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ट्रंप के टैरिफ बम से ठप पड़ जाएगा भारत का अमेरिकी निर्यात? जीटीआरआई ने दी चेतावनी

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर 500% टैरिफ के प्रस्ताव ने भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में चिंता बढ़ा दी है. जीटीआरआई की रिपोर्ट के मुताबिक, यदि यह टैरिफ लागू हुआ, तो अमेरिका को भारत का 120 अरब डॉलर से अधिक का माल और सेवाओं का निर्यात लगभग ठप हो सकता है. रिपोर्ट में भारत को रूसी तेल आयात पर अपना रुख अमेरिका के सामने स्पष्ट रूप से रखने की सलाह दी गई है.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की ओर से रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर 500% टैरिफ लगाने वाले प्रस्तावित विधेयक को मंजूरी दिए जाने के बाद वैश्विक व्यापार जगत में हलचल तेज हो गई है. ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) ने गुरुवार को जारी अपनी रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि अगर ऐसा कोई टैरिफ लागू होता है, तो अमेरिका को भारत के माल और सेवाओं का निर्यात लगभग पूरी तरह ठप हो सकता है. फिलहाल, भारत का अमेरिका को सालाना निर्यात 120 अरब अमेरिकी डॉलर से ज्यादा का है, जो इस कदम से गंभीर खतरे में पड़ सकता है.

भारत के लिए क्यों है यह सबसे बड़ा खतरा?

जीटीआरआई की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत और चीन रूस से तेल खरीदने वाले सबसे बड़े देशों में शामिल हैं. इसके बावजूद, अमेरिका ने अब तक व्यावहारिक रूप से केवल भारत पर 25% अतिरिक्त टैरिफ लगाकर दबाव बनाया है, जबकि चीन को काफी हद तक अछूता छोड़ा गया है. रिपोर्ट में कहा गया है कि वाशिंगटन को डर है कि चीन अगर जवाबी कार्रवाई करता है, तो वह दुर्लभ खनिजों की आपूर्ति सीमित कर सकता है. यह अमेरिकी हाई-टेक और रक्षा उद्योगों के लिए बेहद जरूरी हैं. इसी वजह से भविष्य में भी प्रस्तावित 500% टैरिफ का बोझ मुख्य रूप से भारत पर ही डाले जाने की आशंका जताई गई है.

500% टैरिफ का मतलब क्या होगा?

जीटीआरआई का कहना है कि 50% टैरिफ पहले ही कई भारतीय निर्यात क्षेत्रों को नुकसान पहुंचा चुका है. अगर इसे बढ़ाकर 500% किया जाता है, तो भारतीय उत्पादों और सेवाओं के लिए अमेरिकी बाजार लगभग बंद हो जाएगा. इतनी ऊंची दर पर शुल्क लगने का अर्थ है कि भारतीय कंपनियां कीमत के मामले में पूरी तरह गैर-प्रतिस्पर्धी हो जाएंगी. इससे आईटी सेवाएं, फार्मा, टेक्सटाइल, ऑटो कंपोनेंट्स और इंजीनियरिंग गुड्स जैसे प्रमुख सेक्टरों पर सीधा असर पड़ेगा.

सेवाओं पर टैरिफ सबसे बड़ा कानूनी पेंच

रिपोर्ट में इस बात पर खास जोर दिया गया है कि सेवाओं पर टैरिफ लगाना अमेरिका के लिए खुद एक बड़ी कानूनी चुनौती होगा. भौतिक वस्तुओं पर तो अमेरिकी सीमा शुल्क के पास स्पष्ट तंत्र है, लेकिन सेवाओं के लिए कोई ठोस कानूनी ढांचा मौजूद नहीं है. अगर इस दिशा में कदम बढ़ाया गया, तो संभव है कि अमेरिकी कंपनियों की ओर से भारतीय आईटी और प्रोफेशनल सर्विसेज फर्मों को किए जाने वाले भुगतानों पर अतिरिक्त कर लगाया जाए. इसका सीधा असर भारत के सबसे मजबूत निर्यात क्षेत्र (आईटी और बिजनेस सर्विसेज) पर पड़ेगा.

क्या सीनेट से पास होना आसान है?

हालांकि, जीटीआरआई का मानना है कि सीनेटर लिंडसे ग्राहम की ओर से प्रस्तावित यह विधेयक सीनेट से पारित हो जाएगा, इसकी संभावना फिलहाल कम है. अभी ट्रंप प्रशासन अंतरराष्ट्रीय आपातकालीन आर्थिक शक्तियां अधिनियम के तहत राष्ट्रपति की आपात शक्तियों पर निर्भर है, जिसे अदालतों में चुनौती दी जा रही है और सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने वाला है. इसके उलट, ग्राहम के विधेयक को सीनेट की औपचारिक मंजूरी चाहिए, जिससे इसका भविष्य अनिश्चित बना हुआ है.

भारत को क्या करना चाहिए?

जीटीआरआई ने साफ शब्दों में कहा है कि भारत को रूसी तेल आयात पर अपना रुख अस्पष्ट नहीं रखना चाहिए. रिपोर्ट के मुताबिक, नई दिल्ली को वाशिंगटन के सामने अपनी स्थिति निर्णायक और स्पष्ट रूप से रखनी होगी. रणनीतिक चुप्पी या टालमटोल भारत के हितों के खिलाफ जा सकती है, क्योंकि इससे अमेरिका को यह संकेत मिल सकता है कि भारत दबाव में झुक सकता है.

क्या जंगल का कानून चला रहे ट्रंप?

रिपोर्ट में अमेरिकी नीति पर तीखा सवाल भी उठाया गया है. एक तरफ वाशिंगटन रूसी तेल खरीदने वाले देशों को दंडित करने की बात कर रहा है. वहीं, दूसरी ओर वेनेजुएला के तेल भंडारों पर आक्रामक रुख अपना रहा है. जीटीआरआई ने इसे नियमों पर आधारित व्यापार व्यवस्था के बजाय जंगल के कानून से भी बदतर बताया है, क्योंकि यह नीतियां सभी देशों पर समान रूप से लागू नहीं की जा रहीं.

 

रिश्तों की रीढ़ पर वार?

अगर 500% टैरिफ जैसी कठोर नीति लागू होती है, तो यह भारत-अमेरिका व्यापारिक रिश्तों की रीढ़ तोड़ने जैसा होगा. इससे न सिर्फ निर्यात प्रभावित होगा, बल्कि रणनीतिक साझेदारी पर भी गहरा असर पड़ सकता है. ऐसे में आने वाले दिन भारत की कूटनीति और व्यापार नीति के लिए बेहद निर्णायक साबित हो सकते हैं.

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