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‘विरासत का प्रवाह’ राष्ट्रीय संगोष्ठी सह प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ

*विरासत संरक्षण में नैतिकता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और समुदाय की भागीदारी पर हुआ मंथन*

 

*विशेषज्ञों ने कहा—तथ्य, तर्क और विज्ञान के आधार पर हो इतिहास एवं विरासत का संरक्षण और प्रस्तुतीकरण*

 

रायपुर, 21 अगस्त 2026। संस्कृति विभाग, पुरातत्त्व, अभिलेखागार एवं संग्रहालय के तत्वावधान में “विरासत का प्रवाह: नैतिकता, संरक्षण और समुदाय” विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी सह प्रशिक्षण कार्यक्रम का आज शुभारंभ हुआ। कार्यक्रम में देश के विभिन्न क्षेत्रों से आए विषय-विशेषज्ञों, विद्वानों, शोधकर्ताओं एवं प्रतिभागियों ने विरासत संरक्षण के विभिन्न आयामों पर विचार-विमर्श किया। इस दौरान विरासत संरक्षण में नैतिकता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, प्रामाणिकता तथा स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी के महत्व पर विशेष रूप से चर्चा हुई।

 

कार्यक्रम का स्वागत उद्बोधन एवं परिचय पुरातत्त्ववेत्ता श्री प्रभात कुमार सिंह ने दिया। उन्होंने संगोष्ठी की विषय-वस्तु पर प्रकाश डालते हुए कहा कि विरासत केवल अतीत की स्मृतियों और पुरावशेषों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज की सामूहिक पहचान, ज्ञान और सांस्कृतिक निरंतरता का आधार है। विरासत के संरक्षण में स्थानीय समुदायों की सहभागिता तथा भावी पीढ़ियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि संरक्षण की प्रक्रिया में विरासत के मूल स्वरूप, ऐतिहासिक संदर्भ और सामाजिक महत्व को समझना आवश्यक है।

 

मुख्य अतिथि प्रो. ऋचा कम्बोज, नई दिल्ली ने अपने उद्बोधन में विरासत संरक्षण के व्यापक आयामों पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने विरासत संरक्षण के लिए शोध, ज्ञान और व्यवहारिक प्रयासों के बीच समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया। विशिष्ट अतिथि श्री ओजस हिरानी, गुजरात एवं श्री टोप लाल शर्मा, छत्तीसगढ़ ने भी अपने विचार रखे। वक्ताओं ने कहा कि विरासत संरक्षण को प्रभावी और स्थायी बनाने के लिए अकादमिक संस्थाओं, शासन तथा स्थानीय समुदायों के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है।

 

इतिहास लेखन में तथ्य, तर्क और नैतिकता जरूरी : श्री शशांक शर्मा

 

साहित्य अकादमी छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष श्री शशांक शर्मा ने भारतीय इतिहास के विभिन्न प्रसंगों की चर्चा करते हुए इतिहास और विरासत से जुड़े विषयों को तथ्यपरक एवं प्रमाणिक दृष्टिकोण से समझने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि इतिहास से संबंधित विषयों में भ्रामक या तथ्यहीन कथनों और गढ़े गए आख्यानों के दुष्परिणाम व्यापक हो सकते हैं। इसलिए इतिहास के अध्ययन, लेखन और प्रस्तुतीकरण में तर्क, तथ्य और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का पालन किया जाना चाहिए।

 

उन्होंने कहा कि इतिहास केवल घटनाओं का संकलन नहीं है, बल्कि यह समाज की स्मृति और उसकी पहचान को निर्मित करने वाला महत्वपूर्ण माध्यम है। ऐसे में इतिहास लेखन में शुचिता, निष्पक्षता और नैतिकता का विशेष महत्व है। उन्होंने कहा कि विरासत और इतिहास को आने वाली पीढ़ियों तक सही संदर्भ और प्रमाणिकता के साथ पहुंचाना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।

 

विरासत संरक्षण वर्तमान और भावी पीढ़ियों के प्रति सामूहिक दायित्व : डॉ. संजय कन्नौजे

 

कार्यक्रम की अध्यक्षता संचालक, संस्कृति एवं पुरातत्त्व डॉ. संजय कन्नौजे ने की। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने विरासत संरक्षण को वर्तमान और भावी पीढ़ियों के प्रति सामूहिक दायित्व बताते हुए कहा कि संरक्षण की प्रक्रिया में नैतिकता, प्रामाणिकता, वैज्ञानिक पद्धति और स्थानीय समुदायों की भागीदारी को समान महत्व दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि समुदायों की सक्रिय सहभागिता से विरासत संरक्षण के प्रयास अधिक प्रभावी, संवेदनशील और स्थायी बनाए जा सकते हैं।

 

शुभारंभ सत्र के अंत में अतिथि वक्ताओं को स्मृति चिह्न एवं राजकीय गमछा भेंट कर सम्मानित किया गया।

 

यह राष्ट्रीय संगोष्ठी विरासत संरक्षण से जुड़े विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं एवं प्रतिभागियों के लिए अनुभवों और विचारों के आदान-प्रदान का महत्वपूर्ण मंच है। संगोष्ठी सह प्रशिक्षण कार्यक्रम के माध्यम से विरासत संरक्षण के विभिन्न पक्षों पर विशेषज्ञों के अनुभव साझा किए जा रहे हैं तथा प्रतिभागियों को संरक्षण की आधुनिक एवं वैज्ञानिक पद्धतियों से परिचित कराया जा रहा है। कार्यक्रम के माध्यम से विरासत संरक्षण को केवल शासकीय दायित्व न मानकर समाज और समुदाय की साझा जिम्मेदारी के रूप में विकसित करने की दिशा में सार्थक विमर्श को आगे बढ़ाया जा रहा है।

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