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बेंगलुरु में आयोजित CPA सम्मेलन में शामिल हुए डॉ. रमन, अपने संबोधन में कहा – संवाद लोकतंत्र की आत्मा, जन विश्वास की नींव

 

0 लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की अध्यक्षता में बेंगलुरु में हुआ 11वां CPA राष्ट्रीय सम्मेलन, छत्तीसगढ़ विस अध्यक्ष ने कहा, “पारदर्शिता और जवाबदेही ही लोकतंत्र की ताकत

*रायपुर, 12 सितम्बर 2025:* बेंगलुरु स्थित विधानसौध में आयोजित राष्ट्रमंडल संसदीय संघ (CPA) भारत क्षेत्र के 11वें राष्ट्रीय सम्मेलन में पूर्व मुख्यमंत्री एवं छत्तीसगढ़ विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह ने शामिल होकर अपने विषय – “विधायी संस्थाओं में संवाद और चर्चा: जन विश्वास का आधार, जन आकांक्षाओं की पूर्ति का माध्यम” पर अपना संबोधन दिया।

अपने संबोधन में डॉ. रमन सिंह ने कहा कि विधायी संस्थाएं केवल कानून बनाने वाली मशीनें नहीं हैं, बल्कि वे लोकतंत्र की आत्मा हैं, जहाँ जनता की आकांक्षाओं को अभिव्यक्ति मिलती है। संवाद और चर्चा ही वह शक्ति है, जो लोकतंत्र को जीवंत और जनोन्मुख बनाए रखती है।

उन्होंने कहा कि “लोकतंत्र का मूलाधार संवाद और विमर्श है। संसद और विधानसभाएँ तभी फलती-फूलती हैं, जब उनमें खुले मन से सार्थक और रचनात्मक चर्चा हो। यही प्रक्रिया जनता के विश्वास को मजबूत करती है।”

अपने वक्तव्य को और स्पष्ट करते हुए डॉ. सिंह ने युवाल नोआ हरारी की पुस्तक सेपिएन्स का उल्लेख किया और कहा कि “मानव सभ्यता के विकास में संवाद को सबसे अहम पड़ाव माना गया है। संवाद ही वह साधन है जिसने इंसान को जंगलों से निकालकर आधुनिक युग की ओर अग्रसर किया। आज भी समाज और लोकतंत्र का आधार संवाद ही है।”
उन्होंने यह भी कहा कि पारदर्शिता और जवाबदेही संवाद का सबसे बड़ा प्रतीक है। स्वस्थ संवाद यह सुनिश्चित करता है कि सरकार की नीतियां जनता के सामने खुली हों और विपक्ष को भी सरकार की नीतियों की समीक्षा का पर्याप्त अवसर मिले। इससे जनता का विश्वास सुदृढ़ होता है।

डॉ. सिंह ने नीति-निर्माण में संवाद की महत्ता बताते हुए कहा कि जब किसी विधेयक पर गहन चर्चा होती है, तो उसके सभी पहलुओं लाभ, कमियाँ और दीर्घकालिक प्रभाव पर विचार किया जाता है। इस प्रक्रिया से जो कानून निकलता है, वह अधिक मजबूत और संतुलित होता है।

डॉ. सिंह ने आगे कहा कि तकनीकी और जटिल विषयों जैसे साइबर सुरक्षा, ऊर्जा संकट, पर्यावरण और स्वास्थ्य पर गहन विमर्श की कमी है। “यदि विशेषज्ञों की भागीदारी और शोध-आधारित दृष्टिकोण को अपनाया जाए, तो लोकतंत्र और सशक्त होगा।”

डॉ. सिंह ने विशेष रूप से विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि अध्यक्ष लोकतंत्र के प्रहरी होते हैं। “अध्यक्ष की निष्पक्षता, अनुशासन बनाए रखने की क्षमता और सभी दलों को समान अवसर देने का दृष्टिकोण ही सदन को सार्थक संवाद का मंच बनाता है। समितियों को सक्रिय करना और तकनीकी विषयों पर चर्चा को प्रोत्साहित करना भी अध्यक्ष की जिम्मेदारी है।”

अंत में उन्होंने कहा कि जनता अपने प्रतिनिधियों को इसी विश्वास के साथ चुनती है कि वे उनकी आकांक्षाओं को सदन में रखें। इसलिए संवाद ही वह सेतु है, जो मतदाता और नीति-निर्माता के बीच संबंध बनाए रखता है और लोकतंत्र की विश्वसनीयता को सुदृढ़ करता है।

इस सम्मेलन की अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने की जिसमें भारत के विभिन्न राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के विधानमंडलों के सभापति, अध्यक्ष, पीठासीन अधिकारी एवं सचिवगणों ने भाग लिया।

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