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वैश्विक विश्व युद्ध के मुहानें पर बैठी मानवताl हुक्मरानों की सनक और सत्ता लोलुपता।

सावधान ? मानवीय जीवन आज परमाणु युद्ध के कगार पर खड़ा है और पूरी पृथ्वी जैसे किसी सक्रिय ज्वालामुखी के मुख पर बैठी हुई प्रतीक्षा कर रही है कि अगला सनकी आदेश किस राजधानी से निकलेगा। परमाणु संपन्न देशों के शासक स्वयं को वैश्विक सिरमौर सिद्ध करने की खतरनाक होड़ में अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं, विस्तारवादी मंसूबों और व्यक्तिगत सनकों को मानवता के अस्तित्व से ऊपर रख चुके हैं।
चीन, रूस और उत्तर कोरिया जैसे देश जहाँ परमाणु शक्ति तानाशाही प्रवृत्तियों के हाथों में केंद्रित है। वहाँ यह खतरा और भी भयावह हो जाता है क्योंकि इतिहास गवाह है कि जब सत्ता विवेक से कट जाती है तब युद्ध अपरिहार्य हो जाता है, अमेरिका द्वारा द्वितीय विश्व युद्ध में हिरोशिमा और नागासाकी पर गिराए गए परमाणु बम आज भी मानवता के माथे पर कलंक की तरह दर्ज हैं। उसे समय के परमाणु हमले के विकिरण के दुष्प्रभाव आज भी जापान के बच्चों के शरीर और भविष्य में देखे जा सकते हैं।
उत्तर कोरिया के शासक किम जोंग उन द्वारा 2022 के बाद से सौ से अधिक हथियारों के परीक्षण जिनमें अमेरिका, दक्षिण कोरिया और जापान को लक्ष्य करने वाली परमाणु मिसाइलें शामिल हैं। यही इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि यह देश किसी भी क्षण सनक में विनाशकारी कदम उठा सकता है। रूस-यूक्रेन युद्ध ने यह सिद्ध कर दिया है कि आधुनिक युद्ध केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहते बल्कि वैश्विक संतुलन को झकझोर कर रखा देते हैं और यूक्रेन को नाटो तथा अमेरिका से मिल रही सहायता के कारण रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन कई बार सार्वजनिक रूप से परमाणु हथियारों के प्रयोग की धमकी दे चुके हैं ।जबकि उन्हें यह अनुमान ही नहीं था कि यूक्रेन इतना लंबा प्रतिरोध कर पाएगा, चीन और ताइवान विवाद में भी अमेरिका के परोक्ष हस्तक्षेप से नाराज चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग अपनी विस्तारवादी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए कभी भी सैन्य कार्रवाई कर सकते हैं। जिससे एशिया प्रशांत क्षेत्र युद्ध के केंद्र में आ सकता है। यह भी सर्वविदित तथ्य है कि रूस, चीन और उत्तर कोरिया वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में अमेरिका के सबसे बड़े रणनीतिक विरोधी बन चुके हैं और अमेरिका स्वयं को विश्व का सर्वशक्तिमान बनाए रखने के दबाव में लगातार युद्धोन्मुखी नीति अपनाए हुए है।
अमेरिका और दक्षिण कोरिया द्वारा उत्तर कोरिया की सीमा पर लगातार सैन्य अभ्यास को प्योंगयांग हमले के पूर्वाभ्यास के रूप में देख रहा है।जबकि अमेरिका, जापान और दक्षिण कोरिया त्रिपक्षीय समझौतों के तहत संयुक्त बैलिस्टिक मिसाइल रणनीति पर आगे बढ़ चुके हैं।, इन तैयारियों के जवाब में उत्तर कोरिया द्वारा रणनीतिक क्रूज मिसाइल परीक्षणों का निरीक्षण इस बात की पुष्टि करता है कि टकराव की जमीन पूरी तरह तैयार हो चुकी है।
पश्चिम एशिया में वेनेजुएला संकट, इसराइल-फिलिस्तीन युद्ध और यूक्रेन संघर्ष आपस में जुड़कर एक ऐसे वैश्विक युद्ध की प्रस्तावना रच रहे हैं जिसमें पाकिस्तान और खाड़ी देशों की भागीदारी की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता है। अमेरिका में चुनावी दबावों के चलते वहां का नेतृत्व अपनी वैश्विक बादशाहत बचाने के लिए किसी भी स्तर तक जाने को तैयार दिखाई देता है और उसके साथ ब्रिटेन, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया और इसराइल जैसे देश आंख मूंदकर खड़े रहते हैं।भारत की स्थिति इन परिस्थितियों में अत्यंत संवेदनशील है क्योंकि एक ओर उसकी चीन से परंपरागत शत्रुता है तो दूसरी ओर रूस से गहरे रणनीतिक संबंध और अमेरिका से बढ़ती निकटता है जबकि भारत लगातार शांति और संतुलन की भूमिका निभाने का प्रयास करता रहा है। परंतु जब विश्व की प्रमुख शक्तियां ही संवाद की बजाय दंभ और हथियारों की भाषा बोलने लगें तो किसी भी क्षण चिंगारी विश्वयुद्ध में बदल सकती है और यदि ऐसा हुआ तो यह युद्ध केवल देशों का नहीं बल्कि पूरी मानव सभ्यता और पृथ्वी के अस्तित्व का युद्ध होगा, ऐसे समय में विश्व को नेताओं की सनक नहीं बल्कि विवेक की आवश्यकता है और मानवता के पास अब केवल यही एक प्रार्थना शेष रह जाती है कि युद्ध नहीं हो और शांति ही अंतिम विकल्प बने।
संजीव ठाकुर वरिष्ठ पत्रकार स्तंभकार, चिंतक , लेखक,रायपुर, छत्तीसगढ़, 9009 415 415,

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