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टीपू सुल्तान भगवान राम के नाम की अंगूठी पहनते थे: महाराष्ट्र कांग्रेस नेता का बयान; जानें क्या है इसकी सच्चाई?

Tipu Sultan Lord Ram Engraved Ring: टीपू सुल्तान भारतीय इतिहास में कुछ लोगों के लिए नायक, तो कुछ लोगों के लिए खलनायक हैं. भारत के गुलामी के कालखंड में उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध किया. वहीं इसी काल में दक्षिण भारत में टीपू द्वारा कुछ अभियानों में हिंदुओं के धर्मपरिवर्तन और हत्याओं का भी इतिहास है. ऐसे में इस विवादित किरदार को लेकर भारत की आज की राजनीति भी गहरे प्रभावित है. ताजा विवाद का मामला महाराष्ट्र में भाजपा और कांग्रेस के बीच है. शुक्रवार, 13 फरवरी  को महाराष्ट्र कांग्रेस के अध्यक्ष ने छत्रपति शिवाजी महाराज की तुलना टीपू सुल्तान के साथ कर दी, जिस पर बवाल मच गया. पहले तो पुणे में इस टिप्पणी पर एफआईआर हुई, फिर रविवार को दोनों पार्टियों में पत्थरबाजी हुई, जिसमें 9 लोग घायल हो गए. इस हिंसा के बाद कांग्रेस के एक नेता ने बयान दिया, ‘टीपू सुल्तान भगवान राम का नाम अंकित अंगूठी पहनते थे.’ तो आखिर क्या है इसकी सच्चाई, आइये जानते हैं.

कर्नाटक के मैसूर रियासत पर टीपू के पिता हैदर अली ने 1761-1782 और फिर टीपू ने 1782-1799 तक शासन किया. दोनों पिता-पुत्र की जोड़ी अंग्रेजों के खिलाफ  कुल मिलाकर 4 युद्ध किए. कभी जीत तो कभी हार मिली, लेकिन 1799 में श्रीरंगपट्टनम की आखिरी लड़ाई में टीपू अंग्रेजों के हाथों मारे गए. इसके बाद अंग्रेजों ने टीपू की तलवार बरामद की, जिस पर लिखा था- मेरी तलवार काफिरों के विनाश के लिए चमक रही है. इसके बारे में लोगों को काफी जानकारी हो चुकी है. लेकिन इसी दौरान अंग्रेजों ने टीपू के हाथ से एक अंगूठी भी निकाली थी. इस पर देवनागरी लिपि में राम लिखा था.

कैसे चर्चा में आई यह राम नाम वाली अंगूठी?

इसक पता तब चला, जब जब लंदन स्थित क्रिस्टीज ने 4 अप्रैल 2012 को होने वाली The Raglan Collection: Waterloo, Wellington & The Crimea नीलामी में लॉट नंबर 10 का विवरण जारी किया. इस लॉट का शीर्षक था- ‘एक भारतीय प्राचीन स्वर्ण अंगूठी’. इसका विवरण इस प्रकार दिया गया था: यह एक भारी अंडाकार अंगूठी है, जिस पर हिंदू देवता राम का नाम उभरी हुई देवनागरी लिपि में अंकित है. इसके अष्टकोणीय आधार के चारों ओर उकेरी हुई पुष्प कली की आकृतियाँ हैं और कंधे व घेरा अलंकृत हैं. अंगूठी के अंदर यह खुदा हुआ है, मेजर जनरल लॉर्ड फिट्जरॉय सोमरसेट, केसीबी (Major General Lord FitzRoy Somerset KCB) 18वीं सदी के उत्तरार्ध की. इसका वजन 41.2 ग्राम बताया गया.

कहां से कहां तक पहुंची यह अंगूठी?

इस अंगूठी की उत्पत्ति (प्रोवेनेंस) बेहद रोचक है. यह अंगूठी टीपू सुल्तान से 1799 में श्रीरंगपट्टनम की लड़ाई में आर्थर वेलेस्ली द्वारा ली गई थी. वह आगे चलकर ड्यूक ऑफ वेलिंगटन बने. उन्होंने यह अंगूठी अपनी भतीजी एमिली वेलेस्ली-पोल (बाद में लेडी फिट्जरॉय सोमरसेट) को दी, जिन्होंने इसे अपने पति लॉर्ड फिट्जरॉय सोमरसेट (बाद में प्रथम बैरन रैगलन) को दे दिया. इसके बाद 1895 में लेफ्टिनेंट कर्नल जॉर्ज सोमरसेट, तृतीय बैरन रैगलन ने इसे रॉयल यूनाइटेड सर्विस इंस्टिट्यूशन में जमा करा दिया. हालाँकि, अक्टूबर 1952 में मेजर फिट्जरॉय सोमरसेट, चतुर्थ बैरन रैगलन ने इस अंगूठी को संग्रहालय से निकाल लिया और यह फिर से वेल्स स्थित पारिवारिक घर में पहुँच गई.

टीपू को आभूषणों का शौक था, इस पर कोई विवाद नहीं. लंदन के विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूजियम में उनके आभूषणों के 10 अलग-अलग नमूने मौजूद हैं. इसके अलावा उनके महल की लूट के बाद उनके अधिकांश गहने लूट लिए गए थे, जिनका मूल्य 25 लाख ब्रिटिश पाउंड से अधिक आँका गया था.

घटनास्थल पर मौजूद अंग्रेज का बयान थोड़ा अलग

हालांकि, इस घटना के समय मौजूद रहे अंग्रेज अधिकारी के बयानों में ऐसी कोई बात नहीं स्पष्ट होती. तोशखान.ओआरजी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, घटनास्थल पर मौजूद मेजर एलन ने मृत टीपू का वर्णन इस प्रकार किया, ‘उनका वस्त्र सफेद महीन लिनन का एक जाकेट, फूलदार छींट का ढीला पाजामा, कमर पर रेशम और सूती लाल पटका था; कंधे पर लाल-हरे रेशमी पट्टे से लटकती सुंदर थैली थी; सिर खुला था क्योंकि गिरने की अफरा-तफरी में पगड़ी खो गई थी; उनकी बाँह पर एक ताबीज था, पर कोई आभूषण नहीं.’

इस प्रत्यक्षदर्शी विवरण से स्पष्ट है कि मृत्यु के कुछ ही घंटों बाद टीपू के शरीर पर बाँह के ताबीज के अलावा कोई आभूषण नहीं था. चाहे टीपू को आभूषण कितने ही प्रिय रहे हों, उनका शव ताबीज के अलावा बिना किसी आभूषण के मिला. न मेजर एलन और न ही किसी अन्य समकालीन विवरण में किसी अंगूठी का उल्लेख है. यह भी असंभव है कि कोई चोर इतनी भारी सोने की अंगूठी को नजरअंदाज कर देता.

आर्थर वेलेस्ली की बातों पर भरोसा करने के कई कारण

यह अंगूठी टीपू सुल्तान से संबंधित है, इसमें संदेह नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह ड्यूक ऑफ वेलिंगटन के पास थी, जो स्वयं उस स्थान पर मौजूद थे जब टीपू का शव निकाला गया. उन्होंने यह अंगूठी अपनी प्रिय भतीजी एमिली को दी, जिन्होंने इसे अपने पति लॉर्ड फिट्जरॉय सोमरसेट को दे दिया, जिनका नाम आज भी अंगूठी के भीतर खुदा है.

नेपोलियन को हराने वाले ड्यूक ऑफ वेलिंगटन आर्थर वेलेस्ली के पास यूरोप, भारत और मिस्र के अभियानों से प्राप्त ढेर-सारे स्मृति-चिह्न थे. वह भारत के तत्कालीन अंग्रेज गवर्नर-जनरल लॉर्ड वेलेस्ली के भाई थे. वह 1828-1830 और 1834 में दो बार ब्रिटेन के प्रधानमंत्री भी रहे थे. ऐसे में यह मानने का कोई कारण नहीं कि वे अपनी भतीजी को भेंट की गई अंगूठी की उत्पत्ति के बारे में झूठ बोलेंगे. टीपू के खजाने में अपार संपत्ति थी और ड्यूक अपनी हैसियत के कारण सर्वश्रेष्ठ वस्तु चुन सकते थे. यह अंगूठी अवश्य ही विशेष रही होगी और संभवतः यह टीपू के महल के भीतरी कक्षों से मिली होगी.

तोशखाना की रिपोर्ट के अनुसार, इसलिए व्यावहारिक होना होगा और मानना होगा कि 200 वर्षों में ‘खजाने से निकली’ कहानी ‘उँगली से निकली’ किंवदंती में बदल गई. टीपू के खजाने में ऐसी अंगूठी का होना आश्चर्यजनक नहीं है, क्योंकि उनके दरबार में हिंदू और इस्लामी दोनों तत्वों का समन्वय था. तो यह अंगूठी कहाँ से आई? क्या यह युद्ध की लूट थी? संभवतः नहीं. यह अंगूठी साधारण है, रत्नजड़ित नहीं. यदि यह युद्ध-लूट होती, तो इसे तोशख़ाना में रखा जाता.

क्योंकि टीपू खुद को इस्लाम का परम अनुयायी भी मानते थे. ऐसे में कुरान पढ़ते समय भगवान राम का नाम अंकित अंगूठी पहनना उस दौर में न केवल टीपू जैसे शासक के लिए, बल्कि किसी भी मुस्लिम के लिए अस्वीकार्य होता. वैसे टीपू के हिंदुओं के खिलाफ ‘अत्याचार’ और उसकी तलवार में खुदे हुए वाक्य कुछ अलग ही कहानी कहते हैं. हालांकि, टीपू के हिंदू मंदिरों को किए गए दान और हिंदू मठों से भी पत्राचार के सबूत मिले हैं, जिससे इनकार नहीं किया जा सकता.

टीपू के पास कैसे आई होगी यह अंगूठी?

तोशखाना की रिपोर्ट इस अंगूठी के बारे में भी अंदेशा जताती है कि यह कहां से आई होगी? रिपोर्ट कहती है कि इसका संबंध संभवतः मैसूर के दक्षिणी छोर, श्रृंगेरी मठ से हो सकता है. डॉ. ए.के. शास्त्री ने टीपू द्वारा श्री सच्चिदानंद भारती तृतीय को लिखे 47 पत्र प्रकाशित किए हैं. इनमें टीपू ने मठ की कुशलता पूछी, समृद्धि के लिए प्रार्थना कराई और यहाँ तक कि अपनी कुंडली बनवाने का अनुरोध भी किया.

15 नवंबर 1793 के एक पत्र में टीपू ने गुरु से प्राप्त आभूषणों की प्राप्ति स्वीकार की. इनमें सिरपेचा, कलगी और एक जोड़ी शॉल शामिल थी. इससे स्पष्ट है कि उपहारों का आदान-प्रदान दोनों ओर से होता था. संभव है कि यह राम-नाम अंकित अंगूठी भी गुरु द्वारा दी गई हो, जिसे टीपू ने शुभ प्रतीक के रूप में सहेज कर रखा. भगवान राम को ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ कहा जाता है एक नैतिक आदर्श. हो श्रृंगेरी शंकराचार्य ने यह अंगूठी भेजी हो, ताकि टीपू को राजा के कर्तव्यों की याद दिलाई जा सके.

2015 में सपा के नेता आजम खान ने भी इस अंगूठी के बारे में जिक्र किया था. उन्होंने उस समय प्रधानमंत्री के बयान का जिक्र करते हुए कहा था कि पीएम को इस अंगूठी को भी भारत वापस लाना चाहिए. उस समय (2015 में) कोहिनूर हीरे को भारत वापस लाने की बातों ने बड़ा जोर पकड़ा था.

ताजा विवाद का मामला

मालेगांव नगर निगम के उपमहापौर कार्यालय में टीपू सुल्तान के चित्र को लेकर विवाद हुआ. शिवसेना और कई हिंदू संगठनों ने शान-ए-हिंद निहाल अहमद के कार्यालय में लगे चित्र के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया. इसके बाद महाराष्ट्र कांग्रेस के अध्यक्ष हर्षवर्धन वसंतराव सपकाल ने टीपू सुल्तान की अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई की तुलना छत्रपति शिवाजी महाराज के ‘स्वराज्य’ के विचार से की.

उनकी इस टिप्पणी से विवाद और भड़क गया, जिस पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने सपकाल की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि उन्हें अपने बयान पर शर्म आनी चाहिए. फिर हिंसा हुई, जिसके बाद कांग्रेस नेता सचिन सावंत ने आरोप लगाया कि भाजपा नेताओं ने अतीत में 18वीं सदी के मैसूर शासक टीपू सुल्तान से जुड़े संदर्भों को सार्वजनिक स्थलों और आधिकारिक मंचों पर समर्थन दिया या उनका अनुमोदन किया है.

रविवार को सचिन सावंत ने कई ऐसे उदाहरण गिनाए, जहां कथित तौर पर भाजपा नेताओं ने टीपू सुल्तान की प्रशंसा की या उनसे खुद को जोड़ा. सावंत ने कहा, ‘इस पाखंड को क्या कहा जाए? टीपू सुल्तान भगवान राम का नाम अंकित अंगूठी पहनते थे.’

सावंत ने टीपू सुल्तान को लेकर भाजपा के कथित समर्थन के पुराने उदाहरण भी पेश किए. 2012 में भाजपा ने अकोला महानगरपालिका में एक प्रस्ताव पारित किया था, जिसमें स्थायी समिति हॉल का नाम ‘शहीद-ए-वतन शेर-ए-मैसूर टीपू सुल्तान’ रखने की बात कही गई थी. इसके अलावा 2013 में मुंबई के एम-ईस्ट वार्ड में एक सड़क का नाम ‘शहीद टीपू सुल्तान मार्ग’ रखने के प्रस्ताव का भी भाजपा पार्षदों ने समर्थन किया था.

उन्होंने दावा किया कि भाजपा नेता एवं कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने टीपू सुल्तान के मकबरे का दौरा किया था और विजिटर्स बुक में उनकी प्रशंसा में अपने विचार लिखे थे. कांग्रेस नेता ने कहा कि 2017 में तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने भी कर्नाटक विधानसभा में टीपू सुल्तान की प्रशंसा की थी.

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