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हाथी उड़ी, समोसे में आलू-बिहार में लालू, तेजप्रताप भाजपा में जाएंगे-परिवार को बचाएंगे वरिष्ठ पत्रकार जवाहर नागदेव की खरी… खरी….

 
हाथी उड़ीं। टूंटूं टूंटूं पंख फैलाए पर सफल नहीं हुई। उसने 6 और 12 नवंबर को उड़ने की पूरी तैयारी कर ली थी जताती ऐसा है कि वह उंचे आकाश में उड़ती मचलती दिखेगी और बिहार के लोगों को भी जन्नत की सैर कराएगी। पर हुआ क्या वह थोड़ा सा ंउड़ पाई पर एक सीमा के उपर नहीं। 14 तारीख को धड़ाम, धड़ाम। पटकनी पे पटकनी और पंख फड़फड़ाकर गिर पड़ी।


हाथी का दोस्त घोड़ा। शुरू से धीरे-धीरे दौड़ा। केवल बाहें ताव से उठाता था,बार-बार विदेश भाग जाता था। काम मिला था सुरंग बनाने का। जड़ें खोदने का। भाजपा की जड़ें, नीतिश की जड़ें और एनडीए की जड़ें काटने का।
पर अफसोस अपनी नादानी की जड़े नहीं खोद पाया बल्कि अपनी परविार की ही यानि कांग्रेस और इण्डिया गठबंधन की ही खोदने लगा, लगातार खोद रहा है।


कोई गलती नहीं है भाई, लिखना आता है, हिन्दी आती है। हाथी….. ‘अपनी हाथी’ सचमुच में उड़ती है। क्योंकि हाथी एक तितली का नाम है।
दरअसल तितली के माता-पिता ने तितली बेटी का नाम लाड़वश हाथी रख दिया। तो बस… अपनी हाथी उड़ती है। ये बात अलग है कि हाथी बोलने से हाथी जैसी ताकत नहीं आ जाती कि शेर को ललकारने लगे।
तेजस्वी बोल देने से कोई मोदी को चैलेंज कर सके, धर्म को चैलेंज कर सके या न्याय को चैलेंज कर सके ऐसा तेज थोड़ी पा लेगा। इसलिये ये हाथी हुआ धड़ाम।
उधर अपने चूहे भैया जिनका काम ही है कुतरना, खोदना। ये जड़ें खोदकर सामने वाले को गिराना चाहते थे। इनका नाम रखा था मां-बाप ने घोड़ा। वे समझ नहीं पाए कि चूहा खानदान में जन्म लेकर घोड़ा नाम रख लेने से घोडे की तरह सरपट दौड़ नहीं न सकते न।
दोनों दोस्तों हाथी और घोड़े ने बड़ा एंगलबाजी की। बड़ी नौटंकी दिखाई। उड़कर, दौड़कर दिखाया। आश्वासन भी दिया कि आपको भी चुनाव जीतने के बाद ऐसे ही उड़ाएंगे, भगाएंगे… पर ये क्या हुआ… हाथी और घोड़े की असलियत सामने आ गयी… । जनता ने इन्हें ही भगा दिया।

चुनाव हारे हैं
वर्चस्व नहीं

 

बिहार की राजनीति में सारे नेताओं के फार्मूले फेल होते चले गये। खासतौर पर लालू के लाल के चेहरे की लाली गायब हो गयी। ये बात किसी भी कोण से असहज नहीं है मजेदार भी है। अपनी पीठ बचाने के लिये ये उलट-पलट काॅमन है।


कहा जाता था कि ‘समोसे मे आलू, और बिहार में लालू’ हमेशा रहेंगे। लेकिन भाजपा और नीतिश कुमार ने आकर सारा खेल बिगाड़ दिया।
वैसे लालूपुत्र तेजस्वी के बड़े भाई तेजप्रताप का दांव लालू ने ही खेला हो तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। चर्चा है कि तेजप्रताप स्टाईल से धीमे-धीमे भाजपा की ओर सरक रहे हैं।
पहले कूद के अपने परिवार के खिलाफ खड़े हो गये और सरेआम अदावत की घोषणा कर दी। दुश्मन का दुश्मना अपना दोस्त होता है तो इसी फार्मूले के तहत् एनडीए यानि भाजपा गठबंधन तेजप्रताप से अंखियां लड़ा सकता है। प्रताप ने तो संकेत दे ही दिये हैं।


अब तो वो खुलेआम बोलते फिर रहे हैं कि ‘जो बेरोजगारी मिटाएगा हम उसके साथ रहेंगे’।
यानि ये गुंजाईश है कि कुछ ही दिनों में बोलने लगें कि ‘देखो मोदीजी कितना अच्छा काम कर रहे हैं। देश को कितना आगे ले जा रहे हैं। कितना बेरोजगारी हटाया, कितना ग्रोथ किया बिहार का…. आदि…. आदि…. और बस कूद पड़ेंगे भाजपा के तालाब में। और भाजपा का तालाब है ही वाशिंग मशीन का रूप। जैसा कि विपक्ष बोलता है।
करोड़ों के घोटालों से लथपथ, इसका कोई प्रमाण हमारे पास नहीं है, तेजप्रताप भाजपा में आते ही बिहार का लीडर बन जाएंगे और बस सारे परिवार के लिये सुरक्षा चक्र का काम करेंगे। विपक्ष बार-बार इसी चालाकी भरे तौर-तरीके के लिये भाजपा को कोसता है। महराष्ट्र, आसाम का उदाहरण देता रहता है। जहां अरबों के आरोपियों को भाजपा ने नेता बना रखा है। बड़े-बड़े पदों पर सुशोभित कर रखा है।
इतिहास में भी ऐसे कई उदाहरण देखने को मिल जाते हैं जिसमें सबसे चर्चित परिवार सिंधिया परिवार रहा। जिसका कांग्रेस और भाजपा दोनों जगह वर्चस्व बना रहा।
हंसिये मत, असंभव भी मत जानिये। तेजप्रताप अपने प्रताप से भाजपा के नेता बनकर लालू का वोट बैंक साधकर रखेंगे और भाजपा की गोद में सुरक्षित हो जाएंगे। क्यांेकि
एवरीथिंग इस पाॅसिबिल इन पाॅलिटिक्स। दैटस् इट।

जवाहर नागदेव, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, चिन्तक, विश्लेषक

मोबा. 9522170700‘

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