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थाना बना कोर्ट : कमिश्नरी प्रणाली में पुलिस अफसरों को मिली. दंडाधिकारी शक्तियां, अब बदमाशों को एसीपी सीधे भेज रहे जेल

पुलिस कमिश्नरेट प्रणाली के दूसरे चरण में प्रतिबंधात्मक धाराओं के तहत सुनवाई करने का काम पुलिस कमिश्नरेट के अधिकारियों ने सोमवार से शुरू कर दिया है।
रायपुर। पुलिस कमिश्नरेट प्रणाली के दूसरे चरण में प्रतिबंधात्मक धाराओं के तहत सुनवाई करने का काम पुलिस कमिश्नरेट के अधिकारियों ने सोमवार से शुरू कर दिया है। पहले दिन कोतवाली तथा सिविल लाइंस थाने के एसीपी ने सुनवाई की। कोतवाली एसीपी ने दो बदमाशों को प्रतिबंधात्मक धाराओं के तहत जेल भेजने का फैसला सुनाया। इसके साथ ही पांच अलग-अलग प्रकरण में सहायक पुलिस आयुक्त ने 13 बदमाशों को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए वारंट जारी किया।
पुलिस कमिश्नरेट में मिले दंडाधिकारी अधिकारों का रायपुर सेंट्रल के दो सब डिवीजन के एसीपी ने अपनी दंडाधिकारी शक्तियों का उपयोग करते हुए सुनवाई की। फील्ड में जो पुलिस अधिकारी खाकी वर्दी में दिखाई देते थे, वही अधिकारी दंडाधिकारी की भूमिका में आने के बाद काले कोट में नजर आए। प्रतिबंधात्मक धाराओं में अभियोजन की ओर से वकील की जरूरत नहीं होती। अनावेदक पक्ष की ओर से बचाव के लिए वकील पैरवी करने थाना परिसर में बने कोर्ट पहुंचे।
इन धाराओं में की गई सुनवाई
कोतवाली एसीपी दीपक मिश्रा ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 170, 126 एवं 135 (3) के अंतर्गत एक प्रकरण में 02 अनावेदकों के विरुद्ध कार्रवाई करते हुए जेल वारंट तैयार किया। साथ ही दोनों अनावेदकों को कारण बताओ नोटिस तामिल कराए गए। इसके अतिरिक्त धारा 126 एवं 135(3) के अंतर्गत पांच प्रकरण में 13 अनावेदकों को कारण बताओ नोटिस एवं समन जारी किए गए, जिन्हें कमिश्नरी प्रणाली के तहत तत्काल तामिल कराया गया। सिविल लाइन एसीपी रमाकांत साहू ने भी लोक शांति भंग होने की आशंका को देखते हुए धारा 126 एवं 135(3) के तहत छह अनावेदकों को कारण बताओ नोटिस जारी किया।
नई भूमिका चुनौतीपूर्ण : दीपक मिश्रा
पहले दिन की मजिस्ट्रयल शक्तियों के प्रयोग करने को लेकर कोतवाली एसीपी दीपक मिश्रा ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा बदमाशों को प्रतिबंधात्क धाराओं के तहत कार्रवाई करने के बाद पुलिस को पहले एडीएम, एसडीएम कोर्ट में जेल भेजने चालान पेश करना पड़ता था। अब वे खुद मजिस्ट्रेट की भूमिका में आए, तब उन्हें किसी के साथ अन्याय न हो, इस बात को देखते हुए निर्णय लेना पड़ा। जिन बदमाशों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई करती है, आवेदक तथा अनावेदक के प्रति किसी तरह से अन्याय न हो, इस बात को ध्यान में रखते हुए कानून के दायरे में फैसला सुनाने का पुलिस अफसर के लिए यह पहला अनुभव था।

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