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अजीत जोगी विधायक खरीद काण्ड से मुक्त, काॅलबेल इन जेल,नहीं बिक रहा सरकारी घटिया माल, वरिष्ठ पत्रकार जवाहर नागदेव की खरी…. खरी….

मस्ती में भरपूर बढ़िया मौसम का मजा लूटते पण्डित झण्डू ने कहा ‘जरा सोच के देख संगी, शासन के बड़े-बड़े अधिकारी जेल में बंद अपने मंत्री या मुख्यमंत्री के बैरक में जाकर दरवाजा खटखटाएंगे कि सर आादेश दीजिये और इस कागज पर आपके साईन चाहियंे।

मियां बण्डू कहां पीछे रहने वाले थे। बोल पड़े – दरवाजा क्यो खटखाएंगे भाई, काॅलबेल लगवाएंगे न। इतना बड़ा आदमी क्या काॅलबेल नहीं लगवाएगा ?

बैरक के बाहर खड़े होकर बड़े-बड़े अधिकारी काॅल बेल बजाएंगे।

दोनों दोस्त ठठाकर हंस पड़े।लेकिन मोदी-शाह हैं कि जेल जाने वाले को पद पर नहीं बने रहने देना चाहते। कहते हैं मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री पर बेईमानी करने का आरोप लगा और पकड़े गये तो 30 दिन के अंदर इस्तीफा देना होगा।

ये तो नाइंसाफी हुई न….. दोनों दोस्त हंसते-हंसते घर की ओर चल दिये।

क्या क्षति की ‘पूर्ति’ होगी जोगी परिवार की

2003 के छत्त्ीसगढ विधानसभा चुनाव में भाजपा को बहुमत मिल गया था। यानि अजीत जोगी की सरकार नहीं बन पाई। तब नवनिर्मित छत्तीसगढ़ राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी पर सरकार बनाने के लिये भाजपा विधायकों को तोड़ने के प्रयास का आरोप लगा था।

सीबीआई ने केस दर्ज कर लिया था, बाद में सीबीआई जांच हुई और अब जाकर सीबीआई ने केस का खात्मा रिपोर्ट पेशकर मामले को खत्म कर दिया।

न्याय व्यवस्था में इतनी देरी के चलते न्याय मर जाता है। यदि खात्मा हुआ और अजीत जोगी और उनके पुत्र अमित जोगी बरी हो गये तो इतने साल तक उनके सम्मान को चोट लगी और उन्होंने तनाव झेला उसका जवाबदार कौन होगा ?

ऐसे सैकड़ों मामले हैं जिनमें सरकारी एजेंसियां मामले बना लेती हैं और बाद में आरोपी निर्दोष साबित होकर मुक्त हो जाते हैं।

ऐसी स्थिति में सरकार को इन लोगों को कोई क्षतिपूर्ति नहीं देनी चाहिये ? सरकारी अधिकारियों को माफी नहीं मांगनी चाहिये क्या ?

किसी के जीवन में तनाव घोलकर उसे आर्थिक और सामाजिक नुकसान पहंुचाने के लिये जवाबदारी तय क्यों नहीं की जानी चाहिये ?

कमीशन बिना काम नहीं मिल रहे दाम नहीं

सरकारी काॅलोनी के मंदिर के चारों ओर सड़क की नालियों को पानी बिखरा देखकर मंदिर के कर्ताधर्ता ने संकोच से भक्तों की ओर देखा।

उसकी आंखों में थोड़ी शर्मिन्दगी थी। उसने रोजाना के भक्तों से कहा – पानी का धर्म है बहना…. लिहाजा नाली का पानी बह रहा है और ढलान इस तरफ है और पानी का धर्म है ढलान की ओर जाना तो ईधर आ रहा है। ।

इस पर हाउसिंग बोर्ड के कर्मचारियों की आरामखोरी से त्रस्त एक काॅलोनी निवासी ने कहा – सरकारी लोगों का धर्म है काम नहीं करना लिहाजा नहीं कर रहे हैं… और सरकारी लोगों का काम है बिना रिश्वत काम नहीं करना क्योंकि तनख्वाह से उन्हें मोक्ष नहीं मिलता लिहाजा आराम कर रहे हैं।

इस सच्ची घटना में ये भी जोड़ दें कि हाउसिंग बोर्ड के मकान 30 प्रतिशत रेट कम कर देने के बाद भी नहीं बिक रहे हैं। कारण क्या है ?

प्राईवेट बिल्डरों के मकान इनसे महंगे हैं पर समय पर बिक जा रहे हैं ऐसा क्यों है ?

दरअसल सरकारी कालोनियों में जाकर एक बार घूम लेने से ही इस बात का कारण समझ में आ जाता है।

गार्ड नदारद, सफाई कर्मचारी नदारद, जगह-जगह पानी बहना, कोई देखने वाला नहीं, चोरियां लगातार, एक विशेष तबके के बच्चों द्वारा गाड़ियों को डैमेज करना।

आप शिकायत पे शिकायत करते रहिये अधिकारी अपनी कमाई में व्यस्त लगे रहते हैं। जब कभी माल कमाने को अवसर मिलता है तब ही इस तरफ ध्यान देते हैं।

निर्माण कार्य में कमीशन, व्यवस्थाओं में कमीशन, कमीशन बस कमीशन। कमीशन खत्म तो काम खत्म।

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जवाहर नागदेव,

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, चिन्तक, विश्लेषक

मोबा. 9522170700

‘बिना छेड़छाड़ के लेख का प्रकाशन किया जा सकता है’

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