
Foreign Devotees Gaya Pind Daan : महासंगम 2026 में पहली बार शुक्रवार को पांच देशों के 22 विदेशी श्रद्धालुओं ने अपने पितरों की आत्मा की शांति व मोक्ष प्राप्ति की कामना के लिए फल्गु नदी के देवघाट पर पिंडदान, श्राद्ध कर्म और तर्पण का कर्मकांड गया पाल पंडा जी के निर्देशन में संपन्न किया.
इन विदेशी सैलानियों के साथ चल रहे पुरोहित लोकनाथ गौड़ ने बताया कि जर्मनी, स्पेन, इटली, डच और पुर्तगाल से आए 48 में से 22 विदेशी श्रद्धालुओं ने फल्गु नदी और विष्णुपद क्षेत्र में अपने पूर्वजों का पिंडदान और तर्पण किया. ये सभी लोग ईसाई और इस्लाम धर्म छोड़कर सनातन धर्म स्वीकार कर चुके हैं.
तीन अलग-अलग ग्रुपों में पहुंचे हैं विदेशी श्रद्धालु
सनातन धर्म प्रचारक लोकनाथ गौड़ ने बताया कि 48 विदेशी श्रद्धालु तीन अलग-अलग ग्रुपों में पहुंचे हैं. इनमें पहले ग्रुप के 22 विदेशी श्रद्धालुओं ने फल्गु नदी के देवघाट पर अपने पितरों के उद्धार के लिए पिंडदान व तर्पण किया और इसके बाद विष्णुपद मंदिर में दर्शन व पूजा-अर्चना की.
श्री गौड़ ने बताया कि ये सभी लोग पिछले ढाई सालों से सनातन धर्म के नियमों और धार्मिक विधियों का पूरी निष्ठा के साथ पालन कर रहे हैं. जब इन्होंने पूर्ण निष्ठा के साथ इस धर्म को स्वीकार किया और भारतीय परिधान पहने, तब इन्हें पिंडदान करने की अनुमति दी गई.
विदेशों में तेजी से बढ़ रहा सनातन धर्म का प्रसार
लोकनाथ गौड़ ने कहा कि विदेशों में सनातन धर्म का प्रचार भारत से ज्यादा हो रहा है. उन्होंने बताया कि अगले महीने घाना (अफ्रीका) से भी एक दल आ रहा है, जिसमें वहां के प्रधानमंत्री के पीए भी शामिल हैं, जिन्होंने गंगाजल से घर का शुद्धिकरण कर सनातन धर्म अपनाया है.
उन्होंने कहा कि गया जी तीनों लोकों में पितरों के उद्धार के लिए सबसे श्रेष्ठ स्थान है, इसलिए विदेशी श्रद्धालु यहां खींचे चले आ रहे हैं. विष्णुपद मंदिर में पिंडदान करने के लिए दूसरे धर्म के अनुयायियों के प्रवेश पर रोक के सवाल पर श्री गौड़ ने कहा कि एक तरफ हिंदू धर्म परिवर्तन कर रहे हैं, वहीं जब दूसरे धर्म वाले सनातन स्वीकार कर रहे हैं, तो प्रवेश पर रोक उचित नहीं है. उन्होंने बताया कि अगले एक-दो दिन में उनकी टीम के माध्यम से गया जी पहुंचे अन्य सभी विदेशी श्रद्धालु भी पिंडदान का कर्मकांड करेंगे.
परिवार के बिछड़े लोगों की आत्मा की शांति के लिए पहुंचे श्रद्धालु
पिंडदान कर रही क्रिस्टीना ने अपनी एक घटना का जिक्र करते हुए बताया कि अपनी सहेली को आंख के सामने नदी में डूबते देखा, जिसे वे बचा नहीं सकीं.
इस हादसे के बाद वे काफी अशांत थीं. महिला श्रद्धालु मरीना ने बताया कि उनके बेटे की मृत्यु हो गई थी, और बेटे ने अंतिम समय में कुछ अलग रास्ते पर जाने की बात कही थी, जिसके बाद मां बेहद दुखी थीं. इन सभी ने अपने पितरों और अपनों की आत्मा की शांति के लिए यहां पहुंचकर पिंडदान का कर्मकांड पूरा किया.
पहले ग्रुप में कर्मकांड करने वाले विदेशी श्रद्धालु
इस दल के पहले ग्रुप में नादेज़्दा, पाल्तागुर्तोव्ना, दुर्सुनोवा, लारिसा वैलेंटिनोव्ना, ब्रिनेवा, ओल्गा, अलेक्सेयेवना रादी, विक्टोरिया थून, एकातेरिना, अनातोल्येव्ना, पावलोवा, मास्सिमो बोराक्की, अलेक्ज़ान्द्रा खोमेंको, ओक्साना, अलेक्ज़ान्द्रोव्ना, बुरेएवा, अल्बिना, निकोलायेव्ना, गिमातदिनोवा, लिडिया श्वाब, नालिनिया कोया हुंड, यूगोनिया मुहेलर, अन्ना सायरबु बेलेवच, एरिना मिसल राजसनोवा, याट जना कोयनेव अंकेलोवा, क्रिस्टिना एरहेल्म, नदेझ्दा नेवेलिका ओमिगाव, लर्टीबस पुसिन्यका ओलेसजा, कायना सिफतासी, सवेरलाना इक्स, तथा नातालिया कुरीलोवा सहित 22 विदेशी श्रद्धालु शामिल थे, जिनमें 21 महिलाएं थीं.









