
Zoya Akhtar Birthday: बड़े-बड़े घर, महंगी गाड़ियां, विदेशों में छुट्टियां और चमकती जिंदगी. पहली नजर में जोया अख्तर की फिल्में किसी सपने जैसी लगती हैं. लेकिन इस चमक के पीछे ऐसे रिश्ते हैं, जिनमें प्यार से ज्यादा उलझन है, ऐसे परिवार हैं जहां पैसा तो है, पर सुकून नहीं और ऐसे किरदार हैं जो सब कुछ हासिल करने के बाद भी खुद से जूझ रहे हैं.
जोया की फिल्मों में हीरो हर लड़ाई जीतकर लड़की को नहीं पा लेता. कई बार वह खुद को ही समझ नहीं पाता. आखिर क्या है उनके सिनेमा की वह खासियत, जो उसे बॉलीवुड की आम कहानियों से अलग बनाती है?
लक बाय चांस: पहली फिल्म में ही खोल दी बॉलीवुड की पोल
साल 2009 में आई ‘लक बाय चांस’ को सिर्फ एक स्ट्रगलिंग एक्टर की कहानी समझना भूल होगी. यह उस फिल्म इंडस्ट्री की कहानी भी है, जहां टैलेंट के साथ किस्मत, पहचान और सही लोगों तक पहुंच होना भी मायने रखता है.
फरहान अख्तर के विक्रम जय सिंह को हीरो बनना है. कोंकणा सेन शर्मा की सोना मिश्रा भी अभिनेत्री बनने का सपना देखती है. दोनों संघर्ष करते हैं, लेकिन दोनों की राह एक जैसी नहीं रहती. विक्रम को मौका मिलता है, उसका करियर आगे बढ़ता है और सफलता के साथ रिश्ते की जमीन भी बदलने लगती है.
यहां जोया एक आसान रास्ता चुन सकती थीं. संघर्ष के बाद हीरो सफल होता, प्रेमिका के साथ उसका मिलन होता और कहानी खत्म. लेकिन फिल्म यह सवाल छोड़ती है कि कामयाबी मिलने के बाद इंसान कितना बदलता है और सपने पूरे करने की कीमत कौन चुकाता है.
जिंदगी ना मिलेगी दोबारा: दोस्ती के बहाने अपने डर से सामना
तीन दोस्त, स्पेन की रोड ट्रिप, शानदार लोकेशन और मस्ती. ‘जिंदगी ना मिलेगी दोबारा’ को सिर्फ इन चीजों के लिए याद करना फिल्म के असली मतलब को छोटा कर देना होगा.
ऋतिक रोशन का अर्जुन जिंदगी को पैसे और कामयाबी के तराजू पर तौलता है. फरहान अख्तर का इमरान मजाक के पीछे अपनी भावनाएं छिपाता है. अभय देओल का कबीर शादी और अपने भविष्य को लेकर उलझा हुआ है.
तीनों के पास जिंदगी जीने के साधन हैं, लेकिन अपनी जिंदगी को समझने का सुकून नहीं. स्काईडाइविंग हो या पानी के भीतर गोता लगाना, फिल्म के एडवेंचर असल में किरदारों के भीतर चल रही लड़ाई का हिस्सा बन जाते हैं.
जोया यहां दोस्ती को सिर्फ शराब, मजाक और गानों तक सीमित नहीं रखतीं. वह दिखाती हैं कि कई बार इंसान को अपनी सबसे बड़ी कमजोरी समझने के लिए किसी दोस्त की जरूरत होती है.
और यही इस फिल्म की खूबी है. छुट्टियां खत्म हो जाती हैं, लेकिन सवाल रह जाता है- क्या हम अपनी जिंदगी जी रहे हैं या सिर्फ उसे सफल दिखाने में लगे हैं?
दिल धड़कने दो: पैसे से खरीदी जा सकती है हर खुशी?
जोया की फिल्मों में आलीशान घर और अमीर परिवार बार-बार आते हैं. यही उनके सिनेमा की एक खासियत भी है और उसकी सीमा पर सवाल उठाने की वजह भी. उनकी कहानियों में अक्सर ऐसे लोगों की परेशानियां केंद्र में रहती हैं, जिनके पास आर्थिक सुविधाओं की कमी नहीं है.
‘दिल धड़कने दो’ में मेहरा परिवार बाहर से किसी परफेक्ट परिवार जैसा दिखता है. महंगी छुट्टियां, सामाजिक प्रतिष्ठा और दुनिया को दिखाने के लिए एक खूबसूरत तस्वीर. लेकिन इस तस्वीर के पीछे रिश्तों की दरारें हैं.
अनिल कपूर के कमल मेहरा और शेफाली शाह की नीलम अपने बच्चों के भविष्य को लेकर चिंतित हैं, मगर उनकी उम्मीदें बच्चों की अपनी इच्छाओं से टकराती हैं. प्रियंका चोपड़ा की आयशा के पास कामयाबी है, फिर भी उसे अपनी जिंदगी के फैसले लेने की पूरी आजादी नहीं मिलती.
फिल्म का सवाल सिर्फ इतना नहीं कि अमीर लोग भी दुखी होते हैं. सवाल यह है कि परिवार की इज्जत और समाज की नजरों के नाम पर किसी की जिंदगी के फैसले आखिर कौन करे?
जोया इस टकराव को किसी भाषण में नहीं बदलतीं. वह इसे घर के भीतर होने वाली बातचीत, खामोशी और रिश्तों के बदलते समीकरणों से सामने लाती हैं.
‘गली बॉय’ में हीरो ने मुक्कों से नहीं, अपनी आवाज से बनाई पहचान
जोया अख्तर की फिल्म ‘गली बॉय’ उनकी बाकी फिल्मों से थोड़ी अलग नजर आती है. साल 2019 में रिलीज हुई इस फिल्म में रणवीर सिंह ने मुराद का किरदार निभाया था.
मुराद मुंबई की एक साधारण बस्ती में रहता है. उसके परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है. घर में परेशानियां हैं और जिंदगी में आगे बढ़ने के रास्ते भी आसान नहीं हैं. लेकिन मुराद का एक सपना है. वह रैपर बनना चाहता है और अपने गानों के जरिए लोगों तक अपनी बात पहुंचाना चाहता है. बॉलीवुड की कई फिल्मों में हीरो अपनी ताकत दिखाकर मुश्किलों से लड़ता है. लेकिन ‘गली बॉय’ में मुराद अपनी आवाज को ही अपनी ताकत बनाता है.
वह अपनी जिंदगी में जो कुछ देखता है, जो महसूस करता है और जिन परेशानियों से गुजरता है, उन्हें अपने गानों में उतारता है. इस फिल्म की खास बात यह है कि यहां हीरो का सपना सिर्फ बड़ा स्टार बनना नहीं है. वह अपनी पहचान बनाना चाहता है और दुनिया को बताना चाहता है कि उसके पास भी कहने के लिए बहुत कुछ है. जोया अख्तर ने इस कहानी के जरिए दिखाया कि इंसान की परिस्थितियां चाहे जैसी हों, उसके सपने और अपनी बात कहने की चाह उसे आगे बढ़ने की हिम्मत दे सकती है.
उनकी फिल्मों में रिश्ते हमेशा परफेक्ट क्यों नहीं होते?
जोया अख्तर की फिल्मों में रिश्ते बहुत अहम होते हैं. लेकिन वह रिश्तों को हमेशा खूबसूरत और आसान बनाकर नहीं दिखातीं.
उनकी फिल्मों में माता-पिता अपने बच्चों से प्यार तो करते हैं, लेकिन कई बार उन पर अपनी पसंद थोपते भी हैं. दोस्त एक-दूसरे के करीब होते हैं, लेकिन अपनी परेशानियां छिपाते हैं. पति-पत्नी साथ रहते हैं, लेकिन जरूरी नहीं कि दोनों एक-दूसरे की भावनाओं को समझते हों. फिल्म ‘दिल धड़कने दो’ हो या सीरीज ‘मेड इन हेवन’, जोया अख्तर ने कई बार ऐसे रिश्तों को दिखाया है, जिनमें बाहर से सब कुछ अच्छा नजर आता है, लेकिन अंदर कई परेशानियां होती हैं.
‘मेड इन हेवन’ में शानदार शादियों के पीछे छिपे सामाजिक दबाव, महिलाओं से जुड़ी असमानताएं और रिश्तों की उलझनें सामने आती हैं. इन कहानियों को देखकर समझ आता है कि किसी रिश्ते को अच्छा दिखाना और उसे सच में अच्छा बनाना दो अलग-अलग बातें हैं. जोया की कहानियों में किरदार हमेशा सही फैसले नहीं लेते. उनसे गलतियां भी होती हैं. लेकिन यही बातें उन्हें असली जिंदगी के लोगों के करीब लाती हैं.
जोया की फिल्मों में औरत सिर्फ हीरो की प्रेमिका नहीं
जोया अख्तर की कहानियों में महिला किरदारों की अपनी इच्छाएं और महत्वाकांक्षाएं होती हैं. वे सिर्फ किसी पुरुष की जिंदगी में बदलाव लाने के लिए नहीं आतीं.
‘दिल धड़कने दो’ की आयशा अपने परिवार की उम्मीदों और अपनी पसंद के बीच फंसी है. ‘मेड इन हेवन’ में शानदार शादियों के पीछे छिपे सामाजिक दबाव, महिलाओं के साथ असमानता और रिश्तों की जटिलताएं सामने आती हैं.
यहां शादी हर कहानी का अंतिम सुखद पड़ाव नहीं है. कई बार वह एक ऐसी व्यवस्था बनकर सामने आती है, जिसमें समाज की अपेक्षाएं व्यक्ति की इच्छा से बड़ी हो जाती हैं.
जोया के सिनेमा की अहमियत इस बात में है कि वह इन किरदारों को सिर्फ सही या गलत के खांचे में नहीं रखतीं. उनके फैसलों, कमजोरियों और विरोधाभासों को भी जगह देती हैं.
फिर क्या जोया अख्तर का सिनेमा परफेक्ट है?
नहीं. उनकी फिल्मों पर यह सवाल उठाया जा सकता है कि उनकी दुनिया अक्सर आर्थिक रूप से संपन्न लोगों के इर्द-गिर्द घूमती है. खूबसूरत लोकेशन, महंगी जीवनशैली और विशेषाधिकार प्राप्त किरदार उनकी कहानियों का बड़ा हिस्सा हैं. इसलिए उनकी फिल्मों में दिखने वाली समस्याएं हर वर्ग के अनुभवों का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं.
लेकिन उनके सिनेमा को सिर्फ अमीरों की परेशानियों की कहानी कहकर खारिज करना भी ठीक नहीं होगा. ‘गली बॉय’ जैसी फिल्म दिखाती है कि उनका नजरिया एक ही सामाजिक दायरे तक सीमित नहीं है.
उनकी फिल्मों का मजबूत पक्ष यह है कि वे किरदारों को हमेशा आदर्श नहीं बनातीं. उनके पास पैसा हो सकता है, लेकिन वे गलत फैसले लेते हैं. वे प्यार कर सकते हैं, लेकिन रिश्ते निभाने में नाकाम हो सकते हैं. वे सफल हो सकते हैं, लेकिन अपने भीतर की उलझनों से मुक्त नहीं होते.
हीरो की जीत से आगे की कहानी हैं जोया की फिल्में
जोया अख्तर की फिल्मों को याद करने के लिए सिर्फ उनके गाने, कलाकार या खूबसूरत लोकेशन याद रखना काफी नहीं है. उनकी कहानियों में असली दिलचस्पी उन विरोधाभासों में है, जहां बाहर की सफलता और भीतर की बेचैनी एक साथ मौजूद रहती हैं.
उनकी फिल्मों में हर समस्या का आसान हल नहीं मिलता. हर रिश्ता अपनी मंजिल तक नहीं पहुंचता और हर सपना पूरा होने के बाद जिंदगी खूबसूरत नहीं हो जाती.
शायद यही वजह है कि उनका सिनेमा पारंपरिक बॉलीवुड फॉर्मूले से अलग महसूस होता है. यहां हीरो का मतलब हमेशा जीतने वाला इंसान नहीं, बल्कि अपनी कमजोरियों से जूझता हुआ व्यक्ति भी है. और कहानी का मतलब सिर्फ अंत तक पहुंचना नहीं, बल्कि उस सफर में उठने वाले सवाल भी हैं.









