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जिले में जैविक खेती की ओर किसानों का बढ़ा रूझान

कृषक   मनभौतिन बाई निषाद एवं   माखन निषाद को प्राकृतिक खेती से मिला फायदा ही फायदा
– राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के तहत राजनांदगांव विकासखंड के 150 हेक्टेयर क्षेत्र में कलस्टर तैयार कर किसानों को जैविक खेती करने के लिए किया गया प्रोत्साहित
– जीवामृत, बीजामृत, घनजीवामृत, दशपर्णी अर्क सहित अन्य प्राकृतिक उत्पाद बनाने के लिए दिया गया प्रशिक्षण
जिले में जैविक खेती की ओर किसानों का रूझान बढ़ रहा है। राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन से किसानों को प्रोत्साहन मिला है। राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के तहत वर्ष 2025 में राजनांदगांव विकासखंड के 150 हेक्टेयर क्षेत्र में कलस्टर तैयार कर कृषकों को रसायन मुक्त खेती करने की दिशा में प्रेरित हुए। मिशन के तहत ग्राम मोखला के प्रगति महिला स्वसहायता समूह के कृषकों को जीवामृत, बीजामृत, घनजीवामृत, दशपर्णी अर्क सहित अन्य प्राकृतिक उत्पाद बनाने एवं फसलों की अवस्था अनुसार उपयोग करने के संबंध में प्रशिक्षण दिया गया। प्रशिक्षण कार्यक्रम के तहत ग्राम मोखला की 68 वर्षीय कृषक   मनभौतिन बाई निषाद एवं उनके 72 वर्षीय पति कृषक  माखन निषाद ने प्राकृतिक खेती के लिए प्रशिक्षण प्राप्त किया।
राजनांदगांव विकासखंड के ग्राम मोखला में 68 वर्षीय कृषक   मनभौतिन बाई निषाद एवं उनके 72 वर्षीय पति कृषक   माखन निषाद शिवनाथ नदी तट पर निवास करते हैं। उनके पास स्वयं की 1.17 एकड़ कृषि भूमि एवं 1.17 एकड़ कृषि भूमि लीज पर लेकर कुल 2.34 एकड़ कृषि भूमि पर धान एवं उद्यानिकी खेती करते थे। जिससे उन्हें 50 से 60 हजार रूपए सालाना आय हो जाती थी। कृषक   मनभौतिन बाई निषाद ने बताया कि उद्यानिकी खेती में गैरजरूरी रसायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों के लगातार छिड़काव कर रहे थे। इन फसलों के सेवन से लोग बीमार पड़ते थे। यह देखकर मन में रसायन मुक्त खेती करने का विचार आया और प्राकृतिक कृषि पद्धति से खेती कार्य की शुरूआत की। उन्होंने बताया कि रसायनिक पद्धति से खेती को छोड़कर प्राकृतिक खेती करने में शुरूआत में चुनौतियों एवं समस्याओं का सामना करना पड़ा। प्राकृतिक खेती के लिए प्राकृतिक उत्पाद तैयार करने के संबंध में जानकारी का अभाव था। इसके साथ ही प्राकृतिक खेती से उत्पादन कम होना एवं कीट-बीमारियों की समस्या से फसल चौपट होने का डर था।
कृषक  मनभौतिन बाई निषाद ने बताया कि प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद रासायनिक खादों और कीटनाशकों पर निर्भरता खत्म हो गई। जिससे उत्पादन लागत काफी कम हो गई। रासायनिक खेती करने से प्रति एकड़ 20 से 22 हजार रूपए खर्च होता था, जबकि प्राकृतिक उत्पाद जीवामृत, घनजीवामृत, नीमास्त्र के निर्माण में लागत के नाम पर बेसन, गुड़ तथा मट्ठा, अन्य केवल घरेलू सामग्री का खर्च होता है। अन्य सामग्री देशी गाय का गोबर व गौमूत्र, मिट्टी, विभिन्न प्रकार के पत्ते आसानी से गांव में उपलब्ध हो जाते हैं। उन्होंने बताया कि प्राकृतिक खेती से मृदा पर प्राकृतिक उत्पादों के प्रभाव से खेती में लाभदायक केचुओं एवं अन्य सूक्ष्म जीवों की वृद्धि हुई है। प्रकृति प्रदत्त सामग्री का उपयोग करने से मिट्टी के साथ-साथ फसल की गुणवत्ता बेहतर हुई और उत्पाद जहर मुक्त होने के कारण बाजार में अच्छी कीमत मिल रही है। उन्होंने बताया कि व्यापारियों ने सीधे खेत से उत्पाद खरीदना शुरू कर दिया है। जिससे अच्छा लाभ मिला और आर्थिक रूप से मजबूत हो रहे हंै। जिसके कारण वर्ष 2025-26 रबी में सब्जी के साथ तिवड़ा, मसूर एवं सरसों फसल की खेती प्राकृतिक पद्धति से कर रहे है। कृषक श्रीमती मनभौतिन बाई निषाद जिले के किसानों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत है। उन्हें विभिन्न जिला स्तरीय कार्यक्रम के माध्यम से सम्मानित किया गया।

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