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EXCLUSIVE: ‘राम को कॉमिक हीरो की तरह दिखाना ठीक नहीं’, नई रामायण की कास्टिंग से लेकर गानों पर खुलकर बोले लक्ष्मण

प्रभात खबर से खास बातचीत में सुनील लहरी ने इन सभी सवालों पर अपनी राय रखी. उन्होंने साफ कहा कि राम को उछलते-कूदते सुपरहीरो या कॉमिक हीरो की तरह दिखाना उन्हें पसंद नहीं आया. उन्होंने नई रामायण की कुछ कास्टिंग पर भी असहमति जताई और कहा कि रामायण की सबसे बड़ी ताकत उसके स्पेशल इफेक्ट्स नहीं, बल्कि दर्शकों के दिल में बसी उसकी भावनाएं हैं. पढ़िए सुनील लहरी से यह बेबाक बातचीत.

नितेश तिवारी की ‘रामायण’ को लेकर काफी चर्चा है. आपने ट्रेलर देखा. लक्ष्मण के रूप में रामायण को जी चुके कलाकार के तौर पर आपका पहला रिएक्शन क्या था?

सुनील लहरी: देखिए, ट्रेलर का उद्देश्य दर्शकों के भीतर उत्सुकता पैदा करना होता है. मैं यहां दर्शक के साथ-साथ सिनेमा और इस क्षेत्र के एक विद्यार्थी के तौर पर अपनी बात रखना चाहूंगा. ट्रेलर में कुछ चीजें अच्छी लगीं, लेकिन कुछ बातें ऐसी थीं जो मुझे समझ नहीं आईं और थोड़ी अजीब लगीं.

रामायण भारतीय संस्कृति में बहुत गहराई से रचा-बसा विषय है. भगवान राम, भगवान विष्णु के अवतार हैं. ऐसे में उन्हें पेड़ों पर छलांग लगाते हुए या तलवार लेकर इस तरह दिखाना, जैसे कोई सुपरहीरो हो, मुझे बहुत कन्विंसिंग नहीं लगा. राम वीर थे, उनकी शक्तियां थीं, लेकिन वह इस तरह के कॉमिक हीरो नहीं थे कि बस उछलते-कूदते नजर आएं.

फिल्म बनाने वालों के दिमाग में क्या था, उन्होंने ऐसा क्यों किया, इस पर मैं कुछ नहीं कह सकता. लेकिन मेरा निजी रिएक्शन बहुत उत्साहजनक नहीं था. मुझे लगा कि जिस विषय में हमारी संस्कृति और सनातन परंपरा की इतनी गहरी जड़ें हैं, उसे कहीं न कहीं व्यावसायिक रूप देने की कोशिश की गई है. ऐसा लगा कि आज देश में रामायण को लेकर जो जागरूकता और उत्साह है, फिल्म निर्माता उसी को एक बड़े सुपरपावर वाले रूप में दुनिया के सामने पेश करना चाहते हैं. लेकिन मेरे लिए रामायण का अर्थ सिर्फ शक्तियों का प्रदर्शन नहीं है.

नई रामायण में अरुण गोविल भी राजा दशरथ के किरदार में दिखाई देंगे. उन्हें लंबे समय तक राम के रूप में देखा है. क्या आप उन्हें इस भूमिका में स्वीकार कर पा रहे हैं?

सुनील लहरी: अगर आप मेरी बिल्कुल निजी राय जानना चाहते हैं, तो मैं कहूंगा कि अगर मुझे इस तरह का प्रस्ताव मिलता, तो शायद मैं यह भूमिका नहीं करता.

आपकी एक छवि बन जाती है. लोगों के मन में आपके प्रति आदर और सम्मान की भावना होती है. मुझे लगता है कि इस तरह की भूमिकाओं से कभी-कभी वह छवि थोड़ी कमजोर या धुंधली हो सकती है. यह मेरा व्यक्तिगत विचार है. अरुण क्या सोचते हैं, उन्होंने यह भूमिका क्यों स्वीकार की, यह उनका अपना फैसला है. हर कलाकार को अपने फैसले लेने की आजादी है.

हो सकता है कि उनके मन में यह बात रही हो कि उन्होंने कम उम्र में राम का किरदार निभाकर अपनी अभिनय क्षमता दिखाई थी और अब इस उम्र में दशरथ के रूप में अपनी प्रतिभा का एक दूसरा पक्ष दिखाना चाहते हों. यह भी संभव है.

हालांकि, उनके और राम के बीच वाले दृश्य में उनका भावनात्मक रूप मुझे अच्छा लगा. उनका वह दृश्य काफी भावुक था. इसलिए मैं यह नहीं कहूंगा कि उनके काम में कुछ भी अच्छा नहीं लगा. मेरी असहमति भूमिका चुनने के फैसले को लेकर है, उनके अभिनय के हर पहलू को लेकर नहीं.

‘आदिपुरुष’ को लेकर काफी आलोचना हुई थी. अब ‘रामायण’ आ रही है. क्या ऐसी कहानी बनाने वाले निर्देशक और लेखक की जिम्मेदारी सामान्य फिल्मों से ज्यादा हो जाती है?

सुनील लहरी: बिल्कुल. मैं इस बात को दो नजरियों से देखता हूं- एक दर्शक के तौर पर और दूसरा फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े व्यक्ति के तौर पर.

रामायण की कहानी लोगों को मालूम है. लोग उसे पढ़ते आए हैं, देखते आए हैं और उसके पात्रों को अपने मन में बसाए हुए हैं. रामानंद सागर साहब ने जो रामायण बनाई, उसकी सादगी और उसकी प्रस्तुति लोगों के दिलों में जगह बना चुकी है. उसके बाद भी कई लोगों ने रामायण बनाई, लेकिन उस सादगी के साथ छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए.

जब आप किसी स्थापित और आस्था से जुड़े विषय को बिल्कुल अलग बनाने की कोशिश में उसकी मूल भावना से दूर चले जाते हैं, तो दर्शकों की नाराजगी का सामना करना पड़ सकता है.

‘आदिपुरुष’ के बाद फिल्म बनाने वालों ने जरूर कुछ सीखा होगा. लेकिन कभी-कभी ऐसा होता है कि निर्माता सोचते हैं कि हमें कुछ नया करना है, दर्शकों को कुछ अलग देना है. इसी कोशिश में वे जरूरत से ज्यादा आगे निकल जाते हैं. जब आप मूल कहानी की सादगी को खत्म करने लगते हैं, तो चीजें आपके नियंत्रण से बाहर हो सकती हैं.

अगर नई ‘रामायण’ में भी ऐसा हुआ, तो दर्शकों की उम्मीदों पर खरा उतरना मुश्किल होगा. ऐसी स्थिति में यह फिल्म भी बड़ी निराशा साबित हो सकती है.

दर्शकों के सामने नई ‘रामायण’ की तुलना किससे होगी- ‘आदिपुरुष’ से या रामानंद सागर की पुरानी रामायण से?

सुनील लहरी: ‘आदिपुरुष’ को तो लोग शायद तुलना के लिए भी याद नहीं करेंगे. असली तुलना उस रामायण से होगी, जिसकी छवि पिछले 35-40 वर्षों से लोगों के मन में बसी हुई है. अगले साल उस रामायण को करीब 40 साल हो जाएंगे.

दर्शकों के मन में जो छवि है, उसे बदलना आसान नहीं है. अगर आप उस छवि को पीछे छोड़ना चाहते हैं, तो आपको उसी स्तर की भावनाएं, वैसी ही दिव्यता और वैसा ही दिल से जुड़ाव पैदा करना होगा.

आप कितने भी स्पेशल इफेक्ट्स लगा लीजिए, 4,000 करोड़ या 40,000 करोड़ रुपये खर्च कर दीजिए, उससे अपने आप वह भावनात्मक जुड़ाव नहीं आ जाएगा. दर्शकों के लिए पैसा और तकनीक अंतिम चीज नहीं हैं. वे यह देखते हैं कि कहानी उनके दिल को छू रही है या नहीं.

हमारी रामायण में स्पेशल इफेक्ट्स के नाम पर आज जैसी तकनीक नहीं थी. आज उसे देखिए तो कई बार हनुमान जी के उड़ने या जटायु जैसे पात्रों को दिखाने के तरीके आपको पुराने और बचकाने लग सकते हैं. लेकिन इसके बावजूद लोग उस रामायण को देखते हैं, क्योंकि उसका भावनात्मक असर आज भी कायम है.

यानी आपके लिए रामायण की असली ताकत उसके स्पेशल इफेक्ट्स नहीं, बल्कि उसकी भावनाएं हैं?

सुनील लहरी: बिल्कुल. मैं आपको एक उदाहरण देता हूं. 2017-18 के आसपास भी लोग मुझसे कहते थे कि रामायण को दोबारा टेलीकास्ट करना चाहिए. उस समय मैंने सागर साहब की अगली पीढ़ी के लोगों से भी इस बारे में बात की थी. उनका कहना था कि आज के दर्शक बहुत स्मार्ट हो गए हैं. उन्हें पुरानी तकनीक और पुराने स्पेशल इफेक्ट्स बचकाने लगेंगे. इसलिए दोबारा दिखाने का कोई खास मतलब नहीं है.

लेकिन कोरोना काल में जब रामायण का दोबारा प्रसारण हुआ, तो दर्शकों ने उसे जबरदस्त प्यार दिया. लोगों के पास मनोरंजन के सैकड़ों विकल्प थे. खेल, समाचार, मनोरंजन और अंतरराष्ट्रीय चैनल- सब कुछ था. रामायण पहले भी कई चैनलों पर दिखाई जा चुकी थी और यूट्यूब पर भी उपलब्ध थी. फिर भी उसके दोबारा प्रसारण ने करीब 7.77 करोड़ दर्शकों का रिकॉर्ड बनाया.

इससे यह साबित होता है कि दर्शक सिर्फ तकनीक नहीं देखते. उन्हें कहानी से जुड़ी भावनाएं आकर्षित करती हैं. हम जैसे लोग भी कई बार पुराने दृश्यों को देखकर सोचते हैं कि यह तकनीकी रूप से बेहतर हो सकता था. किसी दृश्य में पीछे का रंग बदल गया, किसी कलाकार ने अलग-अलग किरदार निभाए- आज सोशल मीडिया के दौर में लोग ऐसी छोटी-छोटी चीजों को पकड़ लेते हैं. लेकिन आम दर्शक के मन में जो भावना बैठी है, वह इन कमियों से बड़ी है.

पुरानी रामायण में कई कलाकारों ने एक से ज्यादा किरदार निभाए थे. जटायु का किरदार निभाने वाले कलाकार ने इंद्रदेव की भूमिका भी की थी. उस समय ऐसा कैसे संभव हो पाता था?

सुनील लहरी: उस समय काम करने का तरीका आज से काफी अलग था. कई कलाकार छोटे-छोटे किरदार निभाते थे. किसी कलाकार ने पहले इंद्रदेव का किरदार निभाया और बाद में उसे जटायु का रोल मिल गया. जटायु के किरदार में उसका चेहरा पंखों और दूसरे कॉस्ट्यूम से काफी हद तक ढक जाता था. वहां हमें ऐसे कलाकार की जरूरत थी जो शरीर की गतिविधियों के जरिए उस किरदार को निभा सके.

ऐसे में किसी पहले से जुड़े कलाकार को ही कह दिया जाता था कि तुम यह रोल कर लो. कलाकार को भी लगता था कि चलो, एक-दो महीने का काम और मिल जाएगा. दोनों के लिए यह ठीक था.

उस समय साप्ताहिक कार्यक्रम बनते थे. सोशल मीडिया नहीं था और हर चीज को आज की तरह बारीकी से जांचने का चलन भी नहीं था. निर्माता ऐसे कलाकारों के साथ काम करना पसंद करते थे, जिन्हें वे जानते थे, जो समय पर आते थे, अपना काम करते थे और बिना परेशानी के चले जाते थे.

आज के दौर में चीजें बदल गई हैं. अब एक ही कलाकार को अलग-अलग किरदारों में देखना दर्शकों की नजर से बचाना मुश्किल है. लेकिन उस समय यह काम करने का एक व्यावहारिक तरीका था.

नई ‘रामायण’ में सबसे जरूरी क्या है, जिसे फिल्म बनाने वालों को किसी भी कीमत पर नहीं खोना चाहिए?

सुनील लहरी: भावनाओं के साथ खिलवाड़ नहीं होना चाहिए. लोगों के दिमाग में रामायण की जो छवि बनी हुई है, उसके साथ छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए.

रामायण दिमाग का नहीं, दिल और भावनाओं का विषय है. आप तकनीक से दर्शकों को चौंका सकते हैं, लेकिन दिल से जोड़ने के लिए कहानी की आत्मा को समझना पड़ेगा. अगर दर्शकों को वह भावनात्मक जुड़ाव महसूस हुआ, तो फिल्म जरूर सफल हो सकती है. लेकिन अगर आप सिर्फ तकनीक, भव्यता और अलग दिखने की कोशिश में लग गए, तो बात नहीं बनेगी.

टीवी से बॉलीवुड में कदम रखने जा रहे रवि दुबे नई ‘रामायण’ में लक्ष्मण का किरदार निभा रहे हैं. आपने उनका काम देखा है? क्या वह इस भूमिका के लिए सही हैं?

सुनील लहरी: अभी तक मुझे रवि की व्यक्तिगत अभिनय क्षमता को किसी स्वतंत्र दृश्य में देखने का बहुत स्पष्ट मौका नहीं मिला है. अब तक जो कुछ दिखाई दिया है, उसमें वे दूसरे कलाकारों के साथ नजर आए हैं. इसलिए अभी उनके बारे में अंतिम राय देना मुश्किल होगा.

लेकिन मैंने उनका टीवी पर काम देखा है. वह अच्छे अभिनेता हैं और एक सुलझे हुए कलाकार लगते हैं. मुझे उम्मीद है कि उन्होंने इस किरदार के लिए मेहनत की होगी और मौका मिला, तो वह इसे अच्छी तरह निभा सकते हैं.

हालांकि, इतनी बड़ी फिल्म में बहुत बड़े कलाकारों के बीच किसी नए या अपेक्षाकृत छोटे कलाकार की अपनी पहचान कितनी उभरकर आती है, यह भी देखने वाली बात होगी. फिल्म इंडस्ट्री में यह कोई छिपी हुई बात नहीं है कि कभी-कभी बड़े सितारों के सामने किसी दूसरे कलाकार का काम ज्यादा प्रभावशाली लगने लगे, तो उस पर दबाव बनाया जा सकता है या उसके किरदार को सीमित किया जा सकता है. मैं यह नहीं कह रहा कि इस फिल्म में ऐसा हुआ है, लेकिन बड़े स्तर की फिल्मों में कलाकार की भूमिका और उसे मिलने वाली जगह भी महत्वपूर्ण होती है.

तो क्या आप नई ‘रामायण’ की कास्टिंग से खुश हैं?

सुनील लहरी: कुछ कास्टिंग को लेकर मैं पूरी तरह संतुष्ट नहीं हूं. किसी भी किरदार के लिए सबसे पहले उसका लुक और पहली छवि मायने रखती है. बाद में आप अभिनय और बाकी बारीकियों पर जाते हैं. रामायण जैसे विषय में यह बात और महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि पात्रों की छवियां पहले से लोगों के मन में बसी हुई हैं.

साई पल्लवी सीता की भूमिका निभा रही हैं. आपको वह इस किरदार के लिए कैसी लगीं?

सुनील लहरी: साई पल्लवी बहुत अच्छी अभिनेत्री हैं. उनके अभिनय पर सवाल नहीं है. लेकिन सीता की जो एक दिव्य छवि मेरे मन में है, वह मुझे उनके लुक में उतनी स्पष्ट नहीं दिखाई दी.

मुझे लगा कि उनके चेहरे और फीचर्स किसी दूसरे तरह के किरदार के लिए ज्यादा उपयुक्त हो सकते हैं. मेरी निजी राय में उनका लुक शूर्पणखा के किरदार के लिए ज्यादा अनुकूल लग सकता था.

हालांकि, शूर्पणखा के किरदार में भी कई पहलू हैं. एक तरफ उसका आकर्षक रूप है, जिससे वह राम और लक्ष्मण को रिझाने की कोशिश करती है, दूसरी तरफ उसका राक्षसी रूप है. ऐसे में यह देखना होगा कि अभिनेत्री अपने हाव-भाव, आवाज, चाल और चेहरे के भावों से उस किरदार को कैसे निभाती है. सिर्फ लुक के आधार पर किसी कलाकार के पूरे अभिनय को खारिज नहीं किया जा सकता.

अगर आपको सीता के किरदार के लिए किसी अभिनेत्री का नाम सुझाना हो, तो आप किसे चुनते?

सुनील लहरी: अगर कुछ साल पहले की ऐश्वर्या राय को देखें, तो मुझे लगता है कि वह सीता के रूप में अच्छी लग सकती थीं. मैं आज की ऐश्वर्या की बात नहीं कर रहा हूं, बल्कि उनके कुछ साल पहले के लुक की बात कर रहा हूं.

एक बार मुझसे आलिया भट्ट के बारे में भी पूछा गया था. उस समय मैं पूरी तरह आश्वस्त नहीं था, लेकिन लुक के लिहाज से आलिया इस भूमिका के लिए बेहतर विकल्प हो सकती थीं. वह अच्छी अभिनेत्री भी हैं. सवाल सिर्फ अभिनय का नहीं है, बल्कि यह भी है कि दर्शक किसी कलाकार को उस विशेष किरदार में कितना स्वीकार कर पाते हैं.

रणबीर कपूर राम का किरदार निभा रहे हैं. उनकी कास्टिंग और दर्शकों के बीच उनकी छवि को आप किस तरह देखते हैं?

सुनील लहरी: रणबीर अच्छे अभिनेता हैं. लेकिन राम जैसे किरदार के लिए सिर्फ अभिनय क्षमता काफी नहीं है. दर्शकों के मन में भगवान राम की एक छवि है और उस छवि से जुड़ने के लिए कलाकार के हाव-भाव, व्यक्तित्व और भावनात्मक प्रस्तुति बहुत मायने रखते हैं.

मुझे लगता है कि रणबीर अपनी छवि को बेहतर बनाने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन आज के दर्शक बहुत समझदार हैं. वे पहचान लेते हैं कि कोई चीज स्वाभाविक है या सिर्फ छवि बनाने के लिए की जा रही है.

उनके एक बयान में बुराई पर अच्छाई की जीत की बात को लेकर जो अभिव्यक्ति सामने आई थी, वह मुझे पूरी तरह स्वाभाविक नहीं लगी. संभव है कि वह जुबान फिसलने का मामला रहा हो, लेकिन जब आप कोई बात गहरी भावना के साथ कहते हैं, तो वह आपके हाव-भाव और चेहरे पर भी दिखाई देती है. मुझे उस वक्त वह भाव उतनी गहराई से नजर नहीं आया.

फिर भी, फिल्म देखे बिना उनके पूरे अभिनय पर फैसला देना सही नहीं होगा. आखिरकार, असली परीक्षा फिल्म में उनके किरदार की प्रस्तुति और दर्शकों के साथ उनके जुड़ाव की होगी.

फिल्म का स्वयंवर गीत भी चर्चा में है. एआर रहमान के संगीत में बने इस गाने को लेकर आपकी क्या राय है?

सुनील लहरी: मैंने गाने का कुछ हिस्सा सुना है. उसमें सूफी या कव्वाली जैसा पैटर्न इस्तेमाल किया गया है. मुझे वह थोड़ा निराशाजनक लगा.

देखिए, सीता मिथिला की थीं. मिथिला की संस्कृति बहुत समृद्ध है. वहां विवाह के अपने पारंपरिक लोकगीत हैं, अपनी धुनें और अपनी सांस्कृतिक परंपराएं हैं. मैंने भारतीय शादियों की परंपराओं पर एक सीरियल भी बनाया है, जिसमें पंजाबी, बंगाली, मारवाड़ी और दूसरी संस्कृतियों की शादियों को लेकर काम किया. इस दौरान मैंने अलग-अलग क्षेत्रों के पारंपरिक विवाह गीतों को सुना और समझा है.

इसलिए मुझे लगता है कि सीता के स्वयंवर के गीत में मिथिला की संस्कृति की झलक होनी चाहिए थी. हमारी पुरानी रामायण में भी सीता की सखियां मिलकर गाती थीं. वह दृश्य बहुत अपना और सुंदर लगता था.

मुझे लगता है कि इतने बड़े संगीतकार को यह सोचना चाहिए था कि इस प्रसंग की सांस्कृतिक गरिमा क्या है. यह सिर्फ एक फिल्मी गाना नहीं है. यह उस समय की कहानी है, जब मिथिला के राजा की बेटी सीता का स्वयंवर हो रहा है. ऐसे में उस दौर, उस जगह और वहां की लोक परंपराओं को ध्यान में रखकर संगीत तैयार किया जाता, तो ज्यादा अच्छा लगता.

मैंने पूरा गाना नहीं सुना है, इसलिए उसके हर हिस्से पर टिप्पणी नहीं करूंगा. लेकिन जितना सुना, वह मुझे प्रभावित नहीं कर पाया. मुझे लगा कि यह प्रसंग अपनी सांस्कृतिक जड़ों से ज्यादा फिल्मी अंदाज में पेश किया गया है.

यानी आपको नई ‘रामायण’ में आधुनिकता से परेशानी नहीं है, लेकिन कहानी की मूल भावना और संस्कृति से दूरी स्वीकार नहीं है?

सुनील लहरी: बिल्कुल. समय के साथ तकनीक बदलती है, सिनेमा बनाने का तरीका बदलता है और दर्शकों की अपेक्षाएं भी बदलती हैं. इन बदलावों से किसी को परेशानी नहीं होनी चाहिए. लेकिन बदलाव का मतलब यह नहीं कि आप मूल विषय की आत्मा को ही पीछे छोड़ दें.

रामायण को आज के दर्शकों के सामने बेहतर तकनीक के साथ पेश किया जा सकता है. लेकिन उसकी सादगी, उसकी दिव्यता, उसके पात्रों की गरिमा और उसकी भावनाएं भी उतनी ही जरूरी हैं. अगर ये चीजें कायम रहीं, तो नई पीढ़ी भी उससे जुड़ सकती है.

आखिर में दर्शक वही याद रखते हैं, जो उनके दिल को छूता है. इसलिए मेरी उम्मीद यही है कि फिल्म बनाने वाले रामायण की भावनाओं और उसकी सांस्कृतिक गरिमा को सबसे ऊपर रखें.

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