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कभी गोबर से घर को पोतकर दीवारों को मजबूत बनाते थे, आज गोबर बेचकर मजबूत घर बना रहे हैं
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कभी गोबर से घर को पोतकर दीवारों को मजबूत बनाते थे, आज गोबर बेचकर मजबूत घर बना रहे हैं

    *गोधन न्याय योजना के हितग्राहियों को मिल रही है खुशियां, अब पैसों की नहीं सताती है चिंता, गोबर बेच कर रहे हैं सपनों को साकार* *गोधन न्याय योजना में अब तक 283.10 करोड़ रूपए का हो चुका है भुगतान,गौठानों से जुड़ी महिला समूहों को हो चुकी 72.19 करोड़ की आय* रायपुर, 06 जुलाई 2022/ बैकुण्ठपुर के भर्रा की रहने वाली मीनल का एक सपना था कि उनका खुद का एक घर हो, लेकिन ये सपना लंबे समय से सपना ही बना हुआ था। मीनल के पास पैसे नहीं थे कि वो अपने लिए घर बनाए। मीनल ने गांव में दूसरे की घरों की दीवारों को मजबूत करने के लिए अक्सर उनपर गोबर की पुताई करती थी, लेकिन आज इसी गोबर को बेचकर मीनल ने अपने लिए मजबूत घर बना लिया है। गोधन न्याय योजना की मदद से मीनल ने 140 क्विंटल गोबर बेचकर 28 हजार रूपए कमाए और गोबर से 500 क्विंटल वर्मी कंपोस्ट खाद बनाकर बेचने से 5 लाख रूपए की आय अर्जित की। मीनल...
कमाई की होड़ में शिक्षण संस्थान, शिक्षा का बाजार या बाजार की शिक्षा(लेख प्रियंका सौरभ)
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कमाई की होड़ में शिक्षण संस्थान, शिक्षा का बाजार या बाजार की शिक्षा(लेख प्रियंका सौरभ)

  शिक्षा के व्यावसायीकरण के कारण शिक्षण एक जुनून के बजाय एक शुद्ध पेशा बन गया है और शिक्षण संस्थानों ने मूल्यों को विकसित करना बंद कर दिया है। स्कूल चार दीवारों वाली एक इमारत है जिसके अंदर एक उज्जवल कल है। यदि विद्यालय मूल्यों को विकसित करने में विफल रहते हैं तो आने वाली पीढ़ी सामाजिक बुराइयों से प्रभावित हो सकती है। असहिष्णुता, कट्टरता, लैंगिक भेदभाव और अपराध में वृद्धि देखी जा सकती है। -प्रियंका 'सौरभ' "शिक्षा का उद्देश्य तथ्य नहीं बल्कि मूल्यों का ज्ञान है।" युवा मन में इन मूल्यों को विकसित करने में स्कूल और कॉलेज एक प्रमुख भूमिका निभाते हैं। अनुशासन, जवाबदेही, अखंडता, टीम वर्क, करुणा, विश्वास और ईमानदारी सबसे महत्वपूर्ण मूल्य हैं जो स्कूलों में पेश किए जाते हैं। शिक्षक को छात्रों में उपरोक्त मूल्यों को विकसित करने के लिए एक रोल मॉडल के रूप में कार्य करना चाहिए। हालाँकि, शिक्ष...
महंगाई उच्चतम सीमा पर , आवश्यक वस्तुओं के मूल्यों को रोकने नए प्रभावी नियंत्रक कानून की आवश्यकताl (लेख संजीव ठाकुर)
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महंगाई उच्चतम सीमा पर , आवश्यक वस्तुओं के मूल्यों को रोकने नए प्रभावी नियंत्रक कानून की आवश्यकताl (लेख संजीव ठाकुर)

भारत में पिछले दो वर्षों में महंगाई चरम पर पहुंच गई हैl भारत की जनसंख्या के मद्देनजर लगभग 135 करोड़ लोगों के लिए आवश्यक वस्तुओं के दाम पहुंच से बाहर होते जा रहे हैं। आपको यह बता दें कि आवश्यक वस्तुओं में चावल, दाल, गेहूं, केरोसिन, गैस, पेट्रोल, डीजल और अन्य रोजमर्रा की चीजें समाहित है ।आवश्यक वस्तुओं के मूल्य केरोसिन,गैस और पेट्रोल ,डीजल को छोड़कर अन्य चीजों कीमतों पर प्रभावी नियंत्रण के लिए कोई भी अत्यंत प्रभावी नियंत्रक कानून प्रचलन में नहीं है और जो वर्तमान में प्रचलित धाराएं हैं वह बढ़ती कीमतों पर प्रभावी नियंत्रण के लिए पर्याप्त ना होकर काफी लचीली है। आवश्यक वस्तु अधिनियम को भी परिमार्जित करने की आवश्यकता प्रतीत होती है। यदि वर्तमान जैसा परिदृश्य लगातार चलता रहा तो महंगाई बेलगाम हो जाएगी और तमाम आवश्यक वस्तुओं की कीमतें आम आदमी की पहुंच से बाहर होकर अनियंत्रित हो जाएगीl इसी लिए के...
अत्यधिक ऑनलाइन गेमिंग बच्चों की शिक्षा और सोच पर डाल रही हानिकारक प्रभाव (लेख सत्यवान सौरभ)
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अत्यधिक ऑनलाइन गेमिंग बच्चों की शिक्षा और सोच पर डाल रही हानिकारक प्रभाव (लेख सत्यवान सौरभ)

अत्यधिक ऑनलाइन गेमिंग बच्चों की शिक्षा और सोच पर डाल रही हानिकारक प्रभाव। सरकार बच्चों के लिए ऑनलाइन गेमिंग घंटे को विनियमित कर सकती है। उदाहरण के लिए, हाल ही में, चीन ने 18 साल से कम उम्र के गेमर्स को प्रति सप्ताह केवल तीन घंटे ऑनलाइन गेम तक सीमित कर दिया। -सत्यवान 'सौरभ'   हाल ही में सरकार ने ऑनलाइन गेमिंग को विनियमित करने और उसकी देखरेख के लिए एक मंत्रालय की पहचान करने के लिए एक समिति के गठन की घोषणा की है। बदलते तकनीकी दौर में आज अधिक से अधिक राज्य ऑनलाइन गेमिंग क्षेत्र में कुछ आदेश लाने के लिए कानून ला रहे हैं। हाल ही में, राजस्थान सरकार ने ऑनलाइन गेम, विशेष रूप से फंतासी खेलों को विनियमित करने के लिए एक मसौदा विधेयक लाया। इससे पहले, तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों ने भी ऑनलाइन गेम पर प्रतिबंध लगाने वाले कानून पारित किए थे। हालांकि, उन्हें राज...
देश में हिंसक होते युवा आंदोलन (लेख सत्यवान सौरभ)
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देश में हिंसक होते युवा आंदोलन (लेख सत्यवान सौरभ)

  ( हरियाणा, उत्तर प्रदेश और बिहार में भारी बेरोजगारी होने के साथ सरकारी नौकरियों की कमी की वजह से, युवाओं में ज्यादा हताशा और आक्रोश है। लेकिन यह स्थिति पूरे देश की भी है। ग्रुप-डी की नौकरी के लिए करोड़ों लोग अप्लाई कर रहें है। नौकरी के इच्छुक करीब 25 प्रतिशत युवाओं को कोई काम नहीं मिल रहा है। दशकों से स्थिति लगातार बदतर होती जा रही है, खासकर एक ऐसे देश में जहां आधी से अधिक आबादी 25 से कम उम्र की है। भारत को हर महीने एक लाख रोजगार पैदा करने की जरूरत है जबकि इसकी अर्थव्यवस्था कभी भी इस मांग को पूरा करने की स्थिति में नहीं आई।) -सत्यवान 'सौरभ' गोल्डस्टोन ने लिखा है, "युवाओं ने पूरे इतिहास में राजनीतिक हिंसा में एक प्रमुख भूमिका निभाई है," और एक युवा उभार कुल वयस्क आबादी के सापेक्ष 15 से 24 युवाओं का असामान्य रूप से राजनीतिक संकट से ऐतिहासिक रूप से जुड़ा हुआ है। पिछले कुछ वर्षों...
अग्निपथ योजना का विरोध बेरोजगारी संकट का सूचक है
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अग्निपथ योजना का विरोध बेरोजगारी संकट का सूचक है

  बेरोजगारी आज भारत में चिंताजनक चिंता का कारण बनता जा रही है; बेरोजगारी एक ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति शारीरिक और मानसिक रूप से मौजूदा मजदूरी दर पर दोनों काम करने में सक्षम होता है, लेकिन नौकरी नहीं मिलती। -प्रियंका 'सौरभ' अग्निपथ योजना के खिलाफ सबसे अधिक विरोध बिहार, उत्तर जैसे राज्यों में शुरू हुआ और तेजी से उत्तर भारत के अधिकांश हिस्सों में फैल गया। यहां अच्छी नौकरियां नहीं पैदा हो रही हैं। खराब कार्य अनुबंधों की अंतर्निहित समस्या, तदर्थ संविदाकरण और कार्यबल में विसंघीकरण ने सुरक्षित नौकरियों की गुणवत्ता को कम कर दिया है और इसके कारण बेरोजगारी तेजी से बढ़ी है। अग्निपथ योजना को देश में मिली-जुली प्रतिक्रिया मिल रही है। सरकार ने तीनों में सैनिकों की भर्ती के लिए अपनी नई योजना का अनावरण किया। नई अग्निपथ योजना के तहत सेना, नौसेना और वायु सेना में लगभग 45,000 से 50,000 सैनि...
युद्ध और हिंसा क्रोध से शुरू होकर पश्चाताप और दुखों के चिंतन में खत्म होता है। रूस और यूक्रेन युद्ध कि 100 दिनों से ज्यादा के युद्ध की परिणति में शिवाय पश्चाताप के कुछ नहीं है लेख ,संजीव ठाकुर
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युद्ध और हिंसा क्रोध से शुरू होकर पश्चाताप और दुखों के चिंतन में खत्म होता है। रूस और यूक्रेन युद्ध कि 100 दिनों से ज्यादा के युद्ध की परिणति में शिवाय पश्चाताप के कुछ नहीं है लेख ,संजीव ठाकुर

युद्ध और हिंसा क्रोध से शुरू होकर पश्चाताप और दुखों के चिंतन में खत्म होता है। रूस और यूक्रेन युद्ध कि 100 दिनों से ज्यादा के युद्ध की परिणति में शिवाय पश्चाताप के कुछ नहीं हैl रूस अपने सनकी राष्ट्रपति पुतिन की जिद की बलि चढ़ गया है। वह यूक्रेन से जीत कर भी मानसिक और वैचारिक रूप से हार गया हैl रूस अपने को जितना बलशाली, शक्तिशाली समझता था अब उसकी पोल खुल गई है, 4 माह से ज्यादा के युद्ध में रूस यूक्रेन जैसे छोटे देश को जीत नहीं पाया हैl यूक्रेन भी अपनी राष्ट्रपति की हठधर्मिता के कारण पूर्ण रूप से बर्बाद हो चुका है. यूक्रेन के 1करोड़40लाख नागरिक देश छोड़कर शरणार्थी बन चुके हैं। 40 हजार इमारतें बर्बाद हुई 20 लाख बच्चे घरों से दूर होकर शिक्षा से वंचित हो गए। ईसी तरह यूक्रेन तथा रूस के लगभग 50 बाजार सैनिक युद्ध में मारे गए है।यह युद्ध की विभीषिका कहां तक जाएगी इसका आकलन करना तो कठिन है पर इसक...
शिक्षा की ठोष बुनियाद एवं सम्यक आर्थिक वैज्ञानिक नीति राष्ट्र की आवश्यकता
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शिक्षा की ठोष बुनियाद एवं सम्यक आर्थिक वैज्ञानिक नीति राष्ट्र की आवश्यकता

हर राष्ट्र के विकास के लिए शिक्षा का अति महत्वपूर्ण किरदार होता है जिस राष्ट्र में शिक्षा,संस्कृति जितनी गहरी और समृद्ध हो वह राष्ट्र उतना ही विकसित,पुष्पित, पल्लवित होता है। इसके साथ आर्थिक तथा वैज्ञानिक सोच भी अत्यंत विचारणीय है।हर देश में राष्ट्र के प्रति और राष्ट्रहित के प्रति चिंतन करने वालों का समूह होना चाहिए,जो प्रजातांत्रिक लोकतांत्रिक तथा राष्ट्रहित के विचारों और विकास के मूल मंत्र को नई ऊर्जा ताजा हवा और आगे बढ़ने की सच्चाई को इंगित कर सकेंl बिना संस्कृति ,संस्कार और वैचारिक क्षमता के कोई भी राष्ट्र वैश्विक स्तर पर अंतरराष्ट्रीय प्रगति करने की सोच भी नहीं सकताl वैचारिक और सैद्धांतिक अंतरधारा, सिद्धांतों को कुचला या नष्ट नहीं किया जा सकता। व्यक्तिगत वैचारिक अभिव्यक्ति भारत के संदर्भ में गणतंत्र की मूल आत्मा है। विचार और सिद्धांत व्यक्ति की अंतःप्रज्ञा होती है। यह सिद्धां...
नुपूर शर्मा, तुम डटी रहो! (व्यंग्य : राजेन्द्र शर्मा)
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नुपूर शर्मा, तुम डटी रहो! (व्यंग्य : राजेन्द्र शर्मा)

  जज लोगों को ये क्या हो गया है! न्यायमूर्ति क्या कहलाने लगे, हमें ही सीख देने लगे, क़ानून के साथ नैतिक शिक्षा भी पढ़ाने लगे। बताइए, कह रहे हैं कि नूपुर शर्मा को माफ़ी मांगनी चाहिए! और माफ़ी भी किस से? माफ़ी नड्डा जी से नहीं। माफ़ी शाह जी से भी नहीं। यहां तक कि माफ़ी मोदी जी से, भागवत जी से भी नहीं। माफ़ी, देश से मांगनी चाहिए। माफ़ी उस देश से जो स्वतंत्रता के पचहत्तर साल बाद भी हिंदू राष्ट्र बनने को राजी नहीं है? माफ़ी उस देश से जिसमें सौ करोड़ हिंदू रहते हैं, और बस बीस करोड़ मुसलमान और दस करोड़ बाकी सब... जज साहिबान कान खोलकर सुन लें, नूपुर शर्मा माफ़ी नहीं मांगेगी। किसी देश-वेश से माफ़ी नहीं मांगेगी। सार्वजनिक रूप से, बिना शर्त के, टीवी पर जाकर माफ़ी, हर्गिज़-हर्गिज़ नहीं मांगेगी। हां! बेचारी की तपस्या में कोई कमी रह गयी हो तो, उसके लिए उसने पार्टी और मोदी जी की...
भौतिकवादी युग में आत्मीय संबंधों की अग्नि परीक्षा l ( छिन्न भिन्न होती मानवीय संवेदनाएं)लेख संजीव ठाकुर
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भौतिकवादी युग में आत्मीय संबंधों की अग्नि परीक्षा l ( छिन्न भिन्न होती मानवीय संवेदनाएं)लेख संजीव ठाकुर

भौतिकवादी युग में आत्मीय संबंधों की अग्नि परीक्षा l ( छिन्न भिन्न होती मानवीय संवेदनाएं) आज के इस उत्तर आधुनिक समाज में जहां उपभोक्तावादी संस्कृति की प्रधानता के परिपेक्ष में भौतिक साधनों एवं सुखों के लक्ष्य की प्राप्ति ही एकमात्र उपाय रह गया है, वहीं भौतिकवाद तथा शारीरिक सुख की प्राप्ति का प्रचलन पूरे समाज व देश में अपना परचम फैला चुका हैl इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए झूठ फरेब एवं षड्यंत्र ने अपना जाल बुन रखा हैl प्राचीन काल से हम आध्यात्मिक, संस्कारिक,सांस्कृतिक रूप से बढ़ रहे थे पर विकास की अवधारणा ने एक नया स्वरूप ले लिया है इन परिस्थितियों में समाज के सदस्यों ने झूठ और फरेब का सहारा लेना शुरू कर दिया हैl भौतिकवाद सिर चढ़कर बोलने लगा हैl व्यक्तिगत एवं सामाजिक आत्मीय संबंधों के मूल्य का तेजी से क्षरण होने लगा हैl समाज के मूलभूत सिद्धांत तथा मूल्य गायब हो गए हैं। सामाजिक मूल्यों के खत्...