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गर्मी से बेहाल ताल और अस्पताल, जनता त्रस्त, अफसर मस्त, वरिष्ठ पत्रकार जवाहर नागदेव की खरी… खरी… 

अस्पताल और ताल यानि तालाब दोनों ही जीवन के लिये अति आवश्यक हैं मगर शासन दोनों के साथ अन्य विभागों की तुलना मे कोई पक्षपात् नहीं करता।

अन्य विभागों की तरह इनमें भी बेईमानी के भरपूर मौके उपलब्ध हैं और अधिकारी इसका भरपूर लाभ भी उठाते हैं।

अन्य विभागों की तरह इनमें भी भरपूर खर्च दिखाया जाता है और सम्पूर्ण लापरवाही के साथ काम किया जाता है और फिर अपने ही काम पर पानी फेरने का काम करने में भी कोई कोताही नहीं की जाती।

बदहाल अस्पताल

राजधानी के सरकारी किसी भी अस्पताल में चले जाएं माहौल एक जैसा मिलता है। गंदे टायलेट, कहीं-कहीं दरवाजे भी गायब, चादर-तकियों-बिस्तरों में कीड़े-मकोड़े, बदबू, फर्श में दाग ये सब चीजें जो स्वास्थ्य को ठीक करने के लिये आवश्यक हैं ‘स्वास्थ्य सुधार ठिकानों’ की पहचान बन गयी है।

प्रेम-सहानुभूति का कोई प्रदर्शन नहीं

कहा जाता है कि डाॅक्टर का व्यवहार अच्छा हो तो मरीज आधा ठीक हो जाता है। लेकिन यहां अच्छा तो क्या पूरे स्टाफ के व्यवहार में बत्तमीजी और कठोरता पाई जाती है। किसी के कष्ट से इन्हें कोई कष्ट नहीं।

सरकारी अस्पताल के कार्णधारों की चिन्ता मरीजों को मानसिक और शारीरिक कष्ट से निजात दिलाना नहीं।

इनकी चिन्ता केवल अर्थ पर टिकी है। कैसे माल खरीदी में कमीशन निकाली जाए, कैसे अपनी कुर्सी पर आराम फरमाया जाए और किस तरह ड्यूटी की औपचारिकताएं पूरी की जाएं।

गर्मी और उमस से कायम बेचैनी से परेशान मरीज, बच्चे, बुजुर्ग पेपर से या हाथ के पंखे से हवा करके ही अपने पाप काटने पर मजबूर हैं। इन सरकारी अस्पतालों में आकर उन्हें अपने पाप ही नजर आते हैं जिनकी सजा वे पा रहे हैं।

नर्क का संकेत

हल्की या एक्सपायर्ड दवाएं भी उनकी सजा में शामिल हैं, जो कर्णधारों के माध्यम से इन्हें मिलती हैं। कूलर देखने से यदि ठण्डक मिल जाती तो बेशक ये भी ठण्डे हो जाते। अफसरों को एसी और कूलर से सुकून मिलता है और माल समेटने से गर्मी। दोनों ही मामलों में ये एलर्ट रहते हैं। मरीज तड़प-तड़प ठण्डा हो जाए इनकी बला से।

मरीज तो मरकर मुक्ति पा लेता है पर उसके परिजन मरीज की मौत के बाद भी कभी एम्बूलेंस के लिये तो कभी पार्किंग पर तो कभी डेथ सर्टिफिकेट के लिये जूझते नजर आते हैं। ये कहना सही होगा कि अस्पताल के अंदर घोर अमानवीयता के दर्शन हो जाते हैं।

मरे हुए को और जीवित को सभी को नर्क के दर्शन हो जाते हैं।

अस्पतालों की तरह बेहाल ताल (तालाब)

हर साल गर्मी में त्राहि-त्राहि मचती है और आम दिनों भी पानी के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। मगर अफसोस है कि छत्तीसगढ़ में लगभग 120 तालाब हैं जो अपनी दुव्र्यवस्था पर कराह रहे हैं।

हर साल लाखों का बजट इनके पुनरूद्धार के लिये रखा जाता है खर्च किया जाता है, सजाया जाता है। नयी-नयी योजनाएं लाई जाती हैं। लेकिन जल्दी ही इनका पटाक्षेप कर दिया जाता है।

फण्ड कम और खाने को नहीं मिलता तो रख-रखाव भी नहीं।

सबसे बड़े दुख की बात है कि जैसे ही अफसरों को कोई और महात्वाकांक्षी, कमाई वाला प्रोजेक्ट मिलता है ये निर्ममता पर उतर आते हैं। तब बड़ी निर्ममता के साथ इन्हीं तालाबों को पाटने पर उतारू हो जाते हैं।

पाटने का बेशक कोई न कोई जायज कारण बताया जाता है लेकिन क्या कोई भी चीज पानी से अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है।

दुख है कि जनता में भी उतनी जागृति नहीं है कि इसका जोरदार विरोध कर सके।

जल्द ही नहीं चेते तो पानी सिर्फ आंखों मे नजर आएगा तालाबों में नहीं।


जवाहर नागदेव, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, चिन्तक, विश्लेषक

मोबा. 9522170700

‘बिना छेड़छाड़ के लेख का प्रकाशन किया जा सकता है’

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