Ro no D15139/23

वरिष्ठ पत्रकार चंद्रशेखर शर्मा की बात बेबाक ..खाने को चने नहीं, पिछवाड़ा मांगे जायफल, तनखा साढ़े पांच सौ, कंधे पे टांगे रायफल”

कहते हैं, शासन व्यवस्था एक चादर की तरह होती है । चादर को ले संत कबीरदास जी की लाइन याद आ गई-
“झीनी झीनी बुनी री चदरिया।”

“जब मोरी चादर बन घर आई,
रंगरेज को दिनी,
ऐसा रंग रंगा रंगरे ने,
के लालो लाल कर दिनी,
चदरीया झीनी रे झीनी,
राम नाम रस भीनी,
चदरीया झीनी रे झीनी।”

लेकिन महिला बाल विकास विभाग के यहां तो लगता है चदरिया (साड़ी ) इतनी झीनी और कच्चे रंग से बुनी गई कि पहली धुलाई में ही धागे अलग-अलग दिशाओं में लोकतंत्र की तरह बिखर गए रंग बदरंग हो गया, साड़ियों की गुणवत्ता का हाल ऐसा कि पहनते ही लगे मानो आत्मनिर्भर भारत के नाम पर कपड़ा भी खुद ही संभालो, क्योंकि साड़ी तो खुद ही हार मान चुकी है ना रंग की ना रूप की।
अब सोचिए, जिन महिलाओं के सशक्तिकरण के नाम पर ये साड़ियाँ बांटी जा रही हैं, वे साड़ी पहनकर सशक्त होंगी या साड़ी के धागे पकड़कर उसे संभालने में ही पूरा दिन निकाल देंगी? साड़ी अगर हल्की हो तो ठीक है किन्तु इतनी भी हल्की नहीं कि हवा चले और मानो साड़ी बोले “ मैं चली मैं चली, देखो भ्रष्टाचार की गली, मुझे रोके न कोई…”।”
उधर स्वास्थ्य विभाग का हाल भी कुछ ऐसा है कि अब अस्पताल कम और ठेका मंडी ज्यादा लगने लगे हैं। मोक्षित के गठबंधन की ऐसी काली छाया पड़ी की अब खून की जांच भी ठेके पर मतलब, अब खून भी अपना नहीं रहा वो भी आउटसोर्स हो गया। पहले डॉक्टर नाड़ी देखकर बीमारी पकड़ लेते थे, अब रिपोर्ट देखकर पकड़ते हैं “भाईसाहब, आपके खून में कमी नहीं, बल्कि हमारे सरकारी कॉन्ट्रैक्ट में कमी है।”
सरकारी अस्पताल, जिन्हें कभी खैराती कहा जाता था, अब ‘खैरात’ शब्द से नाराज़ हो चुके हैं। अब वे पूरी गरिमा के साथ कह रहे हैं “हम खैराती नहीं, प्राइवेट सोच वाले पब्लिक संस्थान हैं।” मरीज अंदर जाए तो पहले उसे बीमारी नहीं, आयुष्मान कार्ड से काटे जाने वाले बिल का अंदाजा हो जाता है। इलाज बाद में, हिसाब पहले आज कल ऐसे लगता है जैसे जिंदगी नहीं, ईएमआई चल रही हो।
और हमारा शिक्षा विभाग—वाह ! यहां तो रचनात्मकता और प्रयोगों का अंधाधुंध विस्फोट ईरान इजराइल व अमरीका की तरह हो रहा है। अंकसूची अब इतनी लंबी हो गई है कि छात्र सोच रहे है कि उसने परीक्षा दी थी या कोई आत्मकथा लिखी थी। पहले मार्कशीट में विषय, अंक और पास-फेल लिखा होता था। अब लगता है जैसे पूरा जीवन दर्शन समेट दिया गया हो “छात्र ने गणित में 60 अंक प्राप्त किए, परंतु मानसिक रूप से वह 80 का हकदार था, किन्तु परिस्थितियों ने उसे 60 तक ही सीमित रखा।”
इतनी लंबी मार्कशीट कि पढ़ने बैठो तो चाय ठंडी हो जाए, मोबाइल की बैटरी खत्म हो जाए और बीच में खुद छात्र भी भूल जाए कि वह पास हुआ है या अभी भी संघर्षरत है। गोबरहिंन टुरी अपने बेटे से पूछती हैं “बेटा, पास होएस ?” लपरहा टुरा जवाब देता है —“दाई , अभी तीसर पन्ना म पहुंचे हांव थोकुन रुक तो ।”
लगता है शिक्षा विभाग अब अंकसूची नहीं, महागाथा लिखने में जुटा है। अगली बार शायद अंकसूची के साथ ट्रेलर भी आए—“देखिए, इस साल की सबसे बड़ी शैक्षणिक कहानी, जहां हर अंक के पीछे छिपी है एक भावनात्मक प्रयोगात्मक यात्रा की कहानी।”
ये सब हो क्या रहा है? हर विभाग धीरे-धीरे ‘ठेके’ के हवाले होता जा रहा है। जैसे सरकार ने सोचा हो—“काम क्यों करें? काम करवाते हैं ? ” और करवाने का भी ऐसा तरीका कि जिम्मेदारी और जवाबदेही फाइलों में खो जाए।
ये साड़ियाँ, ये अस्पताल, ये मार्कशीट , ये सिर्फ उदाहरण नहीं हैं, ये उस सोच के प्रतीक हैं जहां गुणवत्ता की जगह ‘जुगाड़’, सेवा की जगह ‘सिस्टम’, और जिम्मेदारी की जगह ‘ठेका’ आ गया है।
“झीनी झीनी बुनी री चदरिया”—कभी यह पंक्ति जीवन की नश्वरता का प्रतीक थी, अब यह प्रशासन की नाजुकता का प्रतीक बनती जा रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले चदरिया ईश्वर बुनता था, अब टेंडर , कोटेशन से बनती है।
और अंत में जनता—हाथ में साड़ी का किनारा, जेब में अस्पताल की पर्ची, और सामने खुली हुई लंबी-चौड़ी अंकसूची लिए खड़ी खड़ी सोच रही है—“ये शासन है या कोई प्रयोगशाला, जहां हम सब परीक्षण और प्रयोगों के नमूने बने पड़े हैं ?”
कभी इस पर भी जांच बैठी तो शायद जवाब किसी जांच या रिपोर्ट में आएगा “ठेके” पर।

चलते चलते :-

(1) चिल्फी आरटीओ बैरियर के अधिकारी कर्मचारी और लठैतों की मनमानी को संरक्षण देने वाले अफसर और नेता कौन ?
(2) चिल्फी बैरियर में पदस्थ अफसरों कर्मियों पर कार्यवाही करने से क्यों कांपते है अफसरों और नेताओं के हाथ ?
(3) आरटीओ बैरियर से अवैध कमाई में हिस्सेदारी के बंटवारे की अफवाह क्या सच है या कोरी अफवाह ?

और अंत में :-

खाने को चने नहीं, पिछवाड़ा मांगे जायफल,
तनखा साढ़े पांच सौ, कंधे पे टांगे रायफल”

#जय_हो 14 अप्रेल 2026 कवर्धा (छत्तीसगढ़)

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