
पग-पग (हर कदम) पर पग (पगड़ी) उछलती है और बार-बार पग (पैरों) पर गिरता है,
फिर भी अपनी हरकतों से बाज नहीं आता। तात्पर्य ये है कि हमेशा दुश्मनी का रास्ता चुना और हमेशा मुंह की खाई, सम्मान भी जाता रहा। विश्व भर में हमेशा नाक कटी है।
लेकिन फिर भी अपनी नीच हरकतों से बाज नहीं आता।
बाज क्यों नहीं आता इसे हर भारतीय समझता है।
असल कारण ये है कि कांग्रेस की तुष्टिकरण की नीति के कारण हम लोग पाकिस्तान को केवल गीदड़ भभकियां देते रहे थे। कभी ठोस कार्यवाही नहीं की
आतंकियों के खिलाफ कार्यवाही करने के लिये पाकिस्तान से भीख मांगती रही हमारी कांग्रेस सरकार। वो बम पर बम मारते रहे, हम गुस्से से आंखें लाल करते रहे… बस।
न कभी मारा, न कोई और शत्रुता वाला भाव दिखाया। हम बार-बार खुद को कायर साबित करते रहे।
दुनिया दमदारों की….
अब चूंकि दुनिया दमदारों की होती है लिहाजा दुनिया ने उसका साथ दिया जिसका पलड़ा भारी दिखा। जाहिर है अभी भी दुनिया ंवही कर रही है। अभी भी दमदार के पक्ष में खड़ी दिख रही है।
फ़र्क बस इतना है कि पहले हम कायर और वो दमदार दिखते थे,पर अब परिदृष्य पूरी तरह बदल गया है।
अब उन्हें एक की जगह चार जूते पड़ते हैं। अब…… यानि 2014 के बाद यानि कांग्रेस के जाने और भाजपा की सरकार बनने के बाद।
जब से मोदीजी प्रधानमंत्री बने हैं, न तो यहां-वहां बम विस्फोटों की घटनाएं होती हैं, न हम आतंकियों को मारने पाकिस्तान के आगे कटोरा लिये खड़े होते दिखते हैं।
हम तो बस ये करते हैं कि उनके द्वारा कोई आतताई हरकत करने के तत्काल बाद उनके अड़डों पर बम फोड़ते हैं। और अब तो जूते खाने की आदत पड़ गयी है पाकिस्तान को। लेकिन अब भी वो कर्जा लेकर हथियार ही लेने की सोच रहा है न कि गेहूं, चावल और दूध।
फ़र्क मोदी और इंदिरा राज में
क्यों बंद हंै हमारे 54 सैनिक
याद करें कि हमारा एक सोल्डर अभिनन्दन पाकिस्तान की सीमा के अंदर पहुंच गया और पकड़ा गया था तो हाथ-पैर फूल गये थे पाकिस्तान के। हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से घबरा कर पाकिस्तान ने उसे ससम्मान लौटा दिया था।
दूसरी तरफ मोदी राज से पहले हमारे जितने भी सैनिक पकड़ाए शर्मनाक है कि वे मृत ही नहीं क्षत-विक्षत अवस्था में लौटाए गये थे।
और तो और याद करें किस तरह देश मेें इंदिरा राज में पाकिस्तान के आत्मसमर्पित 93 हजार सैनिक वापस लौटाने का ढिंढोरा पीटा जाता है
लेकिन ये सच छिपा लिया जाता है कि हमारे 54 सैनिक पाकिस्तान ने पकड़े थे जिनकी गंभीरता से कोई सुध नहीं ली गयी।
ऐसा क्यों ?
क्या 1971 में इंदिरा गांधी पाक को हराकर इतनी आत्ममुग्ध हो चुकी थीं कि उन्हें अपने ही 54 सैनिकों की जान की परवाह नहीं की। क्यांे उनके लिये कुछ किया नहीं और किया तो क्या वो इतनी कमजोर थीं कि इस मोर्चे पर हार गयीं ?
इतिहास से ये प्रश्न तो बार-बार उठेगा और पूछा जाएगा कांग्रेस से….
अपने जीवित रक्षकों की तरफ कोई ध्यान न देना बेहद शर्मनाक, अमानवीय और दुखद है।

जवाहर नागदेव, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, चिन्तक, विश्लेषक
मोबा. 9522170700
‘बिना छेड़छाड़ के लेख का प्रकाशन किया जा सकता है’
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