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बहुपक्षवाद पर ट्रंप का बढ़ता हमला

Trump: दुनिया एक बड़े बदलाव से गुजर रही है. वैश्विक चुनौतियों के लिए सामूहिक समाधान के विचार को आपस में टकराते राष्ट्रीय हितों, संस्थानों की थकान और इस सोच से कमजोर किया जा रहा है कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं असल दुनिया के नतीजों से कटी हुई हैं. जिस वैश्वीकरण को कभी दुनिया की व्यवस्था का स्वाभाविक विकास माना जाता था, उसे अब लाभ के बजाय रुकावट माना जा रहा है. बदलाव के इस दौर में डोनाल्ड ट्रंप का दूसरा कार्यकाल न सिर्फ इस बदलाव के साथ चला है, बल्कि यह इसका प्रतिनिधित्व करता है और इसे तेज भी करता है. ट्रंप बहुपक्षवाद पर हो रहे हमले पर सिर्फ प्रतिक्रिया नहीं दे रहे, वह इस पर हमला कर रहे हैं. उनके विचार में, बहुपक्षीय संस्थाएं युद्धों को रोकने, असमानता कम करने, सीमाओं की रक्षा करने, स्वास्थ्य सुरक्षा सुनिश्चित करने और मानवाधिकारों की रक्षा करने में विफल रही हैं. ट्रंप का दावा है कि ये संस्थाएं इसलिए नहीं टिकी हैं, क्योंकि ये ठोस परिणाम देती हैं, ये इसलिए टिकी हैं, क्योंकि ये सेवानिवृत्त राजनेताओं, पेशेवर राजनयिकों और नौकरशाहों को सहारा देती हैं, जो एक संगठन से दूसरे संगठन में लगातार स्थानांतरित होते रहते हैं, ऊंचा वेतन पाते हैं, कर मुक्त आय का आनंद लेते हैं और सम्मेलनों व परामर्शों के लिए दुनियाभर में यात्रा करते हैं. इस व्यवस्था की आलोचना से ट्रंप की राजनीति को बल मिलता है, और उनके दूसरे कार्यकाल में यह आलोचना कभी-कभार की टिप्पणियों के बजाय व्यवस्थित रणनीति बन चुकी है.

गाजा के नवनिर्माण के लिए अमेरिकी नेतृत्व में एक शांति बोर्ड के गठन का प्रस्ताव इसी का सबूत है. इसे एक व्यावहारिक मानवीय कोशिश के तौर पर पेश किया गया है, पर असल में यह संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय संघ और दशकों से इस क्षेत्र को संभालने वाले सभी मौजूदा संघर्ष समाधान फ्रेमवर्क को जानबूझकर नजरअंदाज करना है. यह संकेत देता है कि वाशिंगटन अब बहुपक्षीय मध्यस्थता को महत्व नहीं देता और अपने सीधे नियंत्रण में अस्थायी इंतजाम पसंद करता है. यह रवैया उन यूएन एजेंसियों की वैधता को भी चुनौती देता है, जिन्होंने संघर्ष वाले क्षेत्रों में काम किया है. ट्रंप के इस नजरिये को दूसरे क्षेत्रों में भी लागू किया जा रहा है. विश्व स्वास्थ्य संगठन से ट्रंप का अलग होना इसका उदाहरण है. विश्व स्वास्थ्य संगठन में 8,000 से ज्यादा लोग काम करते हैं और यह दो वर्ष के चक्र में लगभग छह-सात अरब डॉलर के बजट पर काम करता है. इस फंडिंग का बड़ा हिस्सा ऐतिहासिक रूप से अमेरिका से आता रहा है.

ट्रंप ने इसी निर्भरता का लाभ उठाया और प्रश्न किया कि अमेरिकी करदाताओं को एक ऐसी संस्था को फंड क्यों देना चाहिए, जो अमेरिकी मतदाताओं के प्रति जवाबदेह हुए बिना अमेरिकी नीति पर असर डालने वाले दिशानिर्देश, आलोचना और सलाह जारी करती है. यह संयुक्त राष्ट्र की पूरी प्रणाली के लिए एक चेतावनी है कि आर्थिक निर्भरता राजनीतिक कमजोरी पैदा करती है. यूएन की विराट प्रणाली में यही ढांचागत दिक्कतें दिखती हैं. चालीस से अधिक बड़ी एजेंसियां, फंड और प्रोग्राम मिलकर दुनियाभर में लगभग 1.8 लाख लोगों को 60 अरब डॉलर की ऑपरेशनल लागत पर नौकरी देते हैं. ट्रंप की सार्वजनिक धमकियों, राजनयिक उल्लंघनों और खुले अपमान का सामना करते हुए अधिकतर संस्थान सोच-समझकर टिप्पणी करते हैं और सीधे टकराव से बचते हैं.

वैकल्पिक बहुपक्षीय समूह बनाने की कोशिशों से भरोसा नहीं बढ़ा है. शीतयुद्ध का तनाव बढ़ने के साथ ही गुटनिरपेक्ष आंदोलन खत्म हो गया. सार्क क्षेत्रीय दुश्मनी और अविश्वास का शिकार हो गया. वैश्विक वित्त में पश्चिमी दबदबे को चुनौती देने के लिए गठित ब्रिक्स ने ठोस बदलाव के बजाय ज्यादातर दिखावा किया है. इसके सालाना सम्मेलनों में सुर्खियां और घोषणाएं तो होती हैं, पर असली असर सीमित रहता है. जी-7, जी-20, क्वाड और आसियान जैसे दूसरे समूह ज्यादा से ज्यादा राजनयिक दिखावे जैसे लगने लगे हैं. नेता सुंदर जगहों पर उतरते हैं, नौकरशाही की भाषा में लिखे बयान जारी करते हैं और बिना किसी जवाबदेही के चले जाते हैं कि आगे क्या होगा. अधिकारियों के लिए ये मंच करियर में तरक्की और इज्जत देते हैं. नेताओं को ये पहचान और भरोसा देते हैं. असुरक्षा, महंगाई और संघर्ष से जूझ रहे आम नागरिकों के लिए ये सिर्फ प्रस्ताव देते हैं.

ट्रंप का विकल्प बहुत ही घटिया लेन-देन वाला है. उनका मकसद बहुपक्षीय संस्थाओं पर आर्थिक रूप से दबाव डालना, उन्हें राजनीतिक रूप से कमजोर करना और उनकी जगह द्विपक्षीय व्यापार और रक्षा समझौतों को लाना है, जहां अमेरिकी असर हावी हो. यह तरीका तेजी, स्पष्टता और नियंत्रण की इजाजत देता है, लेकिन यह नये तरीकों से शक्ति को भी केंद्रित करता है. चीन और रूस ने सावधानी से इसका जवाब दिया है. चीन वित्त, इंफ्रास्ट्रक्चर और करेंसी डील के जरिये अपना प्रभाव बढ़ा रहा है, जबकि रूस बिना कोई वैकल्पिक व्यवस्था दिये एक बाधक के तौर पर काम कर रहा है. ट्रंप की रणनीति विकासशील देशों को अमेरिका केंद्रित व्यवस्थाओं में धकेलकर उन पर चीन की वित्तीय पकड़ को कम करना चाहती है, भले ही वे व्यवस्थाएं ज्यादा कठिन और कम लचीली हों. असल में, ट्रंपवाद इस विचार को खारिज करता है कि संस्थाएं शांति या स्थिरता लाती हैं. उनके नजरिये से समझौते तभी मायने रखते हैं, जब उन्हें जबरदस्ती की ताकत का समर्थन मिले. यह नजरिया बताता है कि ट्रंप का बहुपक्षवाद पर हमला उनके मुख्य समर्थकों के अलावा दूसरे लोगों को भी क्यों पसंद आता है.

इसके परिणाम हालांकि बहुत गंभीर हैं. केवल ‘ताकत के लेन-देन’ पर चलने वाली दुनिया में अस्थिरता और भेदभाव बढ़ने का खतरा है. इससे छोटे देशों के पास मिलकर मोलभाव करने की ताकत खत्म हो जायेगी. नियम और कानून बहाल होने से पहले ही टूटते चले जायेंगे. किसी भी संकट का समाधान योजनाबद्ध होने के बजाय अचानक और अनिश्चित हो जायेगा. दुनिया के सामने विकल्प अब साफ है : या तो बहुपक्षीय संस्थाओं को स्वयं में व्यापक सुधार करना होगा, या फिर अपनी प्रासंगिकता खोने के लिए तैयार रहना होगा. इन संस्थाओं को अब अपने इतिहास या आदर्शों से नहीं, ठोस नतीजों से अपनी कीमत साबित करनी होगी. यदि ऐसा नहीं हुआ, तो ट्रंप का यह ‘अजीब तरीका’ अपवाद नहीं रहेगा, पूरी दुनिया के लिए एक मॉडल बन जायेगा. अगर बहुपक्षवाद विफल होता है, तो वह इसलिए नहीं होगा कि ट्रंप ने उसे तबाह कर दिया, इसलिए होगा क्योंकि वह उस दुनिया के हिसाब से खुद को ढाल नहीं पाया, जो अब उस पर भरोसा नहीं करती. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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