
hanakya Niti: आचार्य चाणक्य ने जीवन के हर पहलू – दान, समय, बुद्धि और व्यवहार पर गहरी सीख दी है. चाणक्य नीति के श्लोक के अनुसार कोई भी कार्य तभी सार्थक होता है, जब वह सही व्यक्ति, सही स्थान और सही समय पर किया जाए.
ऐसा ही एक महत्वपूर्ण श्लोक बताता है कि कुछ अच्छे माने जाने वाले काम भी गलत समय या गलत स्थान पर किए जाएं, तो उनका कोई मूल्य नहीं रहता.
Chanakya Niti Shlok: चाणक्य नीति श्लोक
वृथा वृष्टिः समुद्रेषु वृथा तृप्तेषु भोजनम्।
वृथा दानं धनाढ्येषु वृथा दीपो दिवापि च॥कौन सा काम कब व्यर्थ हो जाता है
Shlok का अर्थ:
इस श्लोक में आचार्य चाणक्य कहते हैं –
समुद्र में वर्षा करना व्यर्थ है, क्योंकि वह पहले से ही जल से भरा है.
जिसका पेट भरा हो, उसे भोजन कराना व्यर्थ है.
धनी व्यक्ति को दान देना व्यर्थ है.
और दिन के समय दीपक जलाना भी निरर्थक है.
अर्थात किसी भी कार्य का फल तभी मिलता है, जब उसकी आवश्यकता हो.
Chanakya Niti के अनुसार कौन-सी चीज़ कब अपना महत्व खो देती है?
- वर्षा – जब स्थान गलत हो
समुद्र में बारिश का कोई लाभ नहीं, लेकिन वही वर्षा सूखी धरती के लिए जीवनदायी बन जाती है. - भोजन – जब व्यक्ति तृप्त हो
भूखे को दिया गया अन्न पुण्य है, पर भरे पेट वाले को भोजन कराना केवल दिखावा बन जाता है. - दान – जब पात्र सही न हो
धनवान को दान देने से समाज का संतुलन नहीं बनता, जबकि जरूरतमंद को दिया गया दान जीवन बदल सकता है. - दीपक – जब समय अनुचित हो
रात में दीपक अंधकार मिटाता है, लेकिन दिन में उसका कोई उपयोग नहीं.
Chanakya Niti के इस श्लोक से हमें यह सीख मिलती है कि अच्छा काम करना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि उसे सही समय, सही स्थान और सही व्यक्ति के लिए करना आवश्यक है. जो व्यक्ति इस नीति को समझ लेता है, वह जीवन में कभी अपने प्रयास व्यर्थ नहीं जाने देता.








