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छत्तीसगढ़ी भाषा-साहित्य के वैश्विक पर्याय थे पद्मश्री डॉक्टर सुरेंद्र दुबे ,नमन |

गुदगुदाता हुआ हास्य, तीक्ष्ण व्यंग्य, अद्भुत रचनात्मक शैली के धनी अंतर्राष्ट्रीय हास्य कवि पद्मश्री डॉक्टर सुरेंद्र दुबे सबको रोता,बिलखता और आंसुओं से भीगता हुआ छोड़ गए। उनका आसामयिक निधन संपूर्ण साहित्य जगत के लिए अपूरणीय क्षति है। अपनी स्वयं की मृत्यु पर हास्य पैदा करने वाले और हास्य व्यंग में टाइगर अभी जिंदा है कहने वाले हास्य के शिखर पुरुष व्यंग्य के पुरोधा, छत्तीसगढ़ी भाषा-साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर पद्मश्री डॉ सुरेंद्र दुबे जी के निधन से साहित्य जगत स्तब्ध है। उनकी जीवन शैली ऊर्जा और साहित्य के प्रति जिजीविषा सदैव प्रेरणा का स्रोत रहेगी। उन्होंने छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य और बोली को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गगनचुंबी ख्याति प्रदान की है। डॉ सुरेंद्र दुबे जितने उच्च कोटि के कवि थे उतने ही संवेदनशील, सीधे, स्वाभिमानी और गरीब तबके के व्यक्तियों के बड़े हिमायती भी थे। मुझे उनके साथ 15 से 20 मंचों में काव्य पाठ का प्रदेश और देश के विभिन्न स्थानों में सानिध्य प्राप्त हुआ है। वे मुझसे हमेशा अपने छोटे भाई की तरह ही व्यवहार किया करते थे और पूरे समय हास्, परिहास, व्यंग एवं मजाक ही किया करते थे। उनकी श्रीमती शशि दुबे मेरे मामा जी की सुपुत्री हैं और रिश्ते में मेरी बड़ी बहन लगती है इस तरह मेरा डॉ सुरेंद्र दुबे जी से रिश्ता साले- जीजा का बड़ा नाजुक और मजाक का ही हुआ करता था। वे मंच में संचालन करते हुए भी मुझ पर मेरा पूरा नाम लेकर व्यंग कसा करते थे और उस हास परिहास में श्रोताओं के साथ कवियों को भी काफी आनंद आया करता था, यह मेरा सौभाग्य था कि वह मुझे इस काबिल समझते थे। छत्तीसगढ़ी भाषा के हास्य व्यंग्य के पुरोधा कवि डॉ सुरेंद्र दुबे छत्तीसगढ़ एवं देश के कवि सम्मेलन की आन बान और शान रहे, छत्तीसगढ़ में राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय स्तर के कवि सम्मेलनों में डॉक्टर सुरेंद्र दुबे की उपस्थिति अति अनिवार्य होती थी जब भी कोई कवि मंच में दर्शकों द्वारा नापसंद या खारिज किया जाता था तब डॉक्टर सुरेंद्र दुबे ही थे जो मंच को और दर्शकों को पूरी तरह संभाल कर गुदगुदा कर हास्य पैदा कर देते थे जिससे कवि सम्मेलन पूरी तरह सफल हो जाया करता था। व्यक्तिगत तौर पर मैं डॉक्टर सुरेंद्र दुबे जी की कविताओं और उनकी मेहनत लगन तथा ईमानदार व्यक्तित्व का बहुत बड़ा प्रशंसक और अनुयाई रहा हूं। उनका अचानक स्वर्ग सिधार जाना व्यक्तिगत तौर पर मेरे लिए बहुत बड़ी अपूर्णीय क्षति है। छत्तीसगढ़ का हर कवि सम्मेलन उनके बिना अधूरा और अपूर्ण हुआ करता था उनकी हास्य कविताओं से छत्तीसगढ़ प्रदेश का हर नागरिक और देश का हर व्यक्ति बड़ा कायल था।

उनकी इस प्रतिभा से प्रभावित होकर उन्हें 2010 में भारत सरकार ने पद्मश्री सम्मान से विभूषित किया था।

निश्चित तौर पर वे इस सम्मान के सच्चे और सही हकदार थे। देश और प्रदेश के हर कवि सम्मेलन में उनकी उपस्थिति कवि सम्मेलन की सफलता की गारंटी और पर्यायवाची थीl 72 वर्षीय हास्य सम्राट कवि डॉक्टर सुरेंद्र दुबे ने 26 जून को शाम 4:00 बजे अपनी अंतिम सांसें ली और स्वर्ग में देवताओं को हंसाने के लिए स्वर्ग सिधार गए। 27 जून 25 को दोपहर बहुत बड़ी संख्या में उनके प्रशंसको की उपस्थिति में उनका अंतिम संस्कार किया गया।

उनके निधन पर छत्तीसगढ़ के राज्यपाल माननीय रामेन डेका जी ने श्रद्धांजलि अर्पित की है साथ ही माननीय मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने गहरा शोक व्यक्त करते हुए दिवंगत डॉक्टर सुरेंद्र दुबे की आत्मा की शांति तथा शोक संतृप्त परिजनों को दुख सहने के लिए शक्ति और संबल की प्रार्थना की। उन्होंने पद्मश्री डॉक्टर सुरेंद्र दुबे के निधन को साहित्य जगत की अपूरणीय क्षति बताया उन्होंने आगे कहा डॉ दुबे जी की जीवंतता,ऊर्जा और साहित्य के प्रति समर्पण सदैव प्रेरणा का स्त्रोत रहेगा। प्रख्यात अंतरराष्ट्रीय कवि डॉ कुमार विश्वास ने भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स में डॉक्टर सुरेंद्र दुबे के साथ अपनी तस्वीर साझा करते हुए लिखा कि छत्तीसगढ़ की बौद्धिक साहित्य का सांस्कृतिक धरोहर के स्थापित पर्याय कुशल मंच संचालक एवं शब्दों के हुनर से दर्शकों श्रोताओं में जान फूंकने के सिद्ध कवि छत्तीसगढ़ के माटी पुत्र पद्मश्री डॉ सुरेंद्र दुबे के निधन से संपूर्ण साहित्य जगत अपूर्व क्षति की मनोदशा में है। कविवर आप सदैव हमारे मुस्कुराहटों में सजीव रहेंगे। अशेष श्रद्धा प्रणाम। पेशे से आयुर्वेदिक चिकित्सक डॉक्टर सुरेंद्र दुबे व्यंग्य शैली के राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय स्तर के बड़े कवि और लेखक थे। उनका जन्म 8 जनवरी 1953 को छत्तीसगढ़ के बेमेतरा में हुआ था। डॉ सुरेंद्र दुबे मंच तथा टेलीविजन के भी प्रख्यात कवि थे। उन्होंने चार किताबें भी लिखी हैं। उन्हें राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न देशों में सम्मानित तथा पुरस्कृत किया गया था। कवि सम्मेलन में अक्सर जाते समय कार् या ट्रेन में बातों के दौरान सदैव भावुक खोकर मेरा नाम लेकर कहा करते थे यार इतने छोटे व्यक्ति को इतना सम्मान मिलना बहुत बड़ी बात है, वे अपने आप को अंतरराष्ट्रीय स्तर के बड़े कवि होने के बावजूद बहुत सामान्य आदमी समझते यह उनका बहुत बड़ा बड़प्पन ही था और कहते मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूं मेरे मृत्यु पर्यंत यह सम्मान बना रहे और मेरी कविताएं दर्शकों को श्रोताओं को इसी तरह गुदगुदाती रहें, हँसाती रहे। शायद उन्हें पूर्व में भान हो गया था कि वे पृथ्वी लोक में श्रोताओं दर्शकों को हंसाते हुए देवताओं को भी हंसाने स्वर्ग लोक सिधार जाएंगे।हास्य सम्राट,छत्तीसगढ़ भाषा के अंतरराष्ट्रीय पर्याय पद्मश्री डॉक्टर सुरेंद्र दुबे को मेरी व्यक्तिगत एवं छत्तीसगढ़ काव्य संस्थान,उत्तरायण सामाजिक सांस्कृतिक साहित्यिक संस्थान एवं नव-छत्तीसगढ़ साहित्य संस्कृत संस्थान रायपुर की तरफ से श्रद्धांजलि,नमन ।ईश्वर उन्हें अपने श्री चरणों में स्थान प्रदान करें एवं शोक संतप्त मेरी बड़ी बहन आदरणीया शशि दुबे जी को और उनके संपूर्ण परिवार को इस गहरे दुख को सहन करने की शक्ति प्रदान करें। ओम नमः शिवाय।

संजीव ठाकुर, स्तंभकार,चिंतक, लेखक, रायपुर, छत्तीसगढ़, 9009 415 415

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