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75 साल की तपस्या : श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सपनों से शुभेंदु अधिकारी के राजतिलक तक, जानें कैसे संघ ने खामोशी से बदल दी बंगाल की सत्ता

RSS impact on West Bengal Election 2026: रवींद्रनाथ टैगोर की जयंती पर जब शुभेंदु अधिकारी ने पश्चिम बंगाल के पहले भाजपा मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली, तो यह केवल एक चुनावी जीत नहीं थी. यह उस लंबी यात्रा का शिखर था, जिसकी नींव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने दशकों पहले बंगाल की मिट्टी में रखी थी.

4 फीसदी से 45.8 फीसदी वोट शेयर और सत्ता का शिखर

वर्ष 2026 के विधानसभा चुनाव के नतीजे बंगाल की राजनीति में एक बड़ा मोड़ हैं. एक समय भाजपा महज 4 फीसदी वोटों पर सिमटी थी. उसी भाजपा ने 45.8 प्रतिशत वोट शेयर के साथ सत्ता के शिखर को छुआ है. यह बदलाव रातोंरात नहीं आया. इसके पीछे संघ के जमीनी नेटवर्क और ‘साइलेंट’ काम करने की एक लंबी दास्तान है.

विभाजन के जख्मों से शुरू हुआ सफर

बंगाल में संघ की मौजूदगी चुनावी राजनीति से बहुत पुरानी है. भारत विभाजन के बाद जब पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से हिंदू शरणार्थी सीमावर्ती जिलों में आये, तब संघ ने राहत कार्यों के जरिये उनके बीच पैठ बनायी. पहचान, विस्थापन और सामुदायिक जुड़ाव के उन्हीं पुराने संपर्कों ने बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में भाजपा के लिए मजबूत वोट बैंक का काम किया.

श्यामा प्रसाद मुखर्जी की विरासत

1951 में भारतीय जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी को संघ ने एक बंगाली और राष्ट्रीय नायक दोनों के रूप में पेश किया. इससे भाजपा को ‘बाहरी पार्टी’ के ठप्पे से मुक्ति मिली और उसे स्थानीय स्वीकार्यता हासिल हुई.

वामपंथी दुर्ग में ऐसे बनायी जगह

1977 से 2011 तक बंगाल की राजनीति वर्ग-संघर्ष (Class Struggle) के इर्द-गिर्द घूमती थी, जहां पहचान की राजनीति के लिए जगह कम थी. वर्ष 2011 में भाजपा का वोट शेयर मात्र 4.06 प्रतिशत और 2016 में 10.16 प्रतिशत था. लेकिन वामपंथ के पतन के बाद जो खाली जगह बनी, उसे संघ ने खामोशी से भरना शुरू किया.

गांव-गांव में बूथ स्तर पर शुरू किया काम

उत्तर बंगाल से लेकर पश्चिमी औद्योगिक बेल्ट तक, के प्रचारकों ने बूथ स्तर पर काम किया. असंतुष्ट कार्यकर्ताओं को साथ जोड़ा और स्थानीय प्रभावशाली लोगों के जरिये अपनी विचारधारा को घर-घर पहुंचाया. संघ ने अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए बंगाली भाषा, सांस्कृतिक प्रतीकों और क्षेत्रीय संदर्भों का सहारा लिया, जिससे भाजपा को लेकर आम बंगाली की धारणा बदली.

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