Ro no D15139/23

वरिष्ठ पत्रकार चंद्रशेखर शर्मा की बात बेबाक ..अपनी औकात भूल जाऊं, इतना अमीर नहीं हूं मैं, और कोई मेरी औकात बताए , इतना फकीर नहीं हूं मैं।

ज्यादातर नेता विधायक सांसद जिला जनपद के जनप्रतिनिधि अधिकारीयों के आगे भींगी बिल्ली बन जाते हैं , उनके कहे वाक्य को ही ब्रम्हा की लकीर व हरिश्चंद्र की वाणी मान बैठते है फिर कार्यकर्ता कुछ भी कहता रहे । सभी की नहीं पर कमोबेश ज्यादातर की हालात यही है । जनप्रतिनिधियों को अपनी ताक़त का अंदाज़ा ही नहीं है । जनप्रतिनिधियों को कंगना रनौत द्वारा अपने क्षेत्र में अधिकारियों की ली जा रही मीटिंग में उनके तेवर देख के सीख लेनी चाहिए , मीटिंग में जो अफसर होंगे उनकी शक्ल देखने वाली रही होगी ।

लोकतंत्र में जनता मालिक होती है, जनप्रतिनिधि उसका प्रतिनिधि और अधिकारी व्यवस्था के सेवक।लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि की कुर्सी बड़ी विचित्र चीज है। चुनाव के समय यही कुर्सी इतनी ताकतवर होती है कि नेता जी के दरवाजे पर सुबह से शाम तक जनता, कार्यकर्ता और समर्थकों की कतार लगी रहती है। लेकिन चुनाव जीतते ही पता चलता है कि असली ताकत तो सामने वाली सरकारी कुर्सी पर बैठी है , कई जनप्रतिनिधियों की हालात देख लगता है मानो उन्हें जनता ने वोट नहीं दिया , अपितु अधिकारियों से अनुमति लेकर चुनाव जीते हो ।

प्रदेश के कई जिलों में तो ये हालात बन गए है कि कभी-कभी साहब तो साहब , सरकारी बाबू, सिपाही या छोटा-सा कर्मचारी भी जनप्रतिनिधि को ऐसा भाव देता है, जैसे उसके सामने क्षेत्र का निर्वाचित जनप्रतिनिधि नहीं, बल्कि मांग या शिकायत का आवेदन लेकर आया कोई आवेदक खड़ा हो । कवर्धा जनपद की अनुसूचित जाति की महिला अध्यक्ष को लंबे समय से शासन-प्रशासन के आयोजनों में उचित स्थान नही मिल पा रहा आमंत्रण कार्ड , फ्लेक्स बैनर तक में नाम और अदद एक फोटू देखने को तरस रही । सत्ता पक्ष की महिला अध्यक्ष को महत्व व सम्मान न मिल पाने की चौक चौराहों पर चल रही चर्चा भी व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है। आखिर निर्वाचित पद की गरिमा कार्यक्रम की कुर्सियों से तय होगी या जनता के दिए अधिकार से ? महिला हो या पुरुष, सत्ता पक्ष हो या विपक्ष जनप्रतिनिधि का सम्मान पद के कारण होना चाहिए, पसंद के कारण नहीं ।

अरे भाई! जनता ने आपको इसलिए नहीं चुना कि आप हर सरकारी टेबल के सामने अदब से खड़े होकर अपनी ही हैसियत का प्रमाणपत्र मांगते रहें । जनप्रतिनिधि की ताकत जनता के वोट से आती है। अधिकारी शासन की मशीनरी का हिस्सा हैं और उनका सम्मान होना चाहिए , लेकिन सम्मान और आत्मसमर्पण में जमीन-आसमान का अंतर है। अधिकारी से समन्वय लोकतंत्र है, अधिकारी के सामने अपनी आवाज खो देना लोकतंत्र का साइलेंट मोड है । इसलिए साहब के कमरे में जाइए तो नमस्कार कीजिए, चाय पीजिए , चर्चा कीजिये लेकिन अपनी आवाज बाहर छोड़कर मत जाइए ।

सोचनीय है कि क्या निर्वाचित पद सिर्फ शपथ और नेमप्लेट तक सीमित हैं , या उनका वास्तविक सम्मान भी होगा ? महिला हो या पुरुष, सत्ता पक्ष का हो या विपक्ष के जनप्रतिनिधि को उसके संवैधानिक और लोकतांत्रिक दायित्व के अनुरूप सम्मान मिलना ही चाहिए और हमारे तमाम जनप्रतिनिधियों के लिए गोबरहीन टुरी की तरफ से एक छोटा सा संदेश कि –

अधिकारी से डरिए मत, संवाद कीजिए।

बाबू से लड़िए मत, काम करवाइए।

सिपाही से भिड़िए मत, व्यवस्था समझाइए।

लेकिन इतना भी विनम्र मत हो जाइए कि जनता आपको अपना नेता समझे और साहब और बाबू आपको आवेदक क्रमांक 420 ?

इसीलिए भारतीय अभिनेत्री और भाजपा सांसद कंगना रनौत जैसे तेवर जब किसी बैठक में दिखाई देते हैं तो चर्चा होना स्वाभाविक है । जनप्रतिनिधि की कुर्सी सजावट का सामान नहीं होती । कल्पना कीजिए बैठक का दृश्य।

अधिकारी आराम से फाइल पलट रहे हैं।

अचानक गर्म तेवर के साथ सवालों की बौछार शुरू , खड़े होने के निर्देश ,

अधिकारी ने पहले चश्मा ठीक किया होगा। फिर कुर्सी सीधी की होगी। फिर पानी का गिलास उठाया होगा ।

आखिर इतने दिनों से जी सर की मधुर ध्वनि सुनाई देती रही हो और अचानक कोई सवाल पूछ दे तो एसी के 18 डिग्री वाले ठंड में भी पसीना आने लगता है ।

कंगना के तेवर देख के लगा कि मूंछ हो या न हो, तेवर हों या न हों बाकी मर्द-ए-मुजाहिद (धर्म/सत्य के लिए संघर्ष करने वाला वीर और साहसी ) बनने के लिए बस रीढ़ की हड्डी सीधी और गर्दन उठी हुई होनी चाहिए।

 

और अंत में :-

अपनी औकात भूल जाऊं, इतना अमीर नहीं हूं मैं,

और कोई मेरी औकात बताए , इतना फकीर नहीं हूं मैं।

 

#जय_हो 08 सितंबर 2026 कवर्धा (छत्तीसगढ़ )

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