
कृषि विज्ञान केन्द्र सुरगी द्वारा किसानों को दी गई समसामयिक सलाह*
राजनांदगांव 21 सितम्बर 2026। कृषि विज्ञान केन्द्र सुरगी राजनांदगांव द्वारा किसानों को धान की फसल में वर्तमान समय में दिखाई देने वाले प्रमुख कीट एवं रोगों की पहचान, उनके लक्षण तथा रासायनिक एवं समेकित नियंत्रण के संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी दी गई है। कृषि विज्ञान केन्द्र सुरगी की वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. गुंजन झा तथा फार्म मैनेजर डॉ. आशीष गौरव शुक्ला ने बताया कि धान की फसल में तना छेदक, पत्ती लपेटक, भूरा माहू, गंधी बग एवं पैनिकल माइट जैसे प्रमुख कीट तथा जीवाणु जनित झुलसा, ब्लास्ट एवं शीथ ब्लाइट जैसे रोग फसल को नुकसान पहुंचा सकते हैं। उन्होंने कहा कि किसानों को फसल की नियमित निगरानी कर प्रारंभिक अवस्था में ही कीट एवं रोग की पहचान करने की सलाह दी है।
तना छेदक की पहचान डेड हार्ट एवं व्हाइट ईयर के लक्षणों से की जा सकती है। प्रारंभिक प्रकोप में प्रोफेनोफॉस 40 प्रतिशत + साइपरमेथ्रिन 4 प्रतिशत ईसी 400 मिलीलीटर प्रति एकड़ तथा अधिक प्रकोप की स्थिति में क्लोरेंट्रानिलिप्रोल 9.3 प्रतिशत + लैम्ब्डा-साइहेलोथ्रिन 4.6 प्रतिशत जेडसी 100 मिलीलीटर प्रति एकड़ का प्रयोग किया जा सकता है।
पत्ती लपेटक पत्तियों के मुडऩे तथा पत्तियों पर सफेद धारियां दिखाई देना इसका प्रमुख लक्षण है। रासायनिक नियंत्रण के लिए प्रोफेनोफॉस 40 प्रतिशत + साइपरमेथ्रिन 4 प्रतिशत ईसी 400 मिलीलीटर प्रति एकड़ का उल्लेख किया गया है।
भूरा माहू पौधों के निचले हिस्से में कीटों का समूह दिखाई देता है तथा अधिक प्रकोप में हॉपर बर्न के कारण पौधे गोलाकार क्षेत्र में सूखने लगते हैं। नियंत्रण के लिए इमिडाक्लोप्रिड 17.8 प्रतिशत एससी 100 मिलीलीटर प्रति एकड़ अथवा डाइनोटेफ्यूरान 10 प्रतिशत + पाइमेट्रोजीन 40 प्रतिशत डब्ल्यूजी 100 ग्राम प्रति एकड़ का प्रयोग किया जा सकता है।
गंधी बग दूधिया अवस्था में यह दानों का रस चूसकर दानों को अधभरा, खोखला या खराब कर सकता है। आवश्यकता पडऩे पर लैम्ब्डा-साइहेलोथ्रिन 5 प्रतिशत ईसी 100 मिलीलीटर प्रति एकड़ का प्रयोग किया जा सकता है।
पैनिकल माइट बालियां निकलने के आसपास इसका प्रकोप होने पर दाने अधभरे, बदरंग या चोकर जैसे हो सकते हैं। प्रस्तुति के अनुसार देर से कल्ले निकलने की अवस्था में डायफेन्थियूरॉन 50 प्रतिशत डब्ल्यूपी 1-2 ग्राम प्रति लीटर पानी $+प्रोपिकोनाजोल 1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी का छिड़काव किया जा सकता है।
जीवाणु जनित झुलसा पत्तियों के किनारे या सिरे से पीले एवं पानी से भीगे हुए धब्बे दिखाई देना इसका प्रमुख लक्षण है। नियंत्रण के लिए खेत में उचित जल निकास एवं संतुलित उर्वरक प्रबंधन के साथ कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 50 प्रतिशत डब्ल्यूपी 500 ग्राम प्रति एकड़ + स्ट्रेप्टोमाइसिन सल्फेट 90 प्रतिशत + टेट्रासाइक्लिन हाइड्रोक्लोराइड 10 प्रतिशत एसपी 20 ग्राम प्रति एकड़ का उल्लेख किया गया है।
ब्लास्ट रोग पत्तियों पर हीरे अथवा नाव के आकार के धब्बे तथा गर्दन ब्लास्ट में बालियों की गर्दन पर भूरा-काला घेरा दिखाई देता है। नियंत्रण के लिए ट्राइसाइक्लाजोल 75 प्रतिशत डब्ल्यूपी 120 ग्राम प्रति एकड़ का प्रयोग किया जा सकता है।
शीथ ब्लाइट पत्ती की खोल पर अंडाकार एवं अनियमित हरे-धूसर धब्बे दिखाई देते हैं, जो बाद में ऊपर की पत्तियों तक फैल सकते हैं। रासायनिक नियंत्रण के लिए हेक्साकोनाजोल 5 प्रतिशत एससी 350 मिलीलीटर प्रति एकड़ का उल्लेख किया गया है।
कृषि विज्ञान केन्द्र सुरगी राजनांदगांव द्वारा रासायनिक दवाओं का प्रयोग केवल आवश्यकता एवं अनुशंसित मात्रा के अनुसार ही करने तथा कीट एवं रोग की सही पहचान के बाद ही नियंत्रण उपाय अपनाएं तथा अनावश्यक एवं बार-बार कीटनाशकों के प्रयोग बचने की सलाह दी गई है। संतुलित उर्वरक उपयोग, उचित जल प्रबंधन, खेत की नियमित निगरानी एवं समेकित कीट एवं रोग प्रबंधन को अपनाकर फसल को होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है।









