
गत दिनों 61 ग्राम सोना तपते-तपते ऐसा निखरा कि कार्यवाही ही पिघलकर शून्य हो गई। गरियाबंद से निकली जप्ती को वर्दी , तौल हुआ , फोटो खिंचे फिर न्याय और कार्यवाही की फाइल ने योगासन करते-करते ऐसी समाधि ली कि अब तक नहीं टूटी ना कभी टूटेगी लगा । 61 ग्राम का वजन इलेक्ट्रॉनिक तराजू पर भले कम हो, मगर उसकी कहानी का वजन पूरे सिस्टम पर भारी और चौक चौराहे पर चर्चा का विषय बना हुआ है ।
चर्चा है कि अबकी बार सोना ही नहीं था बल्कि भ्रष्ट सिस्टम का पीला आईना था , जिसमें हर चेहरा साफ दिखा। जप्ती हुई पर कार्रवाई गायब ? जैसे कोई जादूगर टोपी से कबूतर निकालकर फिर टोपी ही गायब कर दे।
61 ग्राम के पीले का सच और 10 लाख की खामोशी वाली कथा के नायक भी कम रोचक नहीं। युवा नेता जी, जो जनसेवा की मशाल लेकर निकले थे, अचानक दलाली की रोशनी में अधिक चमकते दिखे। वर्दीधारी अफसर और युवा नेता का ऐसा समन्वय कि लगता है लोकतंत्र नहीं, ‘लाभतंत्र’ चल रहा है। एक तरफ कानून की किताब, दूसरी तरफ समझौते की डायरी और बीच में 61 ग्राम की कहानी बड़ी दिलचस्प बन चर्चित हो चली है ।
आजकल 61 ग्राम की कहानी में 3M, 5KP और 2GP का गणित बड़ा दिलचस्प चर्चित हो रहा है । तीन लाख पितृकार की खामोशी के लिए, पाँच लाख एक जिले की वर्दी के सम्मान हेतु, और दो लाख दूसरे जिले की शांति के नाम पर अब ये गणितीय सूत्र कितना सटीक व सत्यता के तराजू पर खरा है ये तो 61 ग्राम वाले ही जाने किंतु कुल मिलाकर 10 लाख की वह गणितीय नैतिकता का क्या मस्त संतुलन है कि न्याय शून्य, बंटवारा पूर्ण हो गया ? जिसने 61 ग्राम को ऐसा हल्का कर दिया कि न्याय का तराजू झुकने से बच गया ?
चर्चा यह भी है कि फाइलें दौड़ीं, फोन घनघनाए, और बैठकें हुईं। हर बैठक में चाय मीठी थी, पर बात कड़वी नहीं हुई। आखिर कड़वाहट से काम बिगड़ता है, मिठास से मामला सेटल होता है और जब मामला सेटल हो जाए, तो जनता को समझा दिया जाता है कि अभी जांच जारी है। यह जारी शब्द बड़ा लचीला है जो सालों तक खिंच सकता है जैसे चुनावी वादे चुनावी मंच पर खिंचते हैं।
कुल मिलाकर व्यंग्य यह है कि 61 ग्राम सोना चोरी का था या नहीं, यह जानना अब बेमानी हो चुका है। असली सवाल यह है कि ईमान का वजन कितना था ? यदि 61 ग्राम सोना इतना हल्का था कि कार्यवाही शून्य हो गई, तो क्या ईमान भी अब ग्रामों में तौला जाने लगा है ? और यदि बंटवारे की चर्चा चौक-चौराहों पर है, पता सबको है पर किसी को पता भी नहीं है अजब है पर गजब है ?
वैसे युवा नेता जी की भूमिका पर भी खूब वाहवाही है जनता के बीच की सादगी और अंदरखाने की सफल रणनीति अच्छे युवा तुर्क की पहचान है । वर्दीधारियों की भूमिका भी कम प्रेरक नहीं है कानून के रक्षक, परिस्थितियों के अनुसार प्रबंधक की भूमिका भी । दोनों ने मिलकर सबके साथ सबका विकास का विकास का मॉडल दिखाया कि मामला विकास की तरह ही फाइलों में दर्ज रहा , जमीन पर नहीं और खुशियां चहुं ओर फैली ।
हो कुछ भी आज पब्लिक है कि मुस्कुरा रही कड़वी मुस्कान के साथ क्योंकि उसे पता है कि 61 ग्राम की जप्ती से ज्यादा भारी 10 लाख की फुसफुसाहट है। और जब तक फुसफुसाहटों का यह बाजार गर्म है, तब तक हर जप्ती के बाद कार्यवाही की शून्यता का ही सोना खनकता रहेगा। आज सोना सोना नहीं बल्कि आज के सिस्टम का स्वर्णिम व्यंग्य है जो चमकता भी है और चुभता भी।
चलते चलते :-
समाजिक लोगो का चेहरा दिखा 218 करोड़ के घपले और लापरवाही की फाइल को दबाने दलाल नेता सक्रिय ?
और अंत में :-
जो बात घर में हुई थी वो आज बाज़ार में है,
कोई तो सुराख यक़ीनन मेरी दीवार में है।








