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एक शक्तिशाली स्त्री चाहे तो अपने संकल्प शक्ति से समाज और राष्ट्र को उचित दिशा में मोड़ सकती है

वन्दनीय मौसी जी (उपाख्याय) लक्ष्मी बाई केलकर
भारत एक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक चैतन्य धरा है। अतः यहाँ की विशिष्ट जीवन शैली एवं जीवन व्यवहार, यहाँ के जीवन दर्शन एवं इस जीवन दर्शन पर आधारित नीति निर्धारक तत्त्वों के आधार पर सुनिश्चित किया गया है। इस धरा पर जन्म लेने वाले प्रत्येक महान व्यक्तियों ने अपने-अपने चरित्र से विश्व को जीवन की दिशा दृष्टि एवं शिक्षा दी है। इस दिशा दर्शन में महिलाओं का भी सहभाग रहा है।

इसी कड़ी में राष्ट्र सेविका समिति की आद्य प्रमुख संचालिका वन्दनीय लक्ष्मीबाई केलकर जी ने भी इस भरत भूमि में जन्म लेकर अपने जीवन चरित्र से दिशा दर्शन दिया है। उन्होंनें अपने कृतित्व से दिखा दिया कि एक शक्तिशाली स्त्री चाहे तो अपने संकल्प शक्ति से समाज और राष्ट्र को उचित दिशा मे मोड़ सकती है।
वन्दनीय मौसी जी के विचार तरंगों से निकला नवनीत है… “एक विशाल महिला संगठन—राष्ट्र सेविका समिति” जिसकी स्थापना 1936 के विजयादशमी के दिन हुई।
किसी भी श्रेष्ठ कार्य का शुभारंभ करने वाली व्यक्ति की अंतर्दृष्टि, उस समय के सामाजिक, राजकीय एवं सांस्कृतिक परिस्थितियों का उस व्यक्ति के हृदय पर होने वाला परिणाम और उस अनुभव के आधार पर समाज और राष्ट्र के लिए कुछ करने की प्रबल इच्छा शक्ति हीं उसके कार्य प्रारंभ करने की प्रेरणा बनता है।

ऐसे हीं वातावरण में जन्म लेने वाली कन्या ने श्री भास्कर राव दाते एवं यशोदा बाई दाते जैसे सुसंस्कार घर को चुना। 6 जुलाई 1905, आषाढ़ शुक्ल दशमी के दिन नागपूर के राम मंदिर गली में जन्म लिया। जन्म के साथ हीं सुन्दर गुलाबी कोमल कमल सी काया देखकर डॉक्टर ने हीं उनका नामकरण संस्कार कर दिया—“कमल”। कमल के जन्म के समय का वातावरण ऐसा था कि महिलाओं का घर से निकलना भी एक मुश्किल विषय था।

बढ़ती उम्र में भूदान आन्दोलन स्वतंत्रता संग्राम जैसी आस-पास घटित होने वाली घटनाएँ, कमल बिटिया के बाल मन पर प्रभाव डाल रही थी। परन्तु युवा कमल पर सबसे ज्यादा प्रभाव लोकमान्य तिलक जी की उस गर्जना से हुआ जिससे अंग्रेज भी थर-थर कांपते थे। वह गर्जना थी-“स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे ले कर ही रहुँगा”। स्वराज्य, स्वधर्म और स्वदेश के प्रति यह गर्जना मौसी जी के अन्तर मन को छू गई। इसी विचार ने उन्हें परम पुज्य डाक्टर जी से मिलने को प्रेरित किया।

उस समय ने डाक्टर साहब ने कुछ नहीं कहा। परन्तु जब वह दूसरी बार मिली तो डॉक्टर जी ने कहा कि ‘मैंने तो अभी पुरुषों के बारे में ही विचार किया है’। यदि आप महिला संगठन कार्य की सर्वस्व जिम्मेदारी लेगी तो हम सहयोग देने को तैयार हैं। परंतु आपको स्वतंत्र रूप से यह कार्य करना होगा। ‘राष्ट्र सेविका समिति’ एवं ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ दोनों ही समानांतर संगठन रहेंगे। जैसे दो पटरी पर रेलगाड़ी दौड़ती है, वैसे ही एक ध्येय, एक विचार, एक पद्धति से चलने वाले यह दोनों संगठन परस्पर सहयोग करते हुए राष्ट्र निर्माण के कार्य में संलग्न रहेंगे।

डॉक्टर साहब ने लक्ष्मीबाई जी के कृतित्व को प्रथम भेंट में ही पहचान दिया था। एक जौहरी हीं हीरे को पहचान सकता है। मौसी जी ने प्रति प्रश्न किया– स्वतंत्र संगठन? इसी कौन सम्भालेगा? डॉक्टर साहब ने तुरंत उत्तर दिया- आप संभालेंगी। मौसी जी ने इस आवाहन को स्वीकार किया और इस कार्य को स्वयं करने का संकल्प लिया।

मौसी जी की यही संकल्प शक्ति का पालन, उन्होंने अपने जीवन के अंतिम क्षणों तक किया। यही संकल्प शक्ति प्रत्येक सेविका के कार्य का आधार बनी। आज राष्ट्र सेविका समिति की सेविकाएँ उनके जन्मदिन ‘आषाढ़ शुक्ल दशमी’ के दिन को संकल्प दिवस के रूप में मानती हैं। प्रतिवर्ष कार्य के लिए नए-नए संकल्प लेकर कार्य को तीव्रता प्रदान करती हैं।

उनके इस संकल्प शक्ति का प्रभाव इतना विशाल है कि संगठन अपने 90 वर्ष की पूर्णता की ओर अग्रसर है। मौसी जी के जीवन की साधना, तपस्या, प्रत्येक सेविका के अंतर मन को जागृति का मंत्र दे जाती है।

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