
US Midterm Elections Results: ट्रंप की यह रणनीति भारत में बीजेपी सरकार के लिए भी एक सबक मानी जा सकती है. केंद्र सरकार संसद में परिसीमन से जुड़ा बिल लेकर आई थी, जिसका विपक्ष ने जोरदार विरोध किया. इसके बाद बिल फिलहाल आगे नहीं बढ़ पाया. भारत में भी परिसीमन को लेकर राजनीतिक और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व की बहस जारी है. ऐसे में समझते हैं कि ट्रंप ने अमेरिका में चुनावी क्षेत्रों की सीमाएं क्यों बदलवाईं, इससे उन्हें क्या फायदा मिलने की उम्मीद थी और आखिर उनकी रणनीति क्यों नाकाम रही.
ट्रंप ने क्यों बदलवाए चुनावी क्षेत्रों के नक्शे?
एसोसिएटेड प्रेस (AP) की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप के कहने पर पिछले एक साल में आठ राज्यों में कांग्रेस के कई चुनावी क्षेत्रों की सीमाएं दोबारा तय की गई थीं. इसका मकसद प्रतिनिधि सभा (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स) में रिपब्लिकन पार्टी का मामूली बहुमत बनाए रखना था.
अमेरिका में आमतौर पर हर दस साल में जनगणना के बाद संसदीय क्षेत्रों की सीमाएं दोबारा तय की जाती हैं. ऐसा आबादी में बदलाव के हिसाब से चुनावी क्षेत्रों का पुनर्गठन करने के लिए किया जाता है. लेकिन ट्रंप ने 2026 के मध्यावधि चुनाव से पहले ही इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की कोशिश की. उन्होंने रिपब्लिकन शासन वाले राज्यों में चुनावी क्षेत्रों का नक्शा बदलने का दबाव बनाया.
इसकी शुरुआत टेक्सास से हुई. इसके बाद आठ राज्यों में दर्जनों संसदीय क्षेत्रों की सीमाओं में बदलाव किया गया. रिपब्लिकन पार्टी को उम्मीद थी कि इससे प्रतिनिधि सभा में उसे अतिरिक्त सीटें मिल सकती हैं.
टेक्सास में पार्टी पांच अतिरिक्त सीटें जीतने की तैयारी कर रही थी. फ्लोरिडा में चार और ओहायो में दो सीटों पर फायदा उठाने की योजना थी. इसके अलावा अलबामा, लुइसियाना, नॉर्थ कैरोलिना और टेनेसी में भी चुनावी क्षेत्रों का पुनर्गठन किया गया.
हालांकि, यह रणनीति हर जगह काम नहीं आई. अलबामा, फ्लोरिडा और टेक्सास में रिपब्लिकन को उम्मीद के मुताबिक सफलता नहीं मिली. मिसौरी में अदालतों ने इस योजना को रोक दिया और बाद में मतदाताओं ने भी इसे खारिज कर दिया. दूसरी तरफ कैलिफोर्निया में डेमोक्रेट्स ने जवाबी रणनीति अपनाई और चुनावी क्षेत्रों की सीमाएं बदलकर रिपब्लिकन के निशाने वाली पांचों सीटें जीत लीं.
चुनाव में ट्रंप की रणनीति क्यों फेल हो गई?
ट्रंप की रणनीति की सबसे बड़ी कमजोरी यह थी कि इसमें मान लिया गया था कि मतदाताओं का राजनीतिक रुझान पहले जैसा ही बना रहेगा. जिन इलाकों में 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में ट्रंप को बढ़त मिली थी, वहां रिपब्लिकन पार्टी ने अपने फायदे के हिसाब से चुनावी क्षेत्रों की सीमाएं तय करवाईं. लेकिन दो साल के भीतर मतदाताओं का रुख बदल गया.
ट्रंप सरकार के कामकाज से नाराजगी, महंगाई और ईरान के साथ युद्ध को लेकर असंतोष ने चुनावी माहौल प्रभावित किया. इसका असर खासतौर पर उन इलाकों में दिखाई दिया, जहां रिपब्लिकन पार्टी को अपनी जीत का भरोसा था.
टेक्सास में रिपब्लिकन पार्टी जिन पांच अतिरिक्त सीटों को जीतने का लक्ष्य लेकर चल रही थी, उनमें से उसे सिर्फ एक पर सफलता मिली. इसके उलट डेमोक्रेटिक पार्टी ने रिपब्लिकन की दो सीटें छीन लीं.
फ्लोरिडा और अलबामा में भी रिपब्लिकन पार्टी अपनी रणनीति के मुताबिक नतीजे हासिल नहीं कर सकी. कैलिफोर्निया में डेमोक्रेट्स ने जवाबी रणनीति के तहत चुनावी नक्शे बदले और रिपब्लिकन के निशाने पर रखी गई सभी पांच सीटों पर जीत दर्ज की.
यानी चुनावी क्षेत्रों की सीमाएं बदलने से रिपब्लिकन पार्टी को जो राजनीतिक बढ़त मिलने की उम्मीद थी, मतदाताओं के बदले रुख ने उसे काफी हद तक बेअसर कर दिया.
गेरिमैंडरिंग क्या है?
अमेरिका में चुनावी क्षेत्रों की सीमाएं किसी राजनीतिक दल को फायदा पहुंचाने के मकसद से बदलने की प्रक्रिया को गेरिमैंडरिंग (Gerrymandering) कहते हैं.
इसमें चुनावी क्षेत्रों का नक्शा इस तरह तैयार किया जाता है कि किसी पार्टी के समर्थक एक खास क्षेत्र में ज्यादा संख्या में आ जाएं या विपक्षी पार्टी के समर्थकों को अलग-अलग क्षेत्रों में बांट दिया जाए. इससे चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की कोशिश की जाती है.
गेरिमैंडरिंग के दो प्रमुख तरीके हैं
पैकिंग (Packing): इसमें विपक्षी पार्टी के ज्यादा से ज्यादा समर्थकों को एक ही चुनावी क्षेत्र में समेट दिया जाता है. इससे वे एक सीट पर तो बड़ी संख्या में जीत दिला सकते हैं, लेकिन दूसरे क्षेत्रों के नतीजों को प्रभावित करने की उनकी क्षमता कम हो जाती है.
क्रैकिंग (Cracking): इसमें विपक्षी पार्टी के समर्थकों को अलग-अलग चुनावी क्षेत्रों में बांट दिया जाता है. इससे किसी एक क्षेत्र में उनकी संख्या इतनी नहीं रह जाती कि वे निर्णायक साबित हो सकें.
बीजेपी के लिए इसमें क्या सबक है?
भारत में भी लोकसभा सीटों के परिसीमन को लेकर राजनीतिक बहस चल रही है. परिसीमन का मतलब आबादी और तय संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाएं तय करना है. इसके तहत चुनावी क्षेत्रों का पुनर्गठन किया जाता है और प्रतिनिधित्व का सवाल भी इससे जुड़ा होता है. इसी वजह से आगामी परिसीमन को लेकर उत्तर और दक्षिण भारत के राज्यों के बीच राजनीतिक प्रतिनिधित्व का सवाल महत्वपूर्ण हो गया है.
उत्तर भारत के कई राज्यों की आबादी में तेजी से बढ़ोतरी हुई है, जबकि दक्षिण भारत के राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है. ऐसे में अगर आबादी को मुख्य आधार बनाकर सीटों का बंटवारा किया गया, तो उत्तर भारत के राज्यों को ज्यादा सीटें मिल सकती हैं. वहीं दक्षिणी राज्यों को आशंका है कि लोकसभा में उनकी हिस्सेदारी कम हो सकती है.
बीजेपी का राजनीतिक आधार उत्तर भारत के कई बड़े राज्यों में मजबूत रहा है. ऐसे में परिसीमन के जरिए सीटों के नए बंटवारे का राजनीतिक असर भी हो सकता है. लेकिन अमेरिका के अनुभव से एक बात साफ होती है कि चुनावी क्षेत्रों की सीमाएं बदलने या सीटों की संख्या बढ़ने भर से चुनावी जीत सुनिश्चित नहीं होती. आखिरकार मतदाताओं का रुख और सरकार के कामकाज के प्रति उनकी राय ही नतीजों को प्रभावित करती है.
दक्षिणी राज्यों को परिसीमन से क्यों है चिंता?
तमिलनाडु और केरल समेत दक्षिण भारत के कई राज्यों को आशंका है कि अगर लोकसभा सीटों का बंटवारा मौजूदा आबादी के आधार पर हुआ, तो उनकी संसदीय हिस्सेदारी घट सकती है.
दरअसल, पिछले पांच दशकों में दक्षिणी राज्यों ने परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण के राष्ट्रीय लक्ष्यों को बेहतर तरीके से लागू किया है. इसके चलते यहां आबादी बढ़ने की रफ्तार उत्तर भारत के कई राज्यों की तुलना में कम रही है.
अब दक्षिणी राज्यों का तर्क है कि जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में सफलता हासिल की है, उन्हें इसका नुकसान नहीं उठाना चाहिए. अगर परिसीमन में केवल आबादी को आधार बनाया गया, तो इन राज्यों का लोकसभा में प्रतिनिधित्व प्रभावित हो सकता है.
इसी वजह से परिसीमन का मुद्दा केंद्र सरकार और दक्षिणी राज्यों के बीच राजनीतिक बहस का विषय बन गया है.
एसवाई कुरैशी ने परिसीमन को बताया विवादित मुद्दा
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) एसवाई कुरैशी ने परिसीमन को विवादित और बहस का विषय बताया है. उन्होंने उम्मीद जताई कि केंद्र सरकार और विपक्ष इस मुद्दे पर जल्द किसी साझा सहमति तक पहुंचेंगे.
परिसीमन को लेकर विपक्ष की मुख्य चिंता यह है कि इससे राज्यों के बीच राजनीतिक प्रतिनिधित्व का संतुलन प्रभावित हो सकता है. खासतौर पर दक्षिणी राज्यों का कहना है कि जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने के बावजूद उन्हें कम राजनीतिक हिस्सेदारी का सामना नहीं करना चाहिए.
अमित शाह का दावा- दक्षिण का प्रतिनिधित्व घटेगा नहीं, बढ़ेगा
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने परिसीमन बिल पर चर्चा के दौरान लोकसभा में दक्षिणी राज्यों के प्रतिनिधित्व को लेकर उठ रही आशंकाओं का जवाब दिया था.
उन्होंने कहा था कि परिसीमन के बाद दक्षिण भारत का प्रतिनिधित्व कम नहीं होगा, बल्कि बढ़ेगा. शाह के मुताबिक, अभी दक्षिणी राज्यों से लोकसभा में 129 सदस्य आते हैं और सदन में उनका प्रतिनिधित्व 23.76 फीसदी है.
उन्होंने बताया था कि 50 फीसदी सीटें बढ़ने के बाद दक्षिणी राज्यों की सीटें बढ़कर 195 हो जाएंगी. इसके साथ ही लोकसभा में उनकी हिस्सेदारी भी 23.76 फीसदी से बढ़कर 23.97 फीसदी यानी करीब 24 फीसदी हो जाएगी.
शाह ने इसी आंकड़े के आधार पर दावा किया था कि परिसीमन से दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व घटने के बजाय बढ़ेगा.
2029 से पहले परिसीमन लागू नहीं होगा: अमित शाह
अमित शाह ने 16 अप्रैल को संसद में चर्चा के दौरान परिसीमन की प्रक्रिया और उसके लागू होने को लेकर भी स्थिति स्पष्ट की थी.
उन्होंने कहा था कि परिसीमन आयोग की रिपोर्ट संसद की स्वीकृति और राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद ही लागू होगी. शाह के मुताबिक, 2029 से पहले नई परिसीमन व्यवस्था लागू होने का सवाल नहीं है. तब तक सभी चुनाव मौजूदा व्यवस्था के तहत ही कराए जाएंगे.






