
कई साल पहले एक बार किसी बातचीत के दौरान पत्रकार के प्रश्न पर गोविंदा ने जवाब दिया था ‘हम फिल्मों में पैसा कमाने के लिये आते हैं, जनसेवा के लिये या उपदेश देने के लिये नहीं। लोग जो पसंद करते हैं वो हम दिखाते हैं’। उनका कहना सच था। क्योंकि एक बार ऐसे ही एक प्रोग्राम में माउन्ट आबू में एक सज्जन ने फिल्म वालों को घटिया फिल्में बनाने के लिये कटघरे में खड़ा करना चाहा कि आप लोग अच्छी फिल्मंे नहीं बनाते। ऐसी फिल्मंे बनाते हैं जो समाज में बुराई फैलाती हैं। तब मुख्य अतिथि की आसंदी पर विराजमान अमरीश पुरी ने उसे जबर्दस्त धोया। अमरीश पुरी ने पूछा कि ‘आपने सूरज का सातवां घोड़ा देखी है क्या। उसने जवाब दिया ‘नहीं’। तो अमरीश पुरी भड़क गये और बोले ‘जब आप अच्छी फिलमें देखते नहीं तो बनाने को क्यों कहते हैें’।

बात सही भी है चटक-मटक वाली फिल्में हम पूरे परिवार सहित देख लेते हैं। अच्छी सामाजिक संदेश या क्रांति वाली फिल्मंे देखेने का वक्त किसी के पास नहीं है। बहरहाल गोविंदा के ऐसे बयान पर कुछ लोगों ने जरूर मुंह बिचकाया होगा। गोविंदा ने फिर एक बार साफ बोला जब पिछले दिनों एक महिला पत्रकार ने एक इंटरव्यू के दौरान उनसे पूछ लिया कि ऐसे ही बदनाम हैं क्या आप कि वक्त पर नहीं आते….. तो सहज रूप से उन्होंने बोल दिया ‘वो तो चांस ही नहीं है कि मैं समय पे आउं… नो बडी कैन डू, ये किसी के बस मेंनहीं है। कैसे करेगा, चार-पांच शूटिंग कैसे करेगा’
पत्रकार ने पूछा ‘तो फिर साईन क्यों किया था इतनी सारी फिल्में एक साथ’। गोविंदा ने कहा ‘नहीं… सभी लोगों ने किया था। आप जब साईन करते थे तो किसी का कालर पकड़ के थोड़ी न कहते थे साईन करो। आते थे लोग, आ जाते हैं और जिद करते हैं और कहा करते हैं कि वी वान्ट टू वर्क विथ यू… समहाउ वी प्लान एण्ड मैनेज… कहां… पर वो नहीं करते थे ऐसे।

‘पर सेटस इतने लंबे दौर तक चलते थे वेट करते थे आपके लिये….’
‘करना ही पड़ेगा न, जब उन्हें पता है कि ये आदमी एक दिन में 4-5 शिफ्ट करता है तो वो…’
‘बट इट वास अनफेयर न, बाकी जो को-स्टार थे आपके….’
‘दे वेयर मेकिंग मनी… डूईंग बिजनेस… क्या बात कर रही हैं आप।
‘नहीं पर जो को एक्टर्स हैं वो तो बैठे रहते थे आपके इंतजार में’
गोविंदा बोले ‘दे वेयर आलसो मेकिंग मनी। दे वेयर चार्जिंग फाॅर इट’। जैसे 43 फिल्में मैने कादर खान जी के साथ कीं और 42 फिल्में मैने शक्ति कपूर जी के साथ कीं। ये सभी लोगों ने… ये शुरू-शुरू में फ्लैट में रहा करते थे। सभी लोगों ने बंगले खरीद लिये।
कुछ पुरानी दो खबरें एकाएक याद आ गयीं। एक तो कोर्ट से संबंधित है जिसमें आरोपियों को चप्पल जूते उतार कर कोर्ट के अंदर प्रवेश देने का मसला दिखा। दूसरा खुशी के मारे मोहरा उछालकर फेंक देने का दृश्य दिखा। टेक्सास में एक शतरंज प्रतियोगिता ‘चेकमेटः अमेरिका बनाम भारत’ का आयोजन था जिसमें विश्व चैम्पियन डी मुकेश और हिकामु नाकामुरा के बीच मुकाबला चल रहा था। ऐसे में जब हिकामु नाकामुरा जीत गये तो उन्होंने अपने राजा को दर्शकों की ओर उछाल दिया। बस यही बात अशोभनीय लगी। क्योंकि शतरंज के खेल में ऐसा खुशी का इजहार पहली बार देखा गया।
वैसे अन्य खेलों में ऐसी हरकतें प्रायः देखी जाती रही हैं। किकेट में बैट पटक दी जाती है, बैडमिंटन में रैकेट पटकते देखा है। विंबलडन में तो ये आम है। फिर शिकायत केवल शतरंज से क्यों ? शायद इसलिये कि ये दिमाग का खेल है और दिमाग वालों से ऐसी प्रतिकिया की उम्मीद नहीं की जा सकती। बाद में ये सफाई दी गयी कि जानबूझ कर मनोरंजक बनाने के लिये ये पहले से तय किया गया था। किसी का अपमान करने की मंशा नहीं थी। सही बात है…. हर बार यही होता है किसी का अपमान करने का उद्देश्य नहीं होता लेकिन हरकत ठेस लगने वाली कर दी जाती है।
खैर टेक इट ईज़ी…. ।
कोर्ट में जूता
कुछ अरसा पहले किसी अपराधी ने दोषसिद्ध होने पर सजा सुनाने से चिढ़कर जज के उपर चप्पल उछाल दी थी। इसके बाद कोर्ट अंदर चप्पल पहन कर जाने की मनाही हो गयी थी। पिछले साल का एक किस्सा याद आया जब सीजेआई की तरफ एक वरिष्ठ अधिवक्ता ने जूता उछालने का प्रयास किया। दरअसल हुआ ये कि खजुराहो मे भगवान विष्णु की मूर्ति को फिर से स्थापित करने की याचिका पर सीजेआई की एक टिप्पणी अधिवक्ता को रास नहीं आई और उसने इसे सनातन का अपमान के रूप में लिया। कहा गया कि ‘याचिका प्रचार पाने के लिये दायर की गयी है। जाकर स्वयं भगवान से कुछ करने के लिये कहिये। आप विष्णु के प्रबल भक्त हैं तो प्रार्थना करें और थोड़ा ध्यान करंे’।
आरोपी वकील राकेश किशोर ने नारा लगाया कि सनातन का अपमान बर्दाश्त नहीं करेंगे। जाहिर है उन्हें ठेस लगी थी। वैसे पिछले काफी समय से माननीय न्यायालयों का रूख सनातन के प्रति उतना सहिष्णु नहीं दिखता जितना अन्य धर्मों के प्रति दिखता है।
हालांकि जूता फंेककर अपनी नाराजगी जाहिर करने का तरीका काफी पुराना है। पहले भी ऐसी घटनाएं देश में हो चुकी हैं। इससे पहले मनमोहन सिंग, लालकृष्ण आडवानी,नवीन जिंदल,उमर अब्दुल्ला और जितेनराम मांझी पर जूते फेंकने की घटनाएं हो चुकी हैं।
जवाहर नागदेव वरिष्ठ पत्रकार , लेखक, चिन्तक, विश्लेषक
मोबा 9522170700
‘बिना छेड़छाड़ के लेख का प्रकाशन किया जा सकता है’










