Tuesday, April 23

लेख-आलेख

व्हाट एन आइडिया सरजी! (व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा)
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व्हाट एन आइडिया सरजी! (व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा)

आजमगढ़ वालों ने भी क्या नसीब पाया है! निरहुआ जी जैसी प्रतिभा को एक बार चुन ही नहीं चुके हैं, मोदी जी से ऐसी प्रतिभा को दोबारा चुनने का मौका भी झटक लाए हैं। हमें यकीन है कि वे 2019 वाली गलती हर्गिज नहीं दोहराएंगे और उन्हें चुनने का मौका हाथ से हर्गिज नहीं जाने देंगे। वैसे तो सब यूपीवाले ही बहुत खुशनसीब हैं। मोदी, योगी, दोनों उनके नसीब में हैं। पर आजमगढ़ वालों की बात ही कुछ और है। दिनेशलाल यादव उर्फ निरहुआ जी जैसा जीनियस बाकी यूपी वालों को भी कहां नसीब है। पट्ठे ने न दिमाग पर जोर डालने की मुद्रा बनायी और न किसी तरह के आंकड़ों-वांकड़ों की जरूरत बतायी। नाचते-गाते ही चुटकियों में देश को बेरोजगारी की उस समस्या का परमानेंट समाधान बता दिया, जिसका समाधान राम जी झूठ न बुलाएं, महाराज मोदी जी भी नहीं खोज पाए थे। और समाधान भी एकदम सिंपल। मोदी जी, योगी जी का दिखाया रास्ता अपनाओ, राजा निरबंसिया बनकर दिखा...
बदलने भी दो यारो! (व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा)
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बदलने भी दो यारो! (व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा)

ये विरोधी, मोदी जी का विरोध करने के लिए और कितने नीचे जाएंगे। बताइए, अब इसका भी विरोध कर रहे हैं कि दूरदर्शन समाचार का लोगो क्यों बदल दिया? और लोगो की लिखत बदली तो बदली, लोगो का रंग क्यों बदल दिया? और रंग भी बदला तो बदला, रंग लाल से बदलकर भगवा क्यों कर दिया? बताइए, अजब हुज्जत है। दस साल में मोदी जी ने पूरा का पूरा चैनल बदल डाला। चैनल तो चैनल, समाचार ही बदल डाला। टीवी समाचार भी सिर्फ सरकारी दूरदर्शन का नहीं, अंबानी-अडानी-जैन-पुरी आदि निजधारी चैनलों का भी बदल डाला। मीडिया को सरदर्दी से गोदी सवार तक बना डाला। उस सब का कुछ नहीं और रंग बदलने पर हंगामा। और ये विरोध सिर्फ भगवाकरण का नहीं है। मोदी जी कांग्रेस के, मुस्लिम लीग के और बचे-खुचे मामले में कम्युनिस्टों के पीछे चलने पर यूं ही चिंता थोड़े ही जताते हैं। बताइए, भगवाकरण का विरोध करने के लिए क्या अब कांग्रेसी, दूरदर्शन के लाल रंग के लोगो की हि...
मोदी की गारंटी : भाजपा की जगह मोदी, लोकतंत्र की जगह तानाशाही (आलेख : बादल सरोज)
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मोदी की गारंटी : भाजपा की जगह मोदी, लोकतंत्र की जगह तानाशाही (आलेख : बादल सरोज)

मतदान की शुरुआत होने में जब महज पांच दिन बचे थे तब कहीं जाकर मौजूदा सत्ता पार्टी भाजपा ने अपना “चुनाव घोषणापत्र” जारी किया। उपभोक्ताओं को लुभाने वाली मार्केटिंग की शैली में लिखे चुस्त खोखले संवादों, अनुपलब्धियों और विफलताओं को शब्दजाल में गोल-गोल घुमाकर बनाई गयी भूलभुलैया में छुपाने की भरसक कोशिशों और जनता की मुश्किलों की पूरी तरह अनदेखी कर उन्हें थाली भर पानी में चाँद उतारने के भुलावे से बहलाने के आजमाए शिगूफों से भरा यह पुलिंदा बाकी जो है, सो तो है ही, सबसे मुखर रूप में खुद को ब्रह्माण्ड की सबसे बड़ी पार्टी बताने वाली इस पार्टी के अस्तित्वहीन और विलुप्त-सा हो जाने की दस्तावेजी और सार्वजनिक स्वीकारोक्ति है। एक तरह से कारपोरेट के बैक्टीरिया – जीवाणु -- के हिंदुत्व के साथ मिलकर वायरस – विषाणु -- में रूपांतरित होने का चक्र पूरा हो गया है और जनसंघ से भाजपा होते हुए खुद को एक राजनीतिक दल बता...
बस सच की पर्देदारी है (आलेख : राजेन्द्र शर्मा)
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बस सच की पर्देदारी है (आलेख : राजेन्द्र शर्मा)

अठारहवीं लोकसभा के करीब पौने दो महीने लंबे चुनाव के पहले चरण का ही चुनाव प्रचार अभी थमा है, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी द्वारा अपनी चुनाव सभाओं में धर्म की दुहाई का सहारा लिए जाने की शिकायतों के चुनाव आयोग में ढेर लग चुके हैं। संक्षेप में इन शिकायतों का सार यही है कि प्रधानमंत्री, विशेष रूप से राम मंदिर के निर्माण तथा प्राण प्रतिष्ठा समारोह से लेकर सनातन संबंधी बहस तक के बहाने से, खुद को तथा सत्ताधारी गठजोड़ को 'हिंदू-रक्षक' और अपने राजनीतिक विरोधियों, विशेष रूप से इंडिया गठबंधन को 'हिंदू-विरोधी' साबित करने और इसके जरिए, हिंदुओं को अपने विरोधियों के खिलाफ तथा अपने पक्ष में जुटाने की कोशिश कर रहे हैं। बेशक, यह दूसरी बात है कि मोदी राज में अर्जित अपने संक्षिप्त नाम, कें चु आ को सार्थक करते हुए, चुनाव आयोग ने इन शिकायतों का कोई संज्ञान लिया हो, इसका अब तक कोई संकेत नहीं है। सच तो यह है कि ये...
सीएए : एक क़ानून धर्मनिरपेक्षता और लोकतांत्रिक संविधान के ख़िलाफ़ (आलेख : शमसुल इस्लाम)
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सीएए : एक क़ानून धर्मनिरपेक्षता और लोकतांत्रिक संविधान के ख़िलाफ़ (आलेख : शमसुल इस्लाम)

भारत में राष्ट्रविरोधी, अमानवीय एवं धार्मिक रूप से कट्टर नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 लागू हो गया है। नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 (सीएए), जो अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से (31 दिसंबर, 2014 को या उससे पहले) धार्मिक उत्पीड़न का सामना करते हुए भारत में आने वाले हिंदुओं, सिखों, बौद्धों, इसाईयों और पारसियों के लिए भारतीय राष्ट्रीयता के द्वार खोलने का वादा करता है, 9 दिसंबर, 2019 को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह द्वारा लोकसभा में पेश किया गया था। देश की लोकतांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष राजनीति की मूल आत्मा का उल्लंघन करने वाला यह विधेयक संघ-भाजपा के कारण 8 घंटे से भी कम समय में पारित हो गया। शासकों को लोकसभा में प्रचंड बहुमत प्राप्त है। दुख की बात है कि यह अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस, 10 दिसंबर की पूर्व संध्या पर हुआ। इसने नागरिकता अधिनियम, 1955 का स्थान ले लिया, जिसमें ऐसा कोई भेदभाव नह...
वरिष्ठ पत्रकार चंद्रशेखर शर्मा की बात बेबाक
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वरिष्ठ पत्रकार चंद्रशेखर शर्मा की बात बेबाक

" लाउडस्पीकर की आवाज सुनकर कभी अमीरों ने जमघट नही लगाया , गरीब ही हमेशा खींचे चले आते है । ये सोच के कि आज उनके मतलब की बात होगी , लेकिन वो बोल कर चुप हो गए और हम चिल्लाकर रह गए ।" वन्स अपॉन अ टाइम मुंबई - फिल्म का यह डायलाग पार्टियों और नेताओं की सत्ता की प्यास जनता को मुफ्तखोर बनाने वाले वादो और गारंटी की घोषणा को लेकर याद आ गया । आज कल पार्टियां अपने काम व विकास को भूल नगद बांटने की योजना के दावे वादे कर रहे । भाजपा महतारी वंदन की 1000 की गारंटी से सत्ता में पहुंच गई किन्तु लोकसभा चुनाव में कांग्रेस महालक्ष्मी न्याय योजना के बहाने 8333 रुपये महिलाओं को देने के दावे वादे कर रही । आज राजनीति मुफ्त में बांटने वाली योजनाओं के भरोसे रह गई है नेताओ की छवि की चर्चा तक नही होती घपले घोटालों को छोड़ कर । अपने नेता की छवि पर वोट मांगने की जगह फोकट में बांटने वाली व कर्जमाफी के वादे पर मांगने लगे ह...
चुनावी हल चल ,कल रूख पता चल जाएगा, छत्तीसगढ़ किसको जिताएगा, क्या कवासी का कभी न हारने का रिकाॅर्ड टूटेगा इस बार, कवासी के विरूद्ध और कवासी की तरफ से शिकायतें 0 जवाहर नागदेव
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चुनावी हल चल ,कल रूख पता चल जाएगा, छत्तीसगढ़ किसको जिताएगा, क्या कवासी का कभी न हारने का रिकाॅर्ड टूटेगा इस बार, कवासी के विरूद्ध और कवासी की तरफ से शिकायतें 0 जवाहर नागदेव

  बस आज की रात है ज़िंदगी, कल हम कहां, तुम कहां.... इस बेहद प्रसिद्ध और मजेदार गाने की ये शुरूआती पंक्तियां यहां लागू होती हंै। कल चुनाव का प्रथम चरण संपूर्ण होते तक राजनैतिक पण्डितों को अहसास हो जाएगा कि राजनैतिक हवा किस तरफ का रूख करेगी। बस्तर छह जिलों तक फैला हुआ है। जहां 8 विधानसभा की सीटें हैं अदिवासी के लिये आरक्षित लगभग 14 लाख वोटों वाली इस सीट पर अब तक 17 आम चुनाव हुए हैं एक बार उपचुनाव यानि कुल 18 चुनाव। भाजपा ने छह बार, कांग्रेस ने छह बार, एक बार जनता पार्टी ने यहां से जीत दर्ज की है। सबसे दिलचस्प है यहां से 5 बार निर्दलीय प्रत्याशी का जीतना। दिलचस्प इतिहास 1952 से चुनाव हो रहे हैं। राजा प्रवीरचंद भंजदेव ने जिसको चाहा उसको जिताया। पहली बार निर्दलीय मुचाकी कोसा रिकाॅर्ड मतों से जीते। फिर कांग्रेस प्रत्याशी जीता। उसके बाद फिर निर्दलीय लखमू राजा साहब के कहने पर लड़े औ...
खरी खरी ,बाबा रामदेव हिंदुवादी, राष्ट्रभक्त होने से परेशान, तब गोविंदा ने “किया होता” तो आज जीत होती 0 जवाहर नागदेव वरिष्ठ पत्रकार
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खरी खरी ,बाबा रामदेव हिंदुवादी, राष्ट्रभक्त होने से परेशान, तब गोविंदा ने “किया होता” तो आज जीत होती 0 जवाहर नागदेव वरिष्ठ पत्रकार

चुनावों का चक्कर बड़ा बुरा होता है। मोटी चमड़ी वाले तो आराम से हार स्वीकार कर लेते हैं। दूसरे आराम से वे नेता सह लेते हैं जिन्होनंे चुनावी चन्दे के रूप् में अच्छी-खासी कमाई कर ली होती है। लेकिन भावुक लोग हार आसानी से पचा नहीं पाते। जीत की उम्मीद में चुनाव लड़ने वालों को हार बहुत खलती है। इस नये दौर में काम करना बहुत जरूरी हो गया है। काम न करने वालों को जनता चुनाव में बिना किसी रहम के निपटा देती है। कोई एक बार किसी लहर में जीत भी जाए तो दोबारा उसे मौका नहीं देती है। एक बार कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीत चुके गोविंदा दोबारा शिवसेना के बैनर पर मैदान में हैं। इस बात का दावा करना कठिन है कि वे जीत ही जाएंगे। देश का बेहतरीन महानगर महाराष्ट्र का मुम्बई, जो अपनी दादागिरी, अपनी पुलिस अपने ग्लैमर और अपने व्यापार के लिये जाना जाता है। इस नगर के सफलतम् ग्लैमरस हीरो गोविन्दा को किसी नाम की जरूरत है।...
मतदान का एक आधार प्रेस की आजादी भी होना चाहिए (आलेख : बादल सरोज)
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मतदान का एक आधार प्रेस की आजादी भी होना चाहिए (आलेख : बादल सरोज)

18वीं लोकसभा के निर्वाचन के लिए मतदान शुरू होने वाला है। सभी – यहाँ तक कि जो खुद को सबसे सुरक्षित और पुरयकीन दिखा रहे हैं, वे सत्तासीन भी – मानते हैं कि ये चुनाव आसान नहीं हैं, देश के भविष्य के लिए तो बिलकुल भी आसान नहीं हैं। लोकतंत्र में चुनावों के दौरान जो होता है वह हो रहा है। विपक्ष जनता के जीवन से जुड़े मुद्दों को अपनी पूरी शक्ति के साथ मतदाताओं के बीच ले जाने में जुटा है, वहीँ सता पक्ष इनको छुपाने के लिए तरह-तरह के ध्यान भटकाऊ, आग लगाऊ, भावनात्मक शोशे उछालने में व्यस्त है। मगर इस बार के चुनाव सिर्फ देश की आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक दिशा ही तय नहीं करने जा रहे हैं ; उनके साथ भारत की प्रेस की स्वतंत्रता का सवाल भी तय होने जा रहा है। इसलिए प्रेस, मीडिया, अखबार और सूचना तथा सम्प्रेषण के इन माध्यमों के भविष्य के लिहाज से भी ये चुनाव महत्व हासिल कर लेते हैं। यूं तो नवउदारीकरण के हावी ह...
लोकतंत्र का गहराता संकट और संघ-भाजपा की ख़तरनाक पदचापें (आलेख : जवरीमल्ल पारख)
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लोकतंत्र का गहराता संकट और संघ-भाजपा की ख़तरनाक पदचापें (आलेख : जवरीमल्ल पारख)

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि यह दौर आज़ादी के बाद का सबसे संकटपूर्ण और चुनौती भरा दौर है। न केवल आर्थिक क्षेत्र गहरे संकट में हैं, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र भी गहरे संकट में हैं। धर्म के नाम पर जिस तरह एक पूरे वर्ग को देश के दुश्मन की तरह पेश किया जा रहा है और उन्हें संविधान में मिले नागरिक अधिकारों से वंचित कर दोयम दर्जे के नागरिक में तब्दील किया जा रहा है, वह इस राजसत्ता के फ़ासीवादी चरित्र का ही प्रमाण है। भारत का यह फ़ासीवाद अपने चरित्र में अतिदक्षिणपंथी भी है और ब्राह्मणवादी भी। मौजूदा राजसत्ता के चरित्र को समझने के लिए आरएसएस की विचारधारा को समझना ज़रूरी है। वे अपनी राजनीतिक विचारधारा को ‘हिंदुत्व’ नाम देते हैं। यह विचारधारा उन्होंने विनायक दामोदर सावरकर से ग्रहण की थी, जिन्होंने 1923 में हिंदुत्व नामक पुस्तक लिखी थी। आरएसएस ने अपने इन राजनीतिक उद्देश्यों को कभी छुपाया...