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झारखंड में गठबंधन का फॉर्मूला फेल, निकाय चुनाव में बागी बिगाड़ रहे खेल

Jharkhand Civic Polls: झारखंड में नगर निकाय चुनाव भले ही औपचारिक रूप से पार्टी आधार पर नहीं हो रहे हों, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट नजर आ रही है. भाजपा, झामुमो और कांग्रेस समेत तमाम राजनीतिक पार्टियां नगर निगम, नगर परिषद और नगर पंचायतों में अपना राजनीतिक आधार मजबूत करने के लिए खुलकर मैदान में हैं. समर्थित उम्मीदवारों के नाम पर पार्टियों के भीतर ही सियासी गोटी बिछाई जा रही है. इस बार के निकाय चुनाव में पार्टियों के भीतर बगावत ने गठबंधन और रणनीति दोनों को कमजोर कर दिया है.

बागियों ने बिगाड़ा सियासी गणित

चुनावी फसल काटने की होड़ में कई जगहों पर पार्टी के ही नेता या उनके परिवार के सदस्य अधिकृत उम्मीदवारों के खिलाफ मैदान में उतर गए हैं. इससे पार्टी के प्रति निष्ठा पर सवाल खड़े हो गए हैं. कहीं पति पार्टी लाइन पर खड़ा है, तो पत्नी बागी बनकर उसी पार्टी के उम्मीदवार के खिलाफ चुनाव लड़ रही है. इस स्थिति ने पार्टी नेतृत्व की मुश्किलें कई गुना बढ़ा दी हैं.

राज्यभर में गहमा-गहमी, नामांकन तक चला मान-मनौव्वल

रांची, धनबाद, देवघर, मेदिनीनगर समेत कई नगर निकायों में नामांकन के आखिरी दिन तक गहमा-गहमी बनी रही. 4 फरवरी को नामांकन की अंतिम तारीख और 6 फरवरी को नाम वापस लेने की अंतिम तिथि तक रूठने-मनाने का दौर चलता रहा. हालांकि कई जगहों पर पार्टी नेतृत्व बागियों को मनाने में नाकाम रहा.

48 निकायों में सजी चुनावी बिसात

झारखंड में इस बार नौ नगर निगम, 20 नगर परिषद और 19 नगर पंचायतों में चुनावी मुकाबला है. इतने बड़े स्तर पर हो रहे चुनाव में सत्तारूढ़ झामुमो, कांग्रेस और राजद के बीच कोई स्पष्ट गठबंधन फॉर्मूला तय नहीं हो सका है. इसका सीधा फायदा बागी उम्मीदवारों को मिलता दिख रहा है.

धनबाद में भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती

धनबाद नगर निगम चुनाव भाजपा के लिए सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण बन गया है. पार्टी ने मेयर पद के लिए संजीव कुमार को समर्थन दिया है, लेकिन भाजपा के कई नेता बागी होकर मैदान में हैं. झरिया के पूर्व विधायक संजीव सिंह भी चुनाव लड़ रहे हैं. इसके अलावा मुकेश पांडेय और भृगुनाथ भगत ने भी नामांकन वापस नहीं लिया. भाजपा किसी भी बागी को मनाने में सफल नहीं हो सकी. वहीं झामुमो की प्रत्याशी डॉ नीलम मिश्रा ने नामांकन वापस ले लिया है. अब पूर्व मेयर चंद्रशेखर अग्रवाल झामुमो समर्थित उम्मीदवार होंगे.

देवघर में भाजपा और झामुमो दोनों में अंदरूनी कलह

देवघर नगर निगम में भाजपा ने रीता चौरसिया को समर्थित प्रत्याशी बनाया है. पार्टी ने यहां काफी मंथन किया, लेकिन बाबा बनलासे और उमाशंकर सिंह बागी बनकर मैदान में डटे हुए हैं. इससे भाजपा का वोट बैंक बंटने की आशंका है. उधर झामुमो में भी फूट नजर आ रही है. रवि राउत पार्टी समर्थित उम्मीदवार हैं, जबकि झामुमो नेता सूरज झा भी चुनावी मैदान में उतर गए हैं. कांग्रेस ने यहां किसी भी उम्मीदवार को समर्थन नहीं दिया है. कांग्रेस नगर अध्यक्ष रवि केसरी भी मेयर पद के लिए किस्मत आजमा रहे हैं.

मेदिनीनगर में बहुकोणीय मुकाबला

मेदिनीनगर में चुनावी घमासान अपने चरम पर है. यहां झामुमो ने पूर्वम सिंह, भाजपा ने अरुणा शंकर, कांग्रेस ने नम्रता त्रिपाठी, जेएलकेएम ने आइसा सिंह और लोजपा ने ज्योति गुप्ता को समर्थन दिया है. भाजपा के भीतर भी असंतोष साफ दिख रहा है और पार्टी को कार्यकर्ताओं को एकजुट रखने में काफी मशक्कत करनी पड़ रही है.

रांची में त्रिकोणीय मुकाबला

राजधानी रांची में नगर निगम चुनाव सबसे ज्यादा रोचक हो गया है. कांग्रेस और झामुमो के बीच सहमति नहीं बन पाई. कांग्रेस ने पूर्व मेयर रमा खलखो को उम्मीदवार बनाया है, जबकि झामुमो ने सुजित विजय आनंद कजूर को समर्थन दिया है. भाजपा ने रोशनी खलखो को पार्टी समर्थित उम्मीदवार घोषित किया है.
भाजपा ने रोशनी खलखो के खिलाफ नामांकन करने वाले संजय टोपो, राजेंद्र मुंडा और सुनील कच्छप को मना लिया, लेकिन सुजाता कच्छप नहीं मानीं. झामुमो ने भी पार्टी प्रत्याशी के पक्ष में करीना तिर्की, बिरू तिर्की और रामशरण तिर्की जैसे नेताओं को मनाने में सफलता पाई है.

बागी बदल सकते हैं चुनावी समीकरण

निकाय चुनाव में बागियों की मजबूत मौजूदगी ने यह साफ कर दिया है कि झारखंड में गठबंधन और पार्टी अनुशासन दोनों कमजोर पड़ते नजर आ रहे हैं. वोटों के बंटवारे से कहीं न कहीं अप्रत्याशित नतीजे सामने आ सकते हैं. यही वजह है कि इस बार के निकाय चुनाव को सभी दल बेहद अहम मान रहे हैं और अंतिम समय तक रणनीति बदलने से भी पीछे नहीं हट रहे हैं.

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