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अंबिकापुर में मिली 1965 की हस्तलिखित पत्रिका उदगार की दुर्लभ पाण्डुलिपि, संरक्षण की पहल सराहनीय

अम्बिकापुर 01 मई 2026/  अंबिकापुर के गोधनपुर क्षेत्र में हस्तलिखित मासिक पत्रिका उदगार की दुर्लभ पाण्डुलिपि के चार अंक प्राप्त हुए हैं, जो पूर्व प्राचार्य श्री दिवाकर शर्मा के पास सुरक्षित पाए गए हैं। यह पत्रिका वर्ष 1965 में नगर के ख्यातिलब्ध साहित्यकार स्वर्गीय लक्षणधारी मिश्र द्वारा प्रारंभ की गई थी, जिसका पहला अंक मई 1965 में प्रकाशित हुआ था। राष्ट्रीय पाण्डुलिपि सर्वेक्षण अभियान के अंतर्गत इन पाण्डुलिपियों का लोकेशन जियो-टैग करने का कार्य सर्वेयर अनूप बड़ा द्वारा किया गया। यह पाण्डुलिपियां अपने आप में विशिष्ट हैं, जिनमें प्रत्येक लेख को आकर्षक चित्रों के साथ सुसज्जित किया गया है। लगभग 50 पृष्ठों की इस पत्रिका के मई, जुलाई, अगस्त एवं अक्टूबर माह के अंक वर्तमान में सुरक्षित हैं। समय के प्रभाव से पाण्डुलिपियों की स्याही कई स्थानों पर धुंधली हो गई है तथा कागज भी क्षतिग्रस्त होने लगा है। ऐसे में श्री दिवाकर शर्मा द्वारा इनके संरक्षण हेतु विशेष प्रयास किए जा रहे हैं। वे इनकी सामग्री को पुनः हस्तलिखित रूप में सुरक्षित करने का कार्य कर रहे हैं, जो पूर्वजों की अमूल्य धरोहर को संरक्षित करने की दिशा में सराहनीय पहल है।

पत्रिका का संपादन स्वर्गीय लक्षणधारी मिश्र एवं मो. यासीन द्वारा किया गया था, जबकि प्रसिद्ध कवि स्वर्गीय अनिरुद्ध नीरव ने इसे सुंदर सुलेख में लिपिबद्ध किया था। उदगार में उस समय के समसामयिक विषयों पर आधारित लेख, गीत, कहानियां, कविताएं एवं कुंडलियां जैसी उच्चस्तरीय साहित्यिक सामग्री का समावेश किया गया है।
इस पत्रिका में तत्कालीन प्रतिष्ठित साहित्यकारोंकृकेशव प्रसाद शर्मा, श्याम सुंदर बेचैन, शिवपूजन प्रसाद, मो. यासीन, देवनारायण सिंह, जनार्दन प्रसाद पाण्डेय एवं प्रो. ईश्वर दत्त द्विवेदीकृका महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
उल्लेखनीय है कि इस पत्रिका की केवल एक ही प्रति हस्तलिखित रूप में तैयार की जाती थी, जिसे पाठकों द्वारा बारी-बारी से पढ़ा जाता था। इतना ही नहीं, पाठक एवं आलोचक पत्रिका के खाली स्थानों पर ही अपने विचार भी अंकित करते थे, जो इसे एक अनूठा और जीवंत साहित्यिक प्रयोग बनाता है। निश्चित रूप से भारत सरकार द्वारा संचालित पाण्डुलिपि सर्वेक्षण अभियान भारतीय ज्ञान परंपरा को संरक्षित एवं प्रसारित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है, और उदगार जैसी पाण्डुलिपियों का संरक्षण इस दिशा में मील का पत्थर सिद्ध होगा।

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