
अक्षयकुमार की एक बढ़िया फिल्म आई थी जिसमें उन्हें ठेकेदार दिखाया गया था और किस तरह ठेकेदार सीमेन्ट की जगह रेत डालकर कमाई करते हैं ये घालमेल दर्शाया गया था। इसमें एक पुल गिर जाने से पुल से गुजर रही बस के यात्री मर गये या घायल हो गये।
एक पत्रकार का परिवार भी इस हादसे में मर गया इसलिये वो इनके पीछे पड़ गया और पोल खोलने की कोशिश करने लगा। ठेकेदार और अधिकारी प्राकृतिक आपदा साबित नहीं कर पा रहे थे तो इसे एक नौकर द्वारा बम लगाकर उड़ा देने का षड्यंत्र रच डाला। और इसमे वे सफल भी हो गया।
जहिर है इसमें शासन-प्रशासन का पूरा सहयोग उन्हें प्राप्त हुआ।
नारायणपुर-कोण्डागांव निर्माणाधीन पुल बेईमानों को बचाने झूठी रिपोर्ट की आशंका
नारायणपुर-कोण्डागांव एनएच 130 पर जांेदरापदर कुम्हारपारा में निर्माणाधीन पुल ढह गया। प्रत्यक्षदर्शियो के अनुसार न बाढ़ थी, न भारी जलप्रवाह जबकि पीडब्ल्यूडी का राष्ट्रीय राजमार्ग संभाग मामले में बेईमान लोगों को क्लीन चिट देने का प्रयास कर रहा है।
खबर है कि नेशनल हाईवे के ईई ने सेतु संभाग के अधिकारियो और ठेकेदारों को बचाने के लिये पुल ढहने का कारण प्राकृतिक आपदा को बताया है। हादसे में दो लोगों के घायल होने को भी विभाग नकार रहा है।
कहीं ऐसा तो नहीं कि माल कमाने के चक्कर में फंस गये और माल बांटकर छूट गये। यूं कहा जाता है कि रिश्वत लेते पकड़े गये और रिश्वत देकर छूट गये।
एक वरिष्ठ पत्रकार ने एक लेख में बढ़िया विशेषण का प्रयोग किया फिट फाॅर फोटो। बात सरकारी काम के संदर्भ में हो रही थी। ठेकेदार और अधिकारी काम को फिट बताते हैं फोटो खींचकर, फोटो में दिखा के बिल पास करवा लिया जाता है।
जिनकी आंखों पर रिश्वत की पट्टी बंधी होती है उन्हें साक्षात जाकर प्रत्यक्ष देखने की जरूरत महसूस नहीं होती। पुराने तो टूटते ही हैं नये बन रहे भी नहीं बच रहे पहले इस बात पर दुख होता था कि पुराने पुल टूट जाया करते थे। जबकि लोग कलकत्ता के हावड़ा ब्रिज का उदाहरण दिया करते थे कि देखो वो अंग्रेजों के जमाने का पुल सौ साल से उपर हो गया है तब भी चल रहा है और अपने यहां के पुल दो-चार सालों में ही टें बोल जाते हैं।
अफसोस की बात है कि अब पुल बन ही नहीं पा रहे और धाराशायी होने लगे हैं। देश में चारों ओर से निर्माणाधीन पुलों के टूटने की खबरें आ रही हैं।
आश्चर्य है कि केन्द्र सरकार स्वच्छ शासन और भाजपा की राज्य सरकारें भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टाॅलरेंस की नीति का ढिंढोरा पीटती हैं फिर भी कमीशनखोरी रूकती नहीं ?
वो मंत्री अच्छा था
पांच परसेन्ट दे दो
फिर कुछ भी करो
रायपुर में एक ठेकेदार ने इस विषय में अपना दुखड़ा सुनाया कि हम लोग चाहकर भी इससे अच्छा काम नहीं कर पाते। हमारा लगभग आधा पैसा तो कमीशन बांटने में निकल जाता है। बाकी बचे पैसे में खुद थोड़ा कमाकर काम करना होता है बताईये कैसे होगा।
ठेकेदार आगे दो मंत्रियों की तुलना करते हुए कहता है कि फलां मंत्री अच्छा था। आप पांच प्रतिशत दे दो फिर कुछ भी करो। ये तो पांच प्रतिशत भी ले लेता है और आंख भी दिखाता है। ब्लैक लिस्ट करने की धमकी भी देता है और जनता के बीच ठेकेदारों को बेईमान भी बताता है।
क्या करंे ठेकेदार… ?
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जवाहर नागदेव, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, चिन्तक, विश्लेषक मोबा. 9522170700
‘बिना छेड़छाड़ के लेख का प्रकाशन किया जा सकता है’









