
Chirag Paswan Biography: बिहार की राजनीति में कुछ नेता अपनी विचारधारा के लिए पहचाने जाते हैं, कुछ अपने सामाजिक आधार के लिए और कुछ अपने राजनीतिक फैसलों के लिए. चिराग पासवान की पहचान इन तीनों के बीच कहीं बनती है. वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थक हैं, दलित राजनीति में अपनी जगह मजबूत करना चाहते हैं और अपनी पार्टी को बिहार से बाहर भी ले जाने की कोशिश कर रहे हैं.
उनकी राजनीति को समझने के लिए सिर्फ उनके बयानों को सुनना काफी नहीं है. यह भी देखना पड़ता है कि उन्होंने किस समय क्या फैसला लिया, उसके पीछे राजनीतिक परिस्थिति क्या थी और उस फैसले का परिणाम क्या निकला. चिराग की कहानी में फिल्मी दुनिया की नाकामी, पिता की विरासत, परिवार में राजनीतिक टकराव, चुनावी जोखिम, गठबंधन की मजबूरियां और अपनी पहचान बनाने की जिद है.
चिराग भी पिता की तरह ही राजनीति कर रहे हैं?
रामविलास पासवान की राजनीति में सत्ता के बदलते समीकरणों के साथ अपनी जगह बनाए रखने की कोशिश हमेशा दिखाई देती थी. इसी वजह से उन्हें सियासत का मौसम वैज्ञानिक कहा जाता था.
1990 के दशक में वीपी सिंह की सरकार से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार तक, फिर 2004 में कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) और 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले गठबंधन तक उनका राजनीतिक सफर कई बार बदलते राजनीतिक साथियों का गवाह बना. 2002 के गुजरात दंगों के बाद उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी सरकार से इस्तीफा दिया और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन छोड़ दिया.
2004 में कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन के साथ गए और केंद्र में मंत्री बने. 2009 में लोकसभा चुनाव हारने के बाद उनकी राजनीतिक स्थिति कमजोर हुई, लेकिन 2010 में लालू प्रसाद यादव के समर्थन से राज्यसभा पहुंचे. 2014 में उन्होंने फिर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले गठबंधन का साथ पकड़ा और केंद्र में मंत्री बन गए. चिराग पासवान की राजनीति में भी इसी तरह बदलते समीकरणों के हिसाब से चलने की झलक दिखती है.
2020 में उन्होंने बिहार में जनता दल यूनाइटेड के खिलाफ चुनाव लड़ा, लेकिन नरेंद्र मोदी के प्रति समर्थन जताते रहे. बाद में पार्टी में टूट और चाचा पशुपति कुमार पारस से टकराव के बावजूद उन्होंने अपनी राजनीतिक जमीन दोबारा तैयार की. 2024 के लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी ने सभी पांच सीटें जीत लीं और चिराग फिर केंद्र में मंत्री बन गए.
आज बिहार में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार पर सवाल उठाने के बावजूद वे गठबंधन में बने हुए हैं. पिता की तरह चिराग भी विरोध और समर्थन के बीच ऐसी जगह तलाशते दिखते हैं, जहां उनकी राजनीतिक उपयोगिता बनी रहे.
फिल्मी पर्दे से राजनीति के मैदान तक
चिराग पासवान के पिता रामविलास पासवान ने 2000 में लोक जनशक्ति पार्टी यानी LJP बनाई थी. केंद्र की राजनीति में उनकी मजबूत पहचान थी और बिहार में भी उनका अपना समर्थक वर्ग था.
चिराग ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू की, लेकिन उसे पूरा नहीं किया. इसके बाद उन्होंने फिल्मों में अपना भविष्य तलाशा. साल 2011 में उनकी फिल्म मिले ना मिले हम रिलीज हुई. इसमें उनके साथ कंगना रनौत भी थीं. फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं रही और चिराग का फिल्मी करियर आगे नहीं बढ़ पाया.
यहीं से उनकी जिंदगी ने नया मोड़ लिया. उन्होंने राजनीति की तरफ कदम बढ़ाया. उनके पास पिता का नाम और राजनीतिक अनुभव से भरा पारिवारिक माहौल था, लेकिन चुनाव जीतना और लोगों के बीच अपनी पहचान बनाना अलग चुनौती थी.
2014 के लोकसभा चुनाव में चिराग जमुई से LJP के टिकट पर मैदान में उतरे और जीतकर संसद पहुंचे. 2019 में भी उन्होंने जमुई से जीत दर्ज की. इस दौरान वह केवल रामविलास पासवान के बेटे के रूप में नहीं, बल्कि पार्टी के युवा चेहरे के तौर पर भी सामने आने लगे.
मोदी से नजदीकी और हनुमान वाली पहचान
चिराग पासवान की राजनीति में नरेंद्र मोदी के साथ उनकी नजदीकी का बड़ा स्थान है. 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में यह रिश्ता खास तौर पर चर्चा में आया. उस समय चिराग ने नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली JDU के खिलाफ चुनाव लड़ने का फैसला किया, लेकिन बीजेपी और नरेंद्र मोदी के प्रति अपना समर्थन जताते रहे.
इसी दौरान उन्होंने खुद को नरेंद्र मोदी का ‘हनुमान’ कहा. इस बयान का मतलब था कि वह मोदी के प्रति अपनी निष्ठा दिखाना चाहते थे, जबकि बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व से उनकी असहमति थी. यानी चिराग ने केंद्र में बीजेपी से अपनी नजदीकी बनाए रखते हुए बिहार में अलग चुनावी रास्ता चुना.
यह फैसला जोखिम भरा था. LJP ने उस चुनाव में सिर्फ एक विधानसभा सीट जीती. दूसरी ओर, JDU की सीटों की संख्या में गिरावट आई. चिराग की रणनीति का चुनावी समीकरण पर कितना असर पड़ा, इस पर राजनीतिक विश्लेषण अलग-अलग रहे हैं.
लेकिन इस चुनाव ने चिराग की पहचान जरूर बना दी. उन्होंने दिखाया कि गठबंधन में रहना और गठबंधन के हर फैसले को स्वीकार करना उनके लिए एक ही बात नहीं है. वह किसी बड़े नेता का समर्थन करते हुए भी राज्य के स्तर पर अपना अलग राजनीतिक रास्ता चुन सकते हैं.









