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चीनी सेना का टॉप जनरल बेच रहा था देश का न्यूक्लियर प्लान! जिनपिंग ने हटाया, क्या तख्तापलट की थी साजिश? ट्रंप का क्या रोल?

China General Zhang Youxia Nuclear Plan: दुनिया में इस समय ठंडी हवाओं के बीच एक ऐसी कहानी तैर रही है, जो हुई तो बीजिंग में, लेकिन इसकी हलचल दुनिया भर में मची है. यह कहानी है सियासत की, ताकत, जासूसी, शक और सत्ता के खेल की. इसके केंद्र में हैं चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और चीन की सेना का एक बेहद बड़ा नाम. द वॉल स्ट्रीट जर्नल ने रविवार को रिपोर्ट किया कि चीन के शीर्ष सैन्य जनरल झांग यूशिया पर ‘देश के परमाणु हथियार कार्यक्रम से जुड़ी जानकारी अमेरिका को लीक करने’ का आरोप लगाया गया है. उन्हें उनके पद से हटा दिया गया है.

75 वर्षीय झांग यूशिया चीन की सेंट्रल मिलिट्री कमीशन (CMC) में ऊँचे पद पर हैं. उन्हें लंबे समय से शी जिनपिंग का भरोसेमंद माना जाता रहा है. परमाणु जानकारी लीक करने के अलावा उनके ऊपर और भी कई आरोप लगाए गए हैं. रिपोर्ट्स का दावा है कि बीजिंग ने हाल के दिनों में सेना के भीतर अनुशासन और वफादारी को लेकर सख्ती बढ़ाई है. इसी क्रम में कुछ वरिष्ठ अधिकारियों पर जांच बैठने की बातें सामने आईं.

‘गंभीर अनुशासनहीनता और कानून के उल्लंघन’ का आरोप

झांग के साथ एक और वरिष्ठ सैन्य अधिकारी, लियू झेनली का नाम भी जांच में सामने आया है. लेकिन झांग का मामला ज्यादा सुर्खियों में इसलिए है क्योंकि उन्हें शी जिनपिंग का भरोसेमंद माना जाता था. आधिकारिक रूप से दोनों पर ‘गंभीर अनुशासनहीनता और कानून के उल्लंघन’ के आरोप लगाए गए हैं.

चीन में आम तौर पर इस तरह की भाषा का इस्तेमाल भ्रष्टाचार के मामलों के लिए किया जाता है. ऐसे में उनके खिलाफ कार्रवाई को सिर्फ अनुशासन का मामला नहीं, बल्कि सत्ता संतुलन में बदलाव के संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है. चीन में पिछले तीन वर्षों में इस मुहिम का दायरा और गहराई लगातार बढ़ती गई है.

आम अधिकारी नहीं थे यूशिया

75 साल के झांग सिर्फ कोई आम अफसर नहीं थे. उनके पिता चीन कम्यूनिस्ट पार्टी के संस्थापक सदस्य रहे हैं. यूशिया 1968 में सीधे चीनी सेना (PLA) के उच्च पद पर नियुक्त किए गए थे. वे उस सेंट्रल मिलिट्री कमीशन (CMC) के सदस्य थे, जो चीन की सेना से जुड़े हर बड़े फैसले की कमान संभालता है. यह चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) की सैन्य शाखा है और पूरे देश की रक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी संभालता है. इस ताकतवर संस्था की अगुवाई खुद राष्ट्रपति शी जिनपिंग करते हैं.

कभी सात सदस्यों वाली यह शीर्ष सैन्य कमेटी अब लगातार कार्रवाई के बाद बेहद छोटी रह गई है. ताजा जांच के बाद CMC अपनी अब तक की सबसे कमजोर स्थिति में पहुंच गया है, जहां सात में से सिर्फ दो पद ही भरे हुए हैं, बाकी सभी नेताओं को हटाया जा चुका है. मानो एक-एक कर शतरंज की बिसात से मोहरे हटाए जा रहे हों.

कुछ रिपोर्टों में यह भी कहा गया कि झांग पर रिश्वत लेने, अहम नियुक्तियों में दखल देने और अपने प्रभाव का अलग नेटवर्क खड़ा करने जैसे आरोप लगे हैं. चीन की राजनीति पर नजर रखने वाले जानकार कहते हैं कि इस तरह के आरोप पहले भी कई बड़े अधिकारियों पर लगते रहे हैं, मगर हर बार असली कहानी सिर्फ कागज़ों पर लिखे आरोपों से बड़ी होती है. हालांकि, इस बार बड़े अधिकारी को हटा भी दिया गया है.

क्या ये सिर्फ जासूसी का मामला है?

कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला केवल कथित जानकारी लीक होने तक सीमित नहीं हो सकता. यह चीन की पॉलिटिकल स्ट्रक्चर के भीतर वफादारी की नई लकीरें खींचने की कोशिश भी हो सकती है. राष्ट्रपति शी जिनपिंग पिछले कुछ वर्षों से सेना और पार्टी तंत्र में “सफाई अभियान” चला रहे हैं. आधिकारिक रूप से यह भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग है, लेकिन इसके साथ-साथ यह भी सुनिश्चित किया जा रहा है कि सत्ता के शीर्ष ढांचे में वफादारी पर कोई सवाल न रहे.

झांग जैसे अनुभवी और प्रभावशाली नेता का हटना इस बड़े अभियान का सबसे अहम पड़ाव माना जा रहा है. दूसरी ओर, कुछ अटकलें यह भी जोड़ रही हैं कि अमेरिका लंबे समय से चीन की सैन्य और परमाणु क्षमताओं पर नजर रखे हुए है. ऐसे में अगर चीन के भीतर किसी बड़े सैन्य चेहरे पर शक की सुई घूमती है, तो उसे सीधे वैश्विक ताकतों की खींचतान से जोड़कर देखा जाने लगता है.

असली खेल क्या हो सकता है?

यानी साफ शब्दों में विशेषज्ञों द्वारा ऐसी अटकलें लगाई जा रही हैं, जिनमें शी जिनपिंग के तख्तापलट की कोशिश नजर आ रही थी. इसीलिए चीन ने इतना बड़ा कदम उठाया है. कई विशेषज्ञ मानते हैं कि चीन के भीतर सेना पर नियंत्रण मजबूत करना शी जिनपिंग की प्राथमिकताओं में रहा है. ऐसे में किसी बड़े सैन्य अधिकारी पर जांच बैठना सत्ता संतुलन का हिस्सा भी हो सकता है. यानी जो बाहर से “तख्तापलट की साजिश” जैसा दिखे, वह अंदरूनी राजनीतिक सफाई भी हो सकती है.

ट्रंप का नाम क्यों जुड़ रहा है?

डोनाल्ड ट्रंप अपने कार्यकाल के दौरान चीन के खिलाफ बेहद सख्त रुख के लिए जाने जाते थे. व्यापार युद्ध से लेकर टेक्नोलॉजी प्रतिबंध तक, उन्होंने खुलकर चीन को अमेरिका की सबसे बड़ी चुनौती बताया था. इसी बैकड्रॉप में कुछ रिपोर्ट इस पूरे घटनाक्रम को ट्रंप की पुरानी चीन नीति और अमेरिकी खुफिया गतिविधियों से जोड़कर देख रही हैं.

हाल ही में अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने मंदारिन भाषा में एक वीडियो जारी किया था, जिसमें वह चीन से जानकारी बाहर लाने का तरीका बता रही थी. हालांकि इस तरह के दावे अभी भी अटकलों के दायरे में हैं, लेकिन भू-राजनीति की दुनिया में ऐसी कहानियाँ तेजी से फैलती हैं. खासकर तब, जब बात परमाणु ताकतों और सत्ता के शीर्ष चेहरों की हो.

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