
बेहद बेहतरीन, मगर अत्यंत अश्लील ‘धुरंधर’।
फिल्म के बीस मिनट बाद का दृष्य देखिये-जब हीरो अपने मुकाम पे यानि लियारी पहुंचता है, वहां के स्थानीय गुण्डों से मुलाकात होती है।
तब का बेहद अश्लील सीन याद करिये जब गुण्डा कहता है ‘अबे ये तो पैट्रोल है बे’। अलावा इसके सारी फिल्म में किसी न किसी बहाने नाॅनवेज गालियों को भरा गया है।
संेसर बोर्ड तो है इस पर नियंत्रण के लिये।
पर हमारे यहां होता ये है कि सेल्सटैक्स विभाग बनाया जाता है व्यापारियों से वसूली चालू हो जाती है। पुलिस तैनात होती है आम आदमी लुटने और बेइज्जत होने लगता है। खाद्य विभाग का काम खाद्य सामग्री को साफ करवाना होता है वो खाने-पीने में लगकर जेबें साफ करने लगता है।
यानि जिस पर भी रोक लगानी हो तो विभाग बनाओ वो रोकड़ा इकट्ठा करने लगता है। संेसर बोर्ड भी कहीं यही तो….. नहीं कर रहा ?
संेसर बोर्ड अपनी बहन-बेटियों के साथ बैठकर ये फिल्म देख ले… तो मानें।
*दमदार होती पोराबाई तो*
*केजरीवाल की तरह छूट जाती*

आम आदमी पार्टी के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल बरी हो गये। केवल वे ही नहीं पूरी टीम बरी हो गयी। किसी को भी दोषी नहीं ठहराया गया।
समझ नहीं आता कि करोड़ों को घपला हुआ, मनीष सिसोदिया द्वारा सैकड़ों सिमकार्ड का प्रयोग किया गया तो ये पैसा कहां गया और सैकड़ों सिम के पीछे क्या रहस्य है ?
पैसे कहां गये, पता नहीं ? यूं ही तो जेल नहीं भेजा गया होगा न।
इतना बेदाग आदमी…. दाल कहीं भी काली नहीं। ये कैसे संभव है। इतने बड़े-बड़े लोगों को अंदर कर दिया सीबीआई ने फोकट में ?
एक कट्टर ईमानदार को जेल में डाल दिया। क्या सिर्फ सनक में ?
कोर्ट किसी को पकड़ने का आदेश तभी देता है जब प्रथम दृष्टया अपराध बनता है। वरना इतने बड़े आदमी को बिना किसी आग के जेल में डलवा दिया… ये कैसे संभव है ?
कहते हैं मोदीजी ने छुड़वाया। इसलिये छुुड़वाया कि अ
रविंद केजरीवाल फिर से दुरूस्त होकर पंजाब में चहलकदमी चालू कर दें और कांग्रेस को कुचकें, जिससे भाजपा को चुनाव जीतने में आसानी हो। बड़े-बड़े पत्रकार और कांगे्रसी नेता इससे इत्तफाक रखते हैं कि ऐसा ही हुआ है। केजरीवाल पावर फुल है।
मगर छत्तीसगढ़ की पोरा बाई बेचारी कमजोर है।
उसे किसी ने नहीं छुड़वाया। उसने सजा पाई। करोड़ों का गबन नहीं किया था। अपने आपको प्रदेश में टाॅप घोषित करवाने के षड्यंत्र में पकड़ी गयी। जिसमें पोराबाई से अधिक पढ़े लिखे, दमदार, चतुर सुजान शामिल थे वे भी धरे गये।
2008 में 12 वीं की छत्त्तीसगढ़ टाॅपर पोराबाई हमेशा सेकॅण्ड या थर्ड क्लास पास हुई और कभी तो फेल भी हुई।
ऐसे में अगर 12 वीं में स्टेट टाॅप करे तो अहसास हो ही जाता है कि पूरी दाल काली है। वो किसी को जीतने में या किसी को हराने में मदद नहीं कर सकती लिहाजा सीखचों के अंदर है।
*खामोश रहना*
*खामोश’ न कहना*
माहौल सही नहीं है भैया। सियासी दांवपेंच में खामोश रहना ही ठीक होता है। खामोश रहिये। वरना सरकार अंदर करवा देती है।
यदि आपने दूसरों को खामोश कहा तो पूर्व भाजपा, पूर्व सपा, वर्तमान टीएमसी और अब फिर से भाजपा में आने को आतुर नेता और दबंग फिल्मी कलाकार शत्रुहन सिन्हा नाराज हो जाएंगे। उन्होंने कोर्ट में याचिका लगाकर ये ऐलान करवा दिया है कि खामोश मत कहिये इस पर सिन्हा साहेब का एकाधिकार है।
कदाचित् दबंगता से खामोश कहने पर रोक होगी आराम से, मिमिया कर खामोश कहना एलाॅउ होगा। यानि आप सामने वाले को चुप कराना चाहेंगे तो धीरे से, आराम से, विनम्रता से खामोश कह सकेंगे, दहाड़कर नहीं, ऐसा होगा। चाहे फिर इससे सामने वाला चुप हो या न हो। डरे या न डरे, सिन्हा साहेब की बला से।
अब यहां एक प्रश्न और उठता है कि जो जन्मजात दबंग हो। जिसका स्टाईल शत्रुहन सिन्हा की स्टाईल से मेल खाता हो, उसके लिये तो मुसीबत हो जाएगी।
किसी समय उसे खामोश बोलना पड़ा और कोर्ट का आदेश उसे पता नहीं हुआ और … उसने दहाड़कर ‘खा… मो… श’ ऐसा कह दिया तो बेचारे पर केस हो जाएगा।
*लखमा गले पड़े तो ठीक*
*गले मिले तो खतरा कांग्रेस को*
गला, गला होता है उसके अपने गुणधर्म होते हैं, अपनी आदत होती है, अपना स्वभाव होता है। पर उसके साथ कुछ और जुड़ जाए तो गुणधर्म में परिवर्तन हो जाता है। परिणाम बदल जाता है।

हमने संसद में देखा है। राहुल गांधी किस तरह मोदीजी के गले पड़े थे। वो बेचारे तो गये थे गले मिलने। पर मिलने के बाद जो उन्होंने होशियारी में आंख मार दी… शायद ज्यातिरादित्य सिंधिया को,
तो यहां परिणाम बदल गया। ये गले मिलने के बलाए गले पड़ना हो गया। भाजपा वालेे भी इसे गले पड़ने का पहाड़ा पढ़ने लगे। देश ने भी भरपूर मजा लिया।
ऐसी घटना, सेम तो नहीं पर गले से संबंधित छत्तीसगढ़ विधानसभा में भी घटी।
जेल से जमानत पर छूटे कवासी लखमा ने विधानसभा में प्रवेश किया तो भाजपा के कई विधायकांे ने सहानुभूति और प्रेम से उन्हें गले लगा लिया। अब ये गले लगना ‘मिलना है कि पड़ना’, सोचने की बात है।
यदि ये गले मिलना था, भाई चारा था, प्रेम था तो कांग्रेस के लिये बड़ी तकलीफ की बात है। लगातार विजयी होता लोकप्रिय विधायक यदि विरोधियों के गले लगे और खासतौर पर विरोधी उसे उत्साह से गले लगाएं तो फिर दाल में काला है।
यदि भाजपाई भी उसे गले पड़ने के रूप में न लेकर गले लगाने के रूप में लेते हैं तो कांग्रेस के पेट में दर्द होना स्वाभाविक है।
विरोधियों का गले लगाकर पटा लेने में माहिर हैं अमित शाह।
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जवाहर नागदेव, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, चिन्तक, विश्लेषक
मोबा. 9522170700







