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राहुल,उद्धव का दुख, समझे न हवा का रूख उमर ने बदली चाल, कामयाब उमर-फारूख 0 वरिष्ठ पत्रकार जवाहर नागदेव की खरी… खरी…

 

कांग्रेस के खिवैया राहुल गांधी का रवैया हमेशा से अकड़ू रहा है। उनके दर पर आए किसी भी याचक से वे ऐंठ जाते हैं बजाए अपनी और उसकी वास्तविक शक्ति का आंकलन किये।

वे किसीका कितना बना या बिगाड़ने में सक्षम हैं ये समझे बिना वे अपने को देश की सर्वोच्च कामयाब पार्टी का सर्वोच्च नेता समझते हैं।

एक समय ऐसे ही दम्भ का शिकार उद्धव ठाकरे होते दिखे थे। ये दोनों नेता एक ही नाव पर सवार रहे। और दुनिया ने दोनों का हश्र देखा।

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में राहुल से उद्धव ने बड़ी चिरौरी की कि उन्हें मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित किया जाए पर कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस दोनों ने ही उन्हें घास नहीं डाली।

उद्धव के लिये बंद

भाजपा के दरवाजे

जब चारों ओर से घोर निराशा ने उन्हें घेर लिया तो उन्होंने एक बार फिर मोदी, शाह और फड़नवीस की तारीफ में कसीदे कसने शुरू कर दिये। अपने अखबार सामना में भी उन्होंने इनके सम्मान मे पन्ने रंगीन करने की मुहिम चला दी।

पर ये लोग राजनीति में उनके बाप लगते हैं, मां नहीं। बाप राजनीति सिखाता है और मां गलती करने के बाद भी हजार बार माफ कर देती है।

लेकिन शाह ने उन्हें जता दिया कि वे बाप हैं मां नहीं। भाजपा नेता अमित शाह ने अपने कार्यकर्ता सम्मेलन में साफ-साफ संदेश दिया कि गद्दारों को बक्शा नहीं जाएगा।

यानि

उद्धव ठाकरे को साफ संदेश ये कि अब उनके लिये भाजपा के दरवाजे बंद हैं।

दरअसल उद्धव ठाकरे ने शुरू से राजनैतिक ‘अ’सूझ-बूझ का परिचय दिया। वे कच्चे खिलाड़ी निकले। याद करें किस तरह वे भाजपा के वरिष्ठतम नेताओं को भी अपनी चैखट पर आने के लिये मजबूर करते रहे।

अमित शाह को मजबूर किया था

अपनी चैखट पर आने के लिये

एक समय जब शिवसेना शिखर पर थी। वो जब बाला साहब ठाकरे का दौर था। बाला साहब निस्वार्थ हिंदु सेवक थे उनकी बात में दम था। जनता उनकी एक आवाज पर कोई भी उलटफेर करने को तैयार रहती थी।

उनके जाने के बाद उनके पुत्र और उत्तराधिकारी शिवसेना अध्यक्ष उद्धव इस भ्रम के शिकार हो गये कि वे भी उतना ही प्रभाव रखते हैं।

और

इसी भ्रम में उन्होंने बातचीत करने के लिये अपने पिता बाला साहब ठाकरे की तरह

अमित शाह को अपने दरबार में आने के लिये मजबूर किया। बाला साहब आजीवन कभी किसी के दरवाजे पर नहीं गए बल्कि हर किसी को उनकी चौखट मातोश्री में आना पड़ता था

वक्त की नजाकत को समझ कर अमित शाह ने अपमान का घूंट पी लिया और खुद उनसे मिलने गये।

और तो और ऐसे समय में अपने दम्भ में उद्धव ने देवेन्द्र फड़नवीस को बाहर बिठवा दिया और खुद शाह के साथ अंदर मीटिंग करते रहे।

आज उन्हीं फड़नवीस की उन्हें चिरौरी करनी पड़ रही है और अमित शाह भी उनके साथ कोई मुरव्वत करते नहीं दिख रहे।

चतुर उमर-फारूख ने पाला बदल दिया

ईधर जम्मू काश्मीर के चुनाव ने एक नयी दिशा दिखाई देश को। राजनीति में बहुत कुछ बदल गया ये साफ संदेश दिया। न चाहते हुए भी मोदी और भाजपा विरोधियों को ये यकीन करना पड़ा कि अब मामला मोदी के हाथ में है। उनका राजनीति का अलग तरीका जनता में स्वीकार्य हैं।

साथ ही ये कि कांग्रेस ढलता सूरज है। बावजूद 99 कांग्रेसी सांसदों के मोदी की मंशा पर कोई रोक नहीं लगा पाता।

काश्मीर के सर्वोच्च नेता बाप-बेटे की जोड़ी ने खुलेआम बिना किसी संकोच के साफ-साफ मोदी की अघोषित बादशाहत स्वीकार कर ली।

उन्होने कोई ढका-छिपा संदेश नहीं दिया। साफ कहा कि हमें केन्द्र के साथ मिलकर चलना है। राज्य का विकास करना है तो केन्द्र के साथ समझौता करना होगा।

ये विचार राहुल गांधी और कांग्रेस पर बिजली की तरह गिरे और इस तरह राहुल गांधी के लिये ये दरवाजा भी बंद हो गया।

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जवाहर नागदेव वरिष्ठ पत्रकार, चिंतक, विश्लेषक, मोबा. 9522170700‘बिना छेड़छाड़ के लेख का प्रकाशन किया जा सकता है’

 

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