
आज सबसे ज्यादा निरीह प्राणी इस धरा पर कोई है तो वह शिक्षक नाम का जीव है । जिसका मुख्य काम तो शिक्षा देना था जो शिक्षा को छोड़ सारे काम कर रहे हालत यह है कि किसी को फेल नही कर सकते , किसी को मार नही सकते डांट नही सकते , नकल प्रकरण नही बना सकते तो उद्दंड बच्चों को काबू में कैसे रखेंगे जिन्हें उनके माँ बाप काबू नही कर पा रहे, ऊपर से बाल अधिकार और एस्ट्रोसिटी एक्ट का भय अलग। शिक्षक मोमबत्ती की तरह स्वयं जलकर बच्चों का भविष्य गढ़ता है किंतु इस नपुंसक बनाती व्यवस्था से गांव के स्कूल से लेकर आई आई टी मुम्बई तक अछूता नही है जहां बच्चों को डांटना डपटना नकल पकड़ना ,उद्दंडता से रोकता राष्ट्र व्यापी अपराध बन गया है। ऐसे में शिक्षक नाम का निरीह प्राणी करे भी तो क्या करे । कहते हैं “भय बिनु होई न प्रीत।” लेकिन आज के शिक्षा व्यवस्था ने इस कहावत को बदल कर रख दिया है । आज शिक्षक को ही भयभीत प्राणी बना दिया गया है । कभी शिक्षक के हाथ में किताब होती थी, चॉक और हाथ मे अनुशासन के लिए छड़ी होती थी , जरूरत पड़ने पर डांटने का नैतिक अधिकार भी। ए आई के दौर में आज किताब और चॉक तो किसी तरह बच गए हैं, अनुशासन के लिए पिटाई और डांट का अधिकार इतिहास की वस्तु बन चुका है। बच्चा पढ़े या न पढ़े, गृहकार्य करे या ना करे कॉपी की जगह मोबाइल देखे , शिक्षक बस मुस्कुराकर कह सकता है—“बेटा, ऐसा मत करो , पढ़ाई में ध्यान दो ।” इससे आगे बढ़े तो पता नहीं कौन-सा अधिकार जाग जाए और अफसर दौड़ा चला आये और शिक्षक नामक जीव पर आफत का पहाड़ गिर पड़े । अनुशासन की कोशिश करें तो माँ बाप सर चढ़ बैठेंगे हमारा बच्चा ऐसा नही है , आपने हमारे बच्चे को डांटा कैसे ? बच्चा घर जाकर दो टेसुंये बहा दे तो अगले दिन विद्यालय में शिक्षक की पेशी और ऐसी तैसी होना तय है ।
आज कि शिक्षा व्यवस्था इन पाबंदियों के साथ यह अपेक्षा भी रखती है कि गुरुजी कक्षा में अनुशासन, परिणाम और गुणवत्ता तीनों की गारंटी दें मतलब यही हुआ कि गुरुजी गाड़ी भी चलाये , लेकिन स्टीयरिंग को हाथ लगाने की अनुमति नही है वाह रे हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था और इसके नीति निर्धारण कर्ता । हमारी शिक्षा व्यवस्था का कमाल देखिए , शिक्षक को राष्ट्र निर्माता कहा जाता है, लेकिन राष्ट्र निर्माण के लिए आवश्यक समय उसे कागजी आंकड़े के खेल में खपा दिया जाता है। पढ़ाई छोड़ कभी सर्वे, कभी प्रशिक्षण, कभी बैठक, कभी रिपोर्ट, कभी ऑनलाइन पोर्टल या एप। शिक्षक स्कूल जाते तो हैं बच्चों को पढ़ाने और लौटते समय यह सोचते होंगे कि आज उन्होंने कितने पोर्टल व एप पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई कौन सा छूट गया , एप और पोर्टल से आजादी मिले तो बच्चो को पढ़ने पढ़ाने पर भी ध्यान दे। नियम कानूनों का ऐसा फंदा शिक्षक के गले में पड़ा है कि बच्चों को बेचारा पढ़ाने से पहले यह सोचता होगा आज कौन-सा वाक्य बोलना सुरक्षित रहेगा कि बच्चे शिकायत ना करे और मेरी नौकरी सुरक्षित रहे ।
हमारे देश की सबसे बड़ी विडंबना देखिए जिस बच्चे को उसके माता-पिता घर में नहीं संभाल पा रहे, उसे शिक्षक चालीस-पचास बच्चों की कक्षा में बिना डराए धमकाए , डांटे फटकारे , मारे पीटे , बिना आवाज ऊँची किए, बिना नाराज हुए और बिना किसी को बुरा महसूस कराए लोकतांत्रिक तरीके से संभाले।
कक्षा में शिक्षक के पास पढ़ाने का दायित्व तो है , मगर अनुशासन बनाए रखने का कोई प्रभावी साधन नही है , तो फिर शिक्षा नहीं, केवल हाजरी लगाने और नौकरी बचाने का ही खेल होगा ।
अंत में सवाल शिक्षक के हाथ में डंडा देने का नहीं, उसे सम्मान, स्पष्ट अधिकार और जिम्मेदारी देने का है। क्योंकि जिस व्यवस्था में शिक्षक हर क्षण भयभीत रहे, वहाँ विद्यार्थी निर्भीक और निडर तो हो सकता है पर शिक्षा कितनी निर्भीक होगी, यह सवाल पूछना भी जरूरी है।
कहीं ऐसा न हो कि कल की पाठ्यपुस्तक में लिखा मिले “ एक समय शिक्षक का मुख्य कार्य शिक्षा देना था।”और कभी बच्चे पूछें“सर, था का मतलब क्या समझ नहीं आया ?”
और अंत में :-
ऐसे माहौल में दुआ क्या है, दवा क्या है,
जहां क़ातिल ही ख़ुद पूछे कि हुआ क्या है।
#जय_हो 30 सितंबर 2026 कवर्धा (छत्तीसगढ़ )
चंद्र शेखर शर्मा (पत्रकार ) 9425522015









