
कई दिलचस्प राजनैतिक परिवर्तन हो रहे हैं पर अन्य किसी विषय पर बात करने की इच्छा ही नहीं हो रही है। मन दुखी है।
मन दुखी है सरकारियों के पाप से। ये सरकारी लोग कहने को गवर्नमेन्ट सर्वेन्ट यानि सरकारी नौकर हैं लेकिन वास्तव में ये नौकर नहीं जालिम राजा हैं। आततायी हैं।
वे पाप कर रहे हैं और पाप का भुगतान भी वे ही करेंगे, लेकिन फिलहाल उनके पाप से ‘पीड़ितों’ को हो रही पीड़ा से मन कराह रहा है।
सत्या फिल्म के एक लोकप्रिय गाने की लाईन है ‘तू करेगा दूसरा भरेगा कल्लू… मामा… कल्लू मामा’ मगर ये सफेद झूठ है। सत्य तो ये है कि जो जितना करेगा वो उतना भरेगा, इसका कोई अपवाद नहीं।
मै क्षमा चाहता हूं तिवारीजी (पूर्व पंजीयक एवे पूर्व कलेक्टर) और शशिमोहन सिंह (पुलिस अधीक्षक) जैसे कर्मठ और ईमानदार अधिकारियों से जो मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए आउट आॅफ द वे जाकर भी इंसानियत को जिंदा रखे हुए हैं।
बैंक ने खाताधारक को लाने को कहा
मजबूरन बहन का कंकाल ले आया
ओडीसा के दूर-दराज इलाके के एक बेहद गरीब शख्स की बहन इलाज के अभाव में मर गयी। गरीबी में अभावग्रस्त जीवन जीने के लिये मजबूर शख्स की बहन के पति और पुत्र की मृत्यु हो चुकी थी और वो अपने भाई के साथ रहती थी।

भाई को जानकारी थी कि जी तेजी उसकी बहन ने एक बकरी का बच्चा बेचा था जिससे मिले 19 हजार तीन सौ रूप्ये बैंक में जमा कर रखे थे।
बहन के जाने के बाद शख्स बहन के पैसांे का स्वाभाविक वारिस बन गया और वो इसी पैसे को निकलवाने के लिये बैंक गया तथा बैंक से बहन के पैसों की मांग की।
उसे क्या पता था कि सरकारी मंजिले ंइतने दुरूह रास्तों से होकर मिलती हैं कि रास्तें में ही आम इंसान का दम निकल जाता है।
इस शख्स को लगा कि वो जाएगा अपना दुख बताएगा। गरीबी का स्थायी निवास और बहन का अनायास बिछड़ना, पसीज कर बैंक वाले पानी भी पिलाएंगे, खाना पूछेंगे और पैसे निकालकर हाथ में रख देंगे।
उसे क्या पता था कि वहां बैठे सरकारी नुमाईदे कानूनी नियम-कायदे की रस्सी बनाकर कागजी कार्यवाही के पाईप से लटकाकर उसका गला घोट कर उसे भी मार डालेंगे ओर फिर पैसा वही बैंक के पास जमा।
शख्स से बैंक ने कहा कि बहन की मृत्यु का प्रमाण लाए।
बात तो उनकी सही थी…. नियम के अनुसार। मगर….
इस मामले में शख्स बहन की मृत्यु के साथ बैंक वालों की मानवता के मरने का तमाशा भी देख लिया। दुख, निराशा, प्रताड़ना, अपमान, भूख से उसका मन कठोर हो चुका था। आंसुओं का सवाल ही नहीं उठता…. सिर्फ दिल में रोता रहा।
अंततः जब वह बहन के वसीयत के कागजात नहीं दिखा पाया और बार-बार ‘खाताधारक को लाओ या वसीयत के कागज दिखाओ’ का कानून बताया जाने लगा तो उसने एक दिल दहला देने वाला उपाय निकाला।
वह शमशानघाट गया अपनी बहन की कब्र खोदी, उसका कंकाल निकाला और कंधे पर लादकर तीन किलोमीटर चल कर बैंक पहुंचा कि ‘लो साहब, ये है खाता धारक, अब तो हमारीे मेहनत की कमाई पूरे जीवन की समस्त जमापूंजी 19 हजार तीन सौ रूप्ये दे दो।
जवाहर नागदेव, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, चिन्तक, विश्लेषक
मोबा. 9522170700
मानवीय नियम-कायदों पर भारी
सरकारी नियम-कायदे
कलरा मुण्डा की मौत पर भाई जीतू मुण्डा ने मानवता को जगाने के लिये ये हरकत ओडीशा ग्रामीण बैंक शाखा में की तो मल्लीपासी, केंदझुर के इस बैंक में हड़कम्प मच गया।
ऐसे में यकीकन सरकारी नियम-कायदे की दुहाई दी गयी होगी,जो सही भी थी लेकिन क्या मानवता के नियम-कायदे बचाने के लिये सरकारी नियम-कायदों को शिथिल नहीं किया जा सकता था। कोई सक्षम रसूखदार होता तो भी बैंक यही रूख अपनाता ?
क्या आत्मा के सामने ये तर्क स्वीकार किया जाएगा ?
पहले भी होते रहे हैं
ऐसे शर्मसार करने वाले कृत्य
ऐसी दिल को दुखाने वाली खबरें ओडीसा ही नहीं छत्तीसगढ़, झारखण्ड और महाराष्ट्र के दूर-दराज इलाके से हमेशा से आती रही हैं।
मगर इतनी खौफनाक खबर जिसमें सरकारी लोगों का राक्षसी व्यवहार समूचा उमड़ आए और जिसमें उनके सारे शर्म के कपड़े तार-तार होते दिखें पहली बार सुनी।
राक्षस क्यो बन जाता है इंसान
सरकारी बनते ही
हमारे देश में सरकारी आदमी का पैसा भी नहीं कटता और सम्मान भी नहीं घटता। इसलिये वो बेखौफ हो जाता है।
आमतौर पर महिलाएं रोकर गम गलत कर लेती हैं।
मर्द रोता नहीं गाली देता है। छत्तीसगढ़ में इंसान जब बेतहाशा परेशान हो जाता है और अंदर से सुलगने लगता है तो विभाग में जाकर चिल्लाता हैं। गाली नहीं देता क्योंकि गाली देने का अंजाम वो जानता है।
भिण्ड-मुरैना हो तो बात कुछ अलग हो जाती है वहां सीधे घुसेड़ देने या उड़ा देने की परम्परा हैं। एक सीमा तक चिरौरी फिर चोट।
पर यहां हिंसा का रिवाज नहीं है।
साहसी और जुझारू व्यक्ति सारे साहस को समेट कर भी केवल चिल्ला देता है। इस चिल्लाहट का उस बेचारे को नतीजा ये भुगतना पड़ता है कि उसके खिलाफ सरकारी काम में बाधा की रिपोर्ट कर दी जाती है।
एक तो न्याय के लिये पहले से ही भटकने वाला व्यक्ति विचलित होता रहता है उपर से नया कानूनी शिकंजा कस दिया जाता है।
इसके अलावा किसी सरकारी आदमी की कभी तनख्वाह नहीं कटती। देश में कही भी कुछ भी घट रहा हो, इनका पैसा नहीं घटता।

इनकी तनख्वाह तो सरकार से मिलती ही है घूस में भी कमी नहीं आती। तो ये क्यों किसी से डरेंगे ?
पाप का दण्ड शनिदेव अवश्य देते हैं इस बात का अहसास उन्हें बहुत बाद में होता है जब वे कोई सुधार करने की स्थिति में नहीं होते। जीवन के कठिन अंतिम पड़ाव पर।
झरिया या मौत का सामान
रहने को अतिआवश्क, न्यूनतम छत, दो वक्त का अति साधारण खाना और सबसे जरूरी जीने के लिये पानी तक नसीब नहीं इन्हें।
पहाड़ों से गिरने वाला मिट्टी, गंदगी और कीचड़युक्त पानी इनके नसीब में लिखा होता है। सरकारी नुमाईदे यहां खर्च होने वालें करोड़ों रूप्यों में से न्यूनतम काम और अधिकतम कमाई के फार्मूले पर काम करते हैं।
इन अशिक्षित क्षेत्रों में काम करके अधिकारी अपनी संपत्ति में बेहिसाब इजाफा कर लेते हैं और इन मासूम इंसानों को बीमारी और अंततः घुटन वाली मौत परोस देते हैं।
कानूनन सच मैनेजर की बात
मगर मानवता के फार्मूले पर फेल
संतो ंके श्रीमुमख से सुना गया है कि किसी की जान बचाने के लिये बोला गया झूठ क्षम्य है। अगर ऐसा है तो पढ़े-लिखे विद्वान मैनेजर को इतनी समझ नहीं आई कि वो अपना बही-खाता समझ लेता।
मानवता के रजिस्टर में उसका खाता तब उसे लाभ पहुंुचाता जब वो उस गरीब की मदद करता और उसे समझकर उसे समझाता उसका फार्म भरवाता या अन्य विभाग से संपर्क कर येन-केन-प्रकारेण उसका काम करवाता।
चाहे उसके लिये उसे कुछ काम कानूनी लकीर से हटकर भी क्यांे न करना पड़ता। मगर उसने तो एकदम आसान रास्ता खोज लिया। खाताधारक को या वसीयत के दस्तावेज लाओ तभी पैसे मिलेंगे… तो बस वो जीतू मुण्डा बहन कलरा मुण्डा का कंकाल लेकर आ गया बैंक।
इससे पहले कंधे पर, खटिया पर, सायकिल पर, मोटर साइकिल पर बांधकर बीमारों को बांधकर अस्पताल और शवों को शमशान लाने के अमानवीय और दिल दहला देने वाले हादसे कई बार सुने हैं।
लेकिन कंकाल लाने वाला ये पहला मामला है। मन भर आया है, इस घटना के पीड़ित से भी सहानुभूति है और ऐसी व्यवस्थाओं के लिये जवाबदारों के दुखद अंत की आशंका के कारण उनसे भी…..
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जवाहर नागदेव, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, चिन्तक, विश्लेषक





