
राजनांदगांव 27 सितम्बर 2026। जिले में विगत दो दिनों से लगातार वर्षा एवं वातावरण में अधिक नमी को देखते हुए कृषि विभाग द्वारा किसानों को धान, सोयाबीन, अरहर, उड़द, मूंग एवं कपास की फसलों में कीट एवं रोगों की नियमित निगरानी तथा आवश्यकता के अनुसार अनुशंसित दवाओं के उपयोग की सलाह दी गई है। लगातार वर्षा के कारण खेतों में नमी एवं आद्र्रता बढऩे से फफूंदजनित रोगों के साथ-साथ कुछ कीटों का प्रकोप बढऩे की संभावना रहती है। किसान को फसल की वर्तमान अवस्था के अनुसार आवश्यक उपाय अपनाने का सुझाव दिया गया है।
वर्तमान में धान की फसल लगभग 70 से 80 दिन की होकर दाना भरने की प्रारंभिक अवस्था में है। इस अवस्था में भूरा माहू, पैनिकल माइट, गंधी बग, तना छेदक एवं पत्ती लपेटक तथा ब्लास्ट, भूरा धब्बा एवं शीथ ब्लाइट की विशेष निगरानी करें। पौधे के निचले हिस्से में छोटे भूरे कीटों (भूरा माहू) का समूह दिखाई देना तथा अधिक प्रकोप में पौधों का पीला होकर सूखना इसके प्रमुख लक्षण हैं। इसके नियंत्रण के लिए इमिडाक्लोप्रिड 17.8 प्रतिशत एसएल 100 मिली प्रति एकड़ या डाइनोटेफ्यूरान 10 प्रतिशत + पाइमेट्रोजीन 40 प्रतिशत डब्ल्यूजी 100 ग्राम प्रति एकड़ दवा का उपयोग कर सकते है। भूरा माहू वाले खेत में अनावश्यक रूप से बार-बार कीटनाशी का प्रयोग न करें तथा अधिक मात्रा में यूरिया का उपयोग न करें।
बालियों एवं दानों के विकास की अवस्था में पैनिकल माइट के कारण दाने ठीक से विकसित नहीं हो पाते। लक्षण दिखाई देने पर कृषि विशेषज्ञ से पुष्टि कर नियंत्रण करें। इसके नियंत्रण हेतु डायफेन्थियूरॉन 50 प्रतिशत डब्ल्यूपी 1 से 2 ग्राम प्रति लीटर पानी या प्रोपिकोनाजोल 1 मिली प्रति लीटर पानी का उपयोग संबंधित उत्पाद के लेबल एवं अनुशंसा के अनुसार किया जा सकता है।
गंधी बग के कारण दूधिया दानों से रस चूसने के कारण दाने अधभरे एवं खराब हो सकते हैं। इसके नियंत्रण के लिए लैम्ब्डा-साइहेलोथ्रिन 5 प्रतिशत ईसी 100 मिली प्रति एकड़ का प्रयोग प्रकोप की स्थिति में किया जा सकता है। तना छेदक में बीच की पत्ती सूखना तथा अधिक प्रकोप में सफेद बालियां दिखाई देना प्रमुख लक्षण है। पत्ती लपेटक में पत्तियां मुड़कर नली जैसी हो जाती हैं। इसके नियंत्रण के लिए प्रोफेनोफॉस 40 प्रतिशत + साइपरमेथ्रिन 4 प्रतिशत ईसी 400 मिली प्रति एकड़ अथवा क्लोरेंट्रानिलिप्रोल 9.3 प्रतिशत + लैम्ब्डा-साइहेलोथ्रिन 4.6 प्रतिशत जेडसी 100 मिली प्रति एकड़ प्रकोप की स्थिति में अनुशंसित दवा का प्रयोग करें।
ब्लास्ट रोग होने पर पत्तियों पर नाव के आकार के भूरे धब्बे तथा बाली की गर्दन पर काले-भूरे घाव इसके प्रमुख लक्षण हैं। इसके नियंत्रण के लिए ट्राइसाइक्लाजोल 75 प्रतिशत डब्ल्यूपी 120 ग्राम प्रति एकड़ का प्रयोग किया जा सकता है। भूरा धब्बा रोग होने पर पत्तियों पर गोल या अंडाकार भूरे धब्बे दिखाई देने पर भूरा धब्बा रोग की संभावना रहती है। इसके नियंत्रण के लिए मैनकोजेब 75 प्रतिशत डब्ल्यूपी 1.5 से 2 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर का प्रयोग अनुशंसित मात्रा में करें। शीथ ब्लाइट होने पर पत्ती की खोल पर हरे-धूसर अथवा भूरे रंग के अंडाकार धब्बे दिखाई देना इसका प्रमुख लक्षण है। हेक्साकोनाजोल 5 प्रतिशत एससी + 350 मिली प्रति एकड़ का प्रयोग रोग की स्थिति में किया जा सकता है।
सोयाबीन की फसल फली बनने एवं दाना विकसित होने की अवस्था में है। लगातार नमी के कारण तना मक्खी, गर्डल बीटल, पत्ती खाने वाली इल्लियों, तंबाकू की इल्ली एवं सफेद मक्खी की निगरानी करें। रोगों में रस्ट, पत्ती धब्बा एवं एन्थ्रेक्नोज के लक्षणों पर विशेष ध्यान दें। पत्तियों पर पीले-भूरे धब्बे, पत्तियों का झडऩा अथवा अन्य असामान्य लक्षण दिखाई देने पर रोग की पहचान कर अनुशंसित फफूंदनाशी का प्रयोग करें। मैनकोजेब 75 प्रतिशत डब्ल्यूपी + 1.5 से 2 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर का उपयोग संबंधित रोग की स्थिति में किया जा सकता है। पीला मोजेक दिखाई देने पर रोगग्रस्त पौधों को उखाड़कर नष्ट करें तथा सफेद मक्खी का नियंत्रण करें।
अरहर की फसल शाखा विकास एवं फूल आने की प्रारंभिक अवस्था में है। इस समय फली छेदक, पत्ती खाने वाली इल्लियों एवं रस चूसक कीटों की निगरानी करें। खेत में पक्षियों के बैठने के लिए पक्षी बैठका लगाएं तथा फेरोमोन ट्रैप का उपयोग करें। कीटों का प्रकोप बढऩे पर फसल पर पंजीकृत एवं अनुशंसित कीटनाशी का उपयोग निर्धारित मात्रा में करें।
उड़द एवं मूंग की फसल फूल एवं फली बनने की अवस्था में है। इस समय फली छेदक, तंबाकू की इल्ली, सफेद मक्खी, माहू एवं थ्रिप्स की निगरानी करें। साथ ही पीला मोजेक एवं पत्ती धब्बा रोग के लक्षणों पर विशेष ध्यान दें। पीला मोजेक से प्रभावित पौधों को खेत से निकालकर नष्ट करें तथा सफेद मक्खी के नियंत्रण पर विशेष ध्यान दें।
कपास की फसल फूल एवं टिंडे बनने की अवस्था में है। इस अवस्था में माहू, जेसिड, सफेद मक्खी, थ्रिप्स एवं गुलाबी सुंडी की नियमित निगरानी करें। विशेष रूप से गुलाबी सुंडी के लिए फेरोमोन ट्रैप लगाकर निगरानी करें तथा फूल एवं टिंडे को खोलकर अंदर की सुंडी की स्थिति देखें। प्रकोप की पुष्टि होने पर ही अनुशंसित कीटनाशी का प्रयोग करें।
किसान प्रारंभिक प्रकोप की स्थिति में जैविक उपायों को भी अपना सकते है। इसके लिए ट्राइकोडर्मा विरिडी, स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस, ब्यूवेरिया बेसियाना, मेटाराइजियम एनीसोप्ली, बैसिलस थुरिन्जिएन्सिस (बीटी) तथा नीम आधारित उत्पाद व अजाडिरैक्टिन का उपयोग संबंधित उत्पाद के लेबल पर दी गई मात्रा एवं विधि के अनुसार किया जा सकता है।
किसान बारिश के दौरान दवा का छिड़काव न करें, बारिश रूकने एवं पत्तियां सूखने के बाद ही छिड़काव करें, बिना कीट अथवा रोग की पहचान के अनावश्यक दवा का प्रयोग न करें, अलग-अलग कीटनाशी एवं फफूंदनाशी को बिना अनुशंसा के मिलाकर छिड़काव न करें, धान की वर्तमान दाना भरने की अवस्था में दवा के प्रयोग से पहले कटाई से पूर्व प्रतीक्षा अवधि का ध्यान रखें, खेत में जलभराव न होने दें तथा आवश्यकतानुसार जल निकासी की व्यवस्था करें, यूरिया एवं अन्य नत्रजनयुक्त उर्वरकों का अनावश्यक अधिक प्रयोग न करें, दवा का प्रयोग हमेशा उसके सक्रिय तत्व, सांद्रता और फसल पर पंजीकृत उपयोग के अनुसार करें, दवा का छिड़काव करते समय मास्क, दस्ताने एवं सुरक्षात्मक कपड़ों का उपयोग करें।
कृषि विभाग द्वारा किसानों को आवश्यक सलाह देते हुए कहा गया है कि लगातार वर्षा के बाद अपनी फसलों का नियमित निरीक्षण करें। कीट या रोग के लक्षण दिखाई देने पर संबंधित ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी, कृषि अधिकारी अथवा कृषि विज्ञान केन्द्र से संपर्क कर सही पहचान एवं अनुशंसा प्राप्त करने के बाद ही दवा का उपयोग करें। किसान वर्तमान मौसम में धान में भूरा माहू, पैनिकल माइट, ब्लास्ट एवं भूरा धब्बा तथा अन्य फसलों में कीट एवं रोग के प्रारंभिक लक्षणों की पहचान कर समय पर नियंत्रण उपाय अपनाएं।









