Friday, April 19

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सीएए : एक क़ानून धर्मनिरपेक्षता और लोकतांत्रिक संविधान के ख़िलाफ़ (आलेख : शमसुल इस्लाम)
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सीएए : एक क़ानून धर्मनिरपेक्षता और लोकतांत्रिक संविधान के ख़िलाफ़ (आलेख : शमसुल इस्लाम)

भारत में राष्ट्रविरोधी, अमानवीय एवं धार्मिक रूप से कट्टर नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 लागू हो गया है। नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 (सीएए), जो अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से (31 दिसंबर, 2014 को या उससे पहले) धार्मिक उत्पीड़न का सामना करते हुए भारत में आने वाले हिंदुओं, सिखों, बौद्धों, इसाईयों और पारसियों के लिए भारतीय राष्ट्रीयता के द्वार खोलने का वादा करता है, 9 दिसंबर, 2019 को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह द्वारा लोकसभा में पेश किया गया था। देश की लोकतांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष राजनीति की मूल आत्मा का उल्लंघन करने वाला यह विधेयक संघ-भाजपा के कारण 8 घंटे से भी कम समय में पारित हो गया। शासकों को लोकसभा में प्रचंड बहुमत प्राप्त है। दुख की बात है कि यह अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस, 10 दिसंबर की पूर्व संध्या पर हुआ। इसने नागरिकता अधिनियम, 1955 का स्थान ले लिया, जिसमें ऐसा कोई भेदभाव नह...
वरिष्ठ पत्रकार चंद्रशेखर शर्मा की बात बेबाक
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वरिष्ठ पत्रकार चंद्रशेखर शर्मा की बात बेबाक

" लाउडस्पीकर की आवाज सुनकर कभी अमीरों ने जमघट नही लगाया , गरीब ही हमेशा खींचे चले आते है । ये सोच के कि आज उनके मतलब की बात होगी , लेकिन वो बोल कर चुप हो गए और हम चिल्लाकर रह गए ।" वन्स अपॉन अ टाइम मुंबई - फिल्म का यह डायलाग पार्टियों और नेताओं की सत्ता की प्यास जनता को मुफ्तखोर बनाने वाले वादो और गारंटी की घोषणा को लेकर याद आ गया । आज कल पार्टियां अपने काम व विकास को भूल नगद बांटने की योजना के दावे वादे कर रहे । भाजपा महतारी वंदन की 1000 की गारंटी से सत्ता में पहुंच गई किन्तु लोकसभा चुनाव में कांग्रेस महालक्ष्मी न्याय योजना के बहाने 8333 रुपये महिलाओं को देने के दावे वादे कर रही । आज राजनीति मुफ्त में बांटने वाली योजनाओं के भरोसे रह गई है नेताओ की छवि की चर्चा तक नही होती घपले घोटालों को छोड़ कर । अपने नेता की छवि पर वोट मांगने की जगह फोकट में बांटने वाली व कर्जमाफी के वादे पर मांगने लगे ह...
चुनावी हल चल ,कल रूख पता चल जाएगा, छत्तीसगढ़ किसको जिताएगा, क्या कवासी का कभी न हारने का रिकाॅर्ड टूटेगा इस बार, कवासी के विरूद्ध और कवासी की तरफ से शिकायतें 0 जवाहर नागदेव
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चुनावी हल चल ,कल रूख पता चल जाएगा, छत्तीसगढ़ किसको जिताएगा, क्या कवासी का कभी न हारने का रिकाॅर्ड टूटेगा इस बार, कवासी के विरूद्ध और कवासी की तरफ से शिकायतें 0 जवाहर नागदेव

  बस आज की रात है ज़िंदगी, कल हम कहां, तुम कहां.... इस बेहद प्रसिद्ध और मजेदार गाने की ये शुरूआती पंक्तियां यहां लागू होती हंै। कल चुनाव का प्रथम चरण संपूर्ण होते तक राजनैतिक पण्डितों को अहसास हो जाएगा कि राजनैतिक हवा किस तरफ का रूख करेगी। बस्तर छह जिलों तक फैला हुआ है। जहां 8 विधानसभा की सीटें हैं अदिवासी के लिये आरक्षित लगभग 14 लाख वोटों वाली इस सीट पर अब तक 17 आम चुनाव हुए हैं एक बार उपचुनाव यानि कुल 18 चुनाव। भाजपा ने छह बार, कांग्रेस ने छह बार, एक बार जनता पार्टी ने यहां से जीत दर्ज की है। सबसे दिलचस्प है यहां से 5 बार निर्दलीय प्रत्याशी का जीतना। दिलचस्प इतिहास 1952 से चुनाव हो रहे हैं। राजा प्रवीरचंद भंजदेव ने जिसको चाहा उसको जिताया। पहली बार निर्दलीय मुचाकी कोसा रिकाॅर्ड मतों से जीते। फिर कांग्रेस प्रत्याशी जीता। उसके बाद फिर निर्दलीय लखमू राजा साहब के कहने पर लड़े औ...
खरी खरी ,बाबा रामदेव हिंदुवादी, राष्ट्रभक्त होने से परेशान, तब गोविंदा ने “किया होता” तो आज जीत होती 0 जवाहर नागदेव वरिष्ठ पत्रकार
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खरी खरी ,बाबा रामदेव हिंदुवादी, राष्ट्रभक्त होने से परेशान, तब गोविंदा ने “किया होता” तो आज जीत होती 0 जवाहर नागदेव वरिष्ठ पत्रकार

चुनावों का चक्कर बड़ा बुरा होता है। मोटी चमड़ी वाले तो आराम से हार स्वीकार कर लेते हैं। दूसरे आराम से वे नेता सह लेते हैं जिन्होनंे चुनावी चन्दे के रूप् में अच्छी-खासी कमाई कर ली होती है। लेकिन भावुक लोग हार आसानी से पचा नहीं पाते। जीत की उम्मीद में चुनाव लड़ने वालों को हार बहुत खलती है। इस नये दौर में काम करना बहुत जरूरी हो गया है। काम न करने वालों को जनता चुनाव में बिना किसी रहम के निपटा देती है। कोई एक बार किसी लहर में जीत भी जाए तो दोबारा उसे मौका नहीं देती है। एक बार कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीत चुके गोविंदा दोबारा शिवसेना के बैनर पर मैदान में हैं। इस बात का दावा करना कठिन है कि वे जीत ही जाएंगे। देश का बेहतरीन महानगर महाराष्ट्र का मुम्बई, जो अपनी दादागिरी, अपनी पुलिस अपने ग्लैमर और अपने व्यापार के लिये जाना जाता है। इस नगर के सफलतम् ग्लैमरस हीरो गोविन्दा को किसी नाम की जरूरत है।...
मतदान का एक आधार प्रेस की आजादी भी होना चाहिए (आलेख : बादल सरोज)
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मतदान का एक आधार प्रेस की आजादी भी होना चाहिए (आलेख : बादल सरोज)

18वीं लोकसभा के निर्वाचन के लिए मतदान शुरू होने वाला है। सभी – यहाँ तक कि जो खुद को सबसे सुरक्षित और पुरयकीन दिखा रहे हैं, वे सत्तासीन भी – मानते हैं कि ये चुनाव आसान नहीं हैं, देश के भविष्य के लिए तो बिलकुल भी आसान नहीं हैं। लोकतंत्र में चुनावों के दौरान जो होता है वह हो रहा है। विपक्ष जनता के जीवन से जुड़े मुद्दों को अपनी पूरी शक्ति के साथ मतदाताओं के बीच ले जाने में जुटा है, वहीँ सता पक्ष इनको छुपाने के लिए तरह-तरह के ध्यान भटकाऊ, आग लगाऊ, भावनात्मक शोशे उछालने में व्यस्त है। मगर इस बार के चुनाव सिर्फ देश की आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक दिशा ही तय नहीं करने जा रहे हैं ; उनके साथ भारत की प्रेस की स्वतंत्रता का सवाल भी तय होने जा रहा है। इसलिए प्रेस, मीडिया, अखबार और सूचना तथा सम्प्रेषण के इन माध्यमों के भविष्य के लिहाज से भी ये चुनाव महत्व हासिल कर लेते हैं। यूं तो नवउदारीकरण के हावी ह...
लोकतंत्र का गहराता संकट और संघ-भाजपा की ख़तरनाक पदचापें (आलेख : जवरीमल्ल पारख)
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लोकतंत्र का गहराता संकट और संघ-भाजपा की ख़तरनाक पदचापें (आलेख : जवरीमल्ल पारख)

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि यह दौर आज़ादी के बाद का सबसे संकटपूर्ण और चुनौती भरा दौर है। न केवल आर्थिक क्षेत्र गहरे संकट में हैं, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र भी गहरे संकट में हैं। धर्म के नाम पर जिस तरह एक पूरे वर्ग को देश के दुश्मन की तरह पेश किया जा रहा है और उन्हें संविधान में मिले नागरिक अधिकारों से वंचित कर दोयम दर्जे के नागरिक में तब्दील किया जा रहा है, वह इस राजसत्ता के फ़ासीवादी चरित्र का ही प्रमाण है। भारत का यह फ़ासीवाद अपने चरित्र में अतिदक्षिणपंथी भी है और ब्राह्मणवादी भी। मौजूदा राजसत्ता के चरित्र को समझने के लिए आरएसएस की विचारधारा को समझना ज़रूरी है। वे अपनी राजनीतिक विचारधारा को ‘हिंदुत्व’ नाम देते हैं। यह विचारधारा उन्होंने विनायक दामोदर सावरकर से ग्रहण की थी, जिन्होंने 1923 में हिंदुत्व नामक पुस्तक लिखी थी। आरएसएस ने अपने इन राजनीतिक उद्देश्यों को कभी छुपाया...
राजनीति में भी चमके मीडिया के सितारे: प्रो. संजय द्विवेदी
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राजनीति में भी चमके मीडिया के सितारे: प्रो. संजय द्विवेदी

  इन दिनों देश में लोकतंत्र का महापर्व चल रहा है। जाहिर है राजनीति का आकर्षण प्रबल है। सिने कलाकार, साहित्यकार, वकील, न्यायाधीश, खिलाड़ी, गायक, उद्योगपति सब क्षेत्रों के लोग राजनीति में हाथ आजमाना चाहते हैं। ऐसा ही हाल पत्रकारिता के सितारों का भी है। मीडिया और पत्रकारिता के अनेक चमकीले नाम राजनीति के मैदान में उतरे और सफल रहे।   आजादी के आंदोलन में तो मीडिया को एक तंत्र की तरह इस्तेमाल करने के लिए प्रायः सभी वरिष्ठ राजनेता पत्रकारिता से जुड़े और उजली परंपराएं खड़ी कीं। बालगंगाधर तिलक, महात्मा गांधी से लेकर सुभाष चन्द्र बोस, महामना मदनमोहन मालवीय, पंडित नेहरू सभी पत्रकार रहे। आजादी के बाद बदलते दौर में पत्रकारिता और राजनीति की राहें अलग-अलग हो गईं, लेकिन सत्ता का आकर्षण बढ़ गया। जनपक्ष, राष्ट्र सेवा की पत्रकारिता अब आजाद भारत में राष्ट्र निर्माण का भाव भरने में लगी थी। से...
अब एक देश, एक आहार! (व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा)
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अब एक देश, एक आहार! (व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा)

बेचारे मोदी जी ने बार-बार बताया है कि वह जो भी करते हैं, देश के लिए करते हैं। और देश में भी खासतौर पर उसकी एकता के लिए करते हैं। फिर भी विरोधी हैं कि विरोध करने से बाज नहीं आते हैं। ऊधमपुर में मोदी जी ने अपनी चुनाव सभा में क्या इतना ही नहीं कहा था कि सावन के मास में मांस खाना-पकाना बुरी बात है। नवरात्रि में मछली पकाना-खाना और भी खराब बात है, बल्कि पाप है। यह पाप छुपकर कोई करता है तो करे, पर मोदी जी के विरोधियों का वीडियो बनाकर सारी दुनिया को दिखा-दिखाकर, ऐसा पाप करना तो पाप का भी बाप यानी महापाप है। यह तो बाकी सभी पुण्यात्माओं को चिढ़ाना है, उनकी भावनाओं को ठेस पहुंचाना है। ये तो मुगलों वाले काम हैं। वे भी तो ऐसे ही पुण्यात्माओं को चिढ़ाने के लिए दिखा-दिखाकर मांस-मछली-अंडा खाया करते थे और राष्ट्रीय भावनाओं को आघात पहुंचाया करते थे। फिर भी मुगलों में चाहे हजार बुराइयां रही हों, पर एक काम उन...
चुनावी हल चल बस्तर में 19 को पता चलेगा, कौन बीस है कश्यप् और कवासी मे 0 वरिष्ठ  पत्रकार जवाहर नागदेव
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चुनावी हल चल बस्तर में 19 को पता चलेगा, कौन बीस है कश्यप् और कवासी मे 0 वरिष्ठ पत्रकार जवाहर नागदेव

  छत्तीसगढ़ का सबसे पहला चुनाव यहीं होगा। बस्तर मे 13 लाख मतदाता हंै। इस लोकसभा की पूरे हिंदुस्तान में चर्चा होती है। आदिवासी क्षेत्र है। किसी समय में इनकी मासूमियत और निष्कपटता की मिसाल दी जाती थी। पर अब यहां वातावरण में चतुराई और नक्सलवाद घुल गया है। हालांकि यहां के आदिवासी अब भी सोचते हैं कि इनकी संस्कृति कैसे सुरक्षित रहे। सावधानी बतौर ये लोग बाहरी लोगों को जल्दी स्वीकार नहीं करते। बस्तर लोकसभा से भाजपा ने महेश कश्यप को उतारा है तो कांग्रेस ने कवासी लखमा को, जो कोंटा विधानसभा सीट से वर्तमान में विधायक हैं। हम गंगाजल वाले नहीं देसी महुआ वाले हैं कभी स्कूल नहीं गये कवासी लखमा ने पिछले दिनों अपने प्रत्याशी बनाए जाने पर दिलचस्प टिप्पणी की कि मैं तो बेटे के लिये डौकी लेने गया था पार्टी ने मुझे ही डौकी दे दी। लखमा के कहने का तात्पर्य ये है कि वे अपने बेटे के लिये लोकसभा...
सामाजिक न्याय का अग्रदूत : डॉक्टर भीमराव अंबेडकर
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सामाजिक न्याय का अग्रदूत : डॉक्टर भीमराव अंबेडकर

लोकप्रिय भारतीय विधिवेक्ता, अर्थशास्त्री, इतिहासकार,  राजनीतिज्ञ और समाज सुधारक: सामाजिक न्याय का अग्रदूत बाबा साहेब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्यप्रदेश के इंदौर जिले के महू नामक गांव में हुआ था। ऐसा लगता है कि बाबा साहेब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर का सामाजिक न्याय के बारे में सोचने की प्रेरणा स्वयं उनके द्वारा सामाजिक अन्याय के प्रहार को भोगने से प्राप्त हुई, जिसका स्वयं उन्होंने डटकर सामना भी किया।  वे चिंतन करते हुए प्रश्न करते हैं कि विश्व के अनेक देशों में सामाजिक क्रांतियां हुई, परंतु भारत में सामाजिक क्रांति क्यों नहीं हुई यह प्रश्न लगातार उन्हें बेचौन करती थी। जब वे इस सवाल का जवाब ढूंढते तो उन्हें एक ही जवाब मिलता था, वह था अधम जातिप्रथा। डॉ अंबेडकर ने अनेक महान् विद्वानों के सामाजिक दर्शन, चिंतन का गहन अध्ययन किया। मनु की मनुस्मृति की वर्ग व्यवस्था,  प्लेटों ...