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एनएचआरसी, भारत ने ‘प्रगतिशील विकलांगता की पहचान – विकलांगता अधिकारों के लिए एक समग्र दृष्टिकोण का अंगीकरण’ विषय पर हाइब्रिड मोड में कोर ग्रुप की बैठक आयोजित की

निजी क्षेत्र के साथ सहयोगात्मक प्रयासों को प्रोत्साहित करने पर बल दिया गया
विकलांगता से पीड़ित लोगों की एक विस्तृत श्रृंखला को गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच सुनिश्चित करने के लिए बेंचमार्क विकलांगता के 40% अंक पर फिर से विचार करने की आवश्यकता है
नई दिल्ली । राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी), भारत ने आज नई दिल्ली में ‘प्रगतिशील विकलांगता की पहचान – विकलांगता अधिकारों के लिए एक समग्र दृष्टिकोण का अंगीकरण’ विषय पर हाइब्रिड मोड में एक कोर ग्रुप मीटिंग आयोजित की। इसकी अध्यक्षता एनएचआरसी, भारत के अध्यक्ष न्यायमूर्ति श्री वी रामसुब्रमण्यन ने सदस्य न्यायमूर्ति (डॉ) बिद्युत रंजन सारंगी, महासचिव श्री भरत लाल, श्री राजेश अग्रवाल, सचिव, विकलांग व्यक्तियों का सशक्तिकरण विभाग, सरकार और एनएचआरसी के अन्य वरिष्ठ अधिकारियों, डोमेन विशेषज्ञों और चिकित्सा पेशेवरों की उपस्थिति में की गई।
न्यायमूर्ति रामसुब्रमण्यन ने कहा कि दुनिया को विकलांगता अधिकारों के लिए मानवाधिकार दृष्टिकोण अपनाने में 30 साल लग गए। दुनिया में विकलांग व्यक्तियों के कल्याण की माँग से संबंधित कानूनों और नीतियों के विकास को याद करते हुए उन्होंने कहा कि भारत में, अंतरराष्ट्रीय विकास के समानांतर 1987 का मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 1995 का विकलांग व्यक्ति अधिनियम और 2016 का विकलांग व्यक्ति अधिकार अधिनियम शामिल हैं।
हालांकि, उन्होंने कहा कि विकलांगता से संबंधित कानूनों, नीतियों और उनके कार्यान्वयन में सुधार की गुंजाइश हो सकती है। उन्होंने कहा कि इसके लिए सभी हितधारकों को विकलांगता से संबंधित कानूनों, नीतियों और उनके कार्यान्वयन में सुधार के लिए अपने सुझावों को प्राथमिकता देने की आवश्यकता है, जिसके लिए संसद, एनएचआरसी और न्यायपालिका के हस्तक्षेप की आवश्यकता है, जिन्हें स्पष्ट कार्य योजना तैयार करने के लिए तीन श्रेणियों में विभाजित किया जाना चाहिए।
एनएचआरसी, भारत के सदस्य न्यायमूर्ति (डॉ) बिद्युत रंजन सारंगी ने कहा कि विकलांग व्यक्तियों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए रणनीति बनाने और तरीके खोजने की आवश्यकता है। इसलिए, सरकार सहित सभी हितधारकों को एक साथ आने और उन्हें सम्मानजनक तरीके से जीने के लिए नैतिक समर्थन देने की आवश्यकता है। चिकित्सा व्यय के मुद्दे पर विचार किया जाना चाहिए और व्यक्ति को उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
एनएचआरसी, भारत के महासचिव श्री भरत लाल ने चर्चा का एजेंडा तय करते हुए कहा कि आयोग सरकारी अधिकारियों, डोमेन विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं, शिक्षाविदों और जमीनी स्तर पर काम करने वाले लोगों सहित कई हितधारकों के साथ जुड़ता है। उन्होंने तीन तकनीकी सत्रों का अवलोकन दिया- प्रगतिशील विकलांगताओं को परिभाषित करना और उनका वर्गीकरण करना, विकलांगताओं को संबोधित करने के लिए कानूनी और नीतिगत ढांचा और समावेशी तथा न्यायसंगत सहायता सेवाओं को बढ़ावा देना।
केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग के सचिव श्री राजेश अग्रवाल ने कहा कि 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की 2.2 प्रतिशत आबादी दिव्यांग है। हालांकि, कई बार कलंक के कारण मामले कम दर्ज होते हैं, खासकर बुजुर्गों में, क्योंकि बुढ़ापे में दिव्यांगता को अक्सर सामान्य माना जाता है। हालांकि संस्थागत प्रसव और बेहतर देखभाल के कारण पोलियो के मामले कम हो रहे हैं, लेकिन दुर्घटनाओं और ऑटिज्म से दिव्यांगता बढ़ रही है, जिससे दिव्यांगता आदेशों की प्रकृति में बदलाव आ रहा है। उन्होंने कहा कि अधिकारों के संबंध में, दिव्यांग व्यक्तियों के लिए सरकारी और सार्वजनिक उपक्रमों की नौकरियों में 4 प्रतिशत और शिक्षा में 5 प्रतिशत आरक्षण है। उन्होंने भवनों, परिवहन और डिजिटल प्लेटफार्मों में बेहतर पहुँच की आवश्यकता पर बल दिया। भौतिक पहुँच में भारत यूरोपीय देशों से पीछे है, हालांकि दिव्यांगों के लिए शौचालय की सुविधा में सुधार हुआ है। डिजिटल पहुँच अपेक्षाकृत बेहतर है।
उन्होंने जोर देकर कहा कि शिक्षा की सुलभता, समान अवसर और उचित आवास 95% लोगों की मदद कर सकते हैं, जो समाज की प्राथमिकता होनी चाहिए। अगर विकलांगता में सुधार या प्रगति की संभावना है, तो 5% या 80% विकलांगता होने के बावजूद उन्हें एक अस्थायी प्रमाण पत्र दिया जाता है। लेकिन अगर विकलांगता वैसी ही रहती है या बिगड़ती है, तो एक स्थायी प्रमाण पत्र दिया जाएगा। वर्तमान में, देश में 70% से अधिक प्रमाण पत्र स्थायी हैं।
प्रतिभागियों में स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की अतिरिक्त महानिदेशक डॉ. सुनीता मोंडल; स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की सहायक महानिदेशक डॉ. रूपाली रॉय; सलाहकार श्री राजीव रतूड़ी, राष्ट्रीय विकलांग रोजगार संवर्धन केंद्र (एनसीपीईडीपी) की प्रतिनिधि सुश्री शिवानी जाधव; यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ मेडिकल साइंसेज एवं जीटीबी अस्पताल के फिजियोलॉजी के निदेशक-प्रोफेसर डॉ. सतेंद्र सिंह; दिल्ली विश्वविद्यालय की सहायक प्रोफेसर सुश्री पूर्वा जी मित्तल; सेंस इंटरनेशनल (भारत) के निदेशक श्री अखिल एस पॉल; स्वावलंबन फाउंडेशन के संस्थापक डॉ. वैभव भंडारी; भारतीय पुनर्वास परिषद, नई दिल्ली के सदस्य सचिव श्री विकास त्रिवेदी; एनएचआरसी के महानिदेशक (आई), श्री आर प्रसाद मीना; रजिस्ट्रार (कानून), श्री जोगिंदर सिंह; निदेशक, लेफ्टिनेंट कर्नल वीरेंद्र सिंह आदि शामिल थे।

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