंग तक का भाग कत्थई रंग का होता है। वजन अधिक होने के कारण बकरी पालन से ग्रामीणों को लाभ भी अधिक मिलेगा।

अफ्रीकन बोयर नस्ल का बकरा अधिक वजन, अधिक दाम
बाजार में बकरा मीट 500 रुपये प्रति किलो की दर से बिक रहा है। ऐसे में अगर एक बकरा 100 किलो का होता है तो उसकी बिक्री से किसान को 50 हजार रुपये तक की आय हो सकती है। पहले स्थानीय नस्ल से अधिकतम 10-15 हजार रुपये की ही आय होती थी।

सफल नवाचार से जिले के हर ब्लॉक में विस्तार
छत्तीसगढ़ राज्य में सबसे पहले सूरजपुर और सरगुजा जिले में बकरियों में कृत्रिम गर्भाधान की शुरुआत की गई थी। अब इस नवाचार को मिली सफलता के बाद सरगुजा जिले के सभी विकासखंडों में इसे लागू कर दिया गया है। इससे ग्रामीणों को बेहतर नस्ल की बकरी पालने और उससे अधिक आय प्राप्त करने का अवसर मिल रहा है।

बकरी पालन से अब आत्मनिर्भरता की ओर कदम
यह पहल न केवल ग्रामीणों को अतिरिक्त आय प्रदान कर रही है, जिससे बकरी पालक आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बना रहे है। प्रशासन और पशुपालन विभाग के संयुक्त प्रयास से अब बकरी पालन सिर्फ आजीविका नहीं, बल्कि समृद्धि का जरिया बनता जा रहा है।

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