
Diwali 2026: दिवाली का त्योहार आते ही बिहार के गांवों और कस्बों के आंगन एक खास रौनक से भर जाते हैं. कहीं घरों की सफाई होती है, तो कहीं रंगोली बनाई जाती है. लेकिन बिहार में दिवाली से पहले एक ऐसी परंपरा भी निभाई जाती है, जो बचपन की यादों और परिवार की खुशियों से जुड़ी है. यह परंपरा है मिट्टी का घरौंदा बनाने की.
घर की बेटियां अपने हाथों से छोटा सा घर बनाती हैं और उसे कुलहिया-चुकिया से सजाती हैं. यह सिर्फ मिट्टी का खिलौना नहीं, बल्कि सुख, समृद्धि और भरे-पूरे परिवार की कामना का प्रतीक माना जाता है.
Mitti Ka Gharaunda: मिट्टी, बांस और चूने से बनता है छोटा सा घरौंदा
बिहार में से पहले घर की बेटियां मिलकर आंगन में घरौंदा बनाती हैं. इसे बनाने के लिए मिट्टी, ईंट, बांस की तीलियों और दूसरी स्थानीय चीजों का इस्तेमाल किया जाता है. घरौंदे को अलग-अलग कमरों और दरवाजों का आकार दिया जाता है. इसके बाद चूने से उसकी पुताई की जाती है, जिससे वह देखने में किसी छोटे से असली घर जैसा लगता है.
इस परंपरा का सबसे खास हिस्सा होती हैं कुलहिया-चुकिया. ये मिट्टी से बने छोटे-छोटे बर्तन होते हैं, जिनमें खील और बताशे भरे जाते हैं. मान्यता है कि इन बर्तनों का भरा होना घर में कभी अन्न और धन की कमी न होने का प्रतीक है.
लोक मान्यताओं के अनुसार, के वनवास से अयोध्या लौटने की खुशी में घरौंदा बनाने की परंपरा को जोड़ा जाता है. मान्यता है कि उनके आगमन के बाद अयोध्या फिर से खुशियों से भर गई थी. इसी खुशी और समृद्धि की कामना के साथ बेटियां अपने आंगन में छोटा सा घर बनाती हैं.
इस दौरान परिवार के बड़े लोग बेटियों को आशीर्वाद देते हैं कि जिस तरह उनका घरौंदा भरा-पूरा रहे, उसी तरह उनका अपना घर भी हमेशा खुशियों और अन्न से भरा रहे.









