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बंगाल विजय ने दिया भाजपा को राष्ट्रीय सुरक्षा का एक निणार्यक अवसर क्या, पूर्वोत्तर राज्यों में स्थिरता सहित अवैध घुसपैठ का होगा स्थायी समाधान?

             

पश्चिम बंगाल में राजनीतिक परिवर्तन केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि भारत की पूर्वी सीमाओं से जुड़े उन गंभीर प्रश्नों पर निर्णायक कार्रवाई का ऐतिहासिक अवसर बनकर सामने आया है, जिनसे देश दशकों से जूझ रहा है। बांग्लादेश सीमा के रास्ते होने वाली अवैध घुसपैठ, तस्करी, फर्जी दस्तावेज़ों के नेटवर्क और बदलते जनसंख्या संतुलन ने पूर्वोत्तर भारत से लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा तक गहरी चिंता पैदा की है। आज केंद्र और पूर्वी भारत में राष्ट्रवादी सोच को व्यापक जनसमर्थन प्राप्त है, तब देश की अपेक्षा है कि सीमाओं की सुरक्षा, सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा और राष्ट्रीय स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए कठोर एवं ऐतिहासिक कदम उठाए जाएँ। केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है और पूर्वी भारत तथा पूर्वोत्तर के अनेक राज्यों में भी उसके प्रभाव या सहयोगी दलों की सरकारें मौजूद हैं, तो यह प्रश्न अधिक प्रासंगिक हो गया है कि क्या अब इस चुनौती पर निर्णायक कार्रवाई का समय आ गया है?

नीलेश वर्मा     लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं MO. 9691499540

हाल के राजनीतिक परिवर्तनों और बंगाल में भाजपा की बढ़ती राजनीतिक शक्ति को देश की जनता एक बड़े अवसर के रूप में देख रही है। क्‍योंकि पश्चिम बंगाल भारत-बांग्लादेश सीमा का सबसे संवेदनशील द्वार माना जाता है। यदि केंद्र और राज्य के बीच समन्वय मजबूत होता है, तो सीमा प्रबंधन, अवैध घुसपैठ पर रोक और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े विषयों पर अधिक प्रभावी रणनीति लागू की जा सकती है।

लगभग 4,096 किलोमीटर लंबी भारत-बांग्लादेश सीमा विश्व की सबसे जटिल सीमाओं में से एक पश्चिम बंगाल, असम, त्रिपुरा, मेघालय और मिजोरम से गुजरने वाली यह सीमा अनेक स्थानों पर नदियों, जंगलों और घनी आबादी से होकर निकलती है। यही कारण है कि दशकों से यह क्षेत्र अवैध घुसपैठ और सीमा पार गतिविधियों के लिए चुनौती बना हुआ है। सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले लोगों ने समय-समय पर जनसंख्या परिवर्तन, संसाधनों पर बढ़ते दबाव और स्थानीय पहचान पर प्रभाव को लेकर चिंता जताई है।
इस पूरे विषय का सबसे संवेदनशील पहलू पूर्वोत्तर भारत की सामरिक स्थिति है। भारत का संपूर्ण पूर्वोत्तर क्षेत्र लगभग 22 किलोमीटर चौड़े सिलीगुड़ी कॉरिडोर से जुड़ा है, जिसे सामान्यतः “चिकन नेक” कहा जाता है और यह मुख्य भारत से जुड़ा हुआ है। यह क्षेत्र रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यदि पूर्वोत्तर की स्थिरता और सुरक्षा प्रभावित होती है, तो उसका प्रभाव केवल सीमावर्ती राज्यों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और आंतरिक स्थिरता पर भी पड़ेगा।

असम, त्रिपुरा और मेघालय जैसे राज्यों में अवैध घुसपैठ का मुद्दा लंबे समय से राजनीतिक और सामाजिक बहस का केंद्र रहा है। स्थानीय समुदायों में यह आशंका समय-समय पर सामने आती रही है कि अनियंत्रित प्रवास उनकी सांस्कृतिक पहचान, भूमि, रोजगार और संसाधनों पर दबाव बढ़ा सकता है। यही कारण है कि राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) और नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) जैसे विषय देश की राजनीति के केंद्र रहे हैं। इन अधिनियमों के द्वारा वास्तविक नागरिकों और अवैध प्रवासियों के बीच स्पष्ट अंतर किया जा सकेगा।

वर्तमान परिस्थितियों में भारतीय जनता पार्टी के पास वह राजनीतिक और प्रशासनिक समन्वय दिखाई देता है, जिसकी मांग लंबे समय से की जाती रही है। केंद्र सरकार, सीमा सुरक्षा बल (BSF), राज्य प्रशासन और खुफिया एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित कर सीमा प्रबंधन को अधिक मजबूत बनाया जा सकता है। जिन क्षेत्रों में अब तक फेंसिंग अधूरी है, वहाँ कार्य में तेजी लाई जा सकती है। ड्रोन निगरानी, स्मार्ट फेंसिंग, थर्मल कैमरे, सेंसर आधारित तकनीक और आधुनिक खुफिया तंत्र जैसी व्यवस्थाएँ सीमा सुरक्षा को नई मजबूती दे सकती हैं। इसके साथ ही जनगणना, मतदाता सूची सत्यापन और दस्तावेज़ों की पारदर्शी जाँच भी महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकते हैं। प्रशासन निष्पक्षता और दृढ़ता के साथ कार्य करेगा तो वर्षों से चले आ रहे अनेक विवाद स्वतः ही समाप्त़ हो जाएंगे।

आज भारत उस दौर से गुजर रहा है, जहाँ राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक नियंत्रण और तकनीकी संसाधन तीनों एक साथ उपलब्ध हैं। पश्चिम बंगाल में भाजपा की बढ़ती राजनीतिक शक्ति और पूर्वोत्तर राज्यों में अनुकूल राजनीतिक परिस्थितियाँ इस अवसर को और अधिक महत्वपूर्ण बना देती हैं। अब देश की निगाह इस बात पर टिकी है कि यह अवसर केवल राजनीतिक विमर्श तक सीमित रहेगा या वास्तव में घुसपैठ पर नियंत्रण, पूर्वोत्तर राज्‍यों की स्थिरता और राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में निर्णायक कदम उठाए जाएंगे।

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