Sunday, March 3

बात बेबाक – कुर्सीनामा भाग -10

चन्द्र शेखर शर्मा(पत्रकार)9425522015
कवर्धा – चुनाव नजदीक आते ही लोगो पर नेतागिरी का भुत सर चढ़ कर बोलने लगा है । प्रदेश की दोनों प्रमुख पार्टियों ने अपने अपने उम्मीदवारों के नाम न बता दावेदारों के साथ साथ जनता जनार्दन की धड़कने तेज कर दी है । सट्टे का बाजार भी सरगर्म हो चला है की विजय का टिकट कटेगा कि बचेगा भावना की जनसेवा टिकट में बदलेगी की जातिवाद के भंवर में बह जाएगी । भारी विरोध के बावजूद ममता की कुर्सी बचेगी कि हो जाएगी घर वापसी अर्थात बेमेतरा रवानगी । अकबर के खिलाफ कौन ताल ठोंकेगा जैसे सट्टे के दांव लगाये जा रहे है। टिकट की सट्टेबाजी के बीच टिकट की दौड़ में शामिल दावेदार एक दुसरे का पत्ता काटने कुटिल चाले चलने लगे है । कुटिल चालो का खेल कांग्रेस भाजपा दोनो में नज़र आता है अकबर के खिलाफ पार्टी में कोई नही दिखता अपितु विपक्ष भी डॉ रमण का नाम आगे ला होहिये वही जो रमन रची राखा का राग अलाप रहा है । कवर्धा से जिलाध्यक्ष के रूप में भाजपा व कांग्रेस से साहू समाज को प्रतिनिधित्व दिए जाने से साहू समाज की उम्मीदवारी लगभग खत्म मानी जा रही है । जाति वाद के सहारे टिकट के लिए पटेल और कुर्मी समाज से पंडरिया में ताल ठोकी जा रही है । दावेदारी तो ऐसे ऐसे ऐसे नेता करने लगे है किसी पर कलफ़दार कुर्ते पर पार्टी से बगावत के दाग है तो किसी पर दरबार मे हाजरी भर भर आदिवासी जमीन खरीदने और ठेके हासिल करने के आरोप , किसी को पैसों का लालच ऐसा कि चंद रुपयों के लिए रोजगार गारंटी में भी कमाई का लालच नही त्याग पा रहे ।
आजकल चुनाव अभियान में जातिवाद को एक साधन के रूप में प्रयोग किया जाता है। प्रत्याशी जिस निर्वाचन क्षेत्र से टिकट मांगता या चुनाव लड़ता है उस क्षेत्र में राजनीति में जातिवाद की भावना को अक्सर ही उकसाया जाता है जिस से संबंधित प्रत्याशी की जाति के मतदाताओं का पूर्ण समर्थन उसे प्राप्त हो सके हांलाकि जातिगत समीकरण को गिना भले ही टिकट की दावेदारी की जाती है किंतु वोट के समय सारे दावे फेल नज़र आते है ।
जिसे ऐसे समझा जा सकता है कोई समाज लगभग 40 हज़ार वोट होने का दावा करता है । जिले में अमूनन 70 प्रतिशत ही वोटिंग होती है अर्थात उस समाज के 28 हज़ार ही वोट डाले गए । समाज के कथित नेताओ के दावों को माने तो 60 – 70 प्रतिशत सामाजिक वोट एक तरफ गिर पाएंगे ऐसे में किसी भी पार्टी को लगभग 15 से 20 हज़ार ही वोट मिलते है । फिर सामाजिक नेता कैसे और किस मुंह से 40 हजार की गिनती गिनाते है क्या उन समाज के जो नेता दूसरे पार्टियों में है वो अपनी पार्टी के प्रति गद्दार है यदि गद्दार नही तो फिर 40 हजार का आंकड़ा का दंम्भ क्यो और कैसे ।
जाति की संख्या के दम पर राजनीती की बिसात बिछाने वाले नेताओ की हवा पिछले चुनाव में निकल चुकी है । जातिवाद की राजनीति में उलझी राजनैतिक पार्टियां साहू ,कुरमी और पटेल के गणित में उलझ कर रह गई है जबकि जिले में आदिवासी एवं अनुसूचित जाती के लोगो की बहुलता है ऐसे में इनकी संख्या बल को भी दरकिनार नहीं किया जा सकता ।
और अंत मे :-
समझना मुश्किल है लेकिन ,बहुत आसान सी नीति हूं , हां मैं राजनीति हूं ।
चंद लोगो की वजह से , हर वक्त जहर पीती हूं , हां मैं राजनीति हूं ।

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