Friday, June 21

वरिष्ठ पत्रकार जवाहर नागदेव की बेबाक कलम चुनावी साल में मंत्रीजी को आईडिया आया धांसू गणतंत्र दिवस पर अफसर के छलका दिये आंसू

{बजट बजाएगा …. – एक फरवरी को बजट पेश किया जाएगा। बजट पेश करने से पहले शुभ ‘हलवा सेरेमनी’ का आयोजन किया जाता है। हलवा बनाया जाता है और मिलबांटकर खाया जाता है। तो हलवा बन गया और बंट गया। वित्तमंत्री निर्मला सीतारमन बजट पेश करेंगी। यूं तोे ये हर कोई समझ रहा है कि बजट में काफी सहूलियतें दी जाएंगी। सहूलियत देंगे तभी तो वोट लेंगे न। वैसे भी सरकार की नीयत सदा से जनता के लिये हितकारी रही है। बहरहाल… एक-दो दिन में पता चल जाएगा कि बजट बजाएगा सुख की शहनाई या जनता की पीठ पर ढोल.. }चुनावी साल है भाई। जैसे कत्ल की रात होती है वैसे ही कत्ल का साल है। दांव पर लगाया सारा जीवन इसी पल के लिये। अब चूके तो सब चूके। हर कोई अपने-अपने स्तर पर दांव खेल रहा है। जोर लगा रहा है।

 गांधीजी ने आजादी के लिये नारा दिया था ‘करो या मरो’। बस वही स्थिति है। कांग्रेस को लगता है कि बस इस साल और मेहनत कर लें और इतनी मेहनत करें कि सामने मौत का अहसास हो। यदि नहीं किया तो मरना तय है। राजनैतिक मौत। सत्ता छिनी यानि जीवन छिना। और फिर  दोबारा सत्ता में आना असंभव जैसा हो जाएगा।
शायद फिर पंद्रह साल का वनवास मिल जाए। इसलिये करो या मरो। वैसे कांग्रेस को ये सोचकर आशान्वित होना चाहिये कि स्थिति खराब नहीं है। जैसे पहले कांग्रेस राजाओं की तरह राज करती थी और बेफिकर होकर सत्ता का मजा लूटती थी, जनता जाए भाड़ में। अब इसके ठीक उलट है। चैकन्नी है। जनता का काम करने को बेताब है। संभव है कि भ्रष्टाचार की शिकायत होने पर कुछएक को लटका भी दिया जाए। यानि बलि का बकरा बना दिया जाए। जिससे जनता में अच्छा संदेश जाए।

गणतंत्र दिवस 26 जनवरी को मंत्री शिव डहरिया ने एक सीएमओ को किसी बात पर सस्पेण्ड कर शिकायतकर्ता का दिल जीत लिया। स्वाभाविक रूप् से जनता भी  खुश हुई होगी। जनता तो अधिकारियेां के रवैये से इतनी दुखी रहती है कि जब किसी अधिकारी को कीड़ा भी काट ले तो खुश हो जाती है क्योंकि सब जानते हैं कि जनता अफसर का कुछ बिगाड़ नहीं सकती। और जो बिगाड़ सकते हैं वे बिगाड़ना नहीं चाहते।
सक्षम लोगों की सहानुभूति अफसर से ही होती है। ये तो चुनावी सााल है कि मंत्रीजी ने लट्ठ उठा ली और ‘आम’ आदमी की शिकायत पर ‘खास’ आदमी को ठोक दिया, सस्पेण्ड कर दिया। जानकारों का कहना है कि ये सस्पेंशन कोई खास बात नहीं है जल्द ही सीएमओ साहब वापस ड्यूटी पर आ जाएंगे। जो हुआ मंच पर हुआ। अब जो होगा मंच के पीछे होगा। साहब की सैटिंग कोई कम तो नहीं होगी।
और फिर ऐसे ‘आम’ की शिकायत पर ‘खास’ को लटकाने का सिलसिला ईमानदारी से चल गया तो समझ लो सारे बड़े अफसर फांसी पर लटकते दिखेंगे। तो भैया ये हाथी के दांत हैं जो चुनावी साल में दिखते हैं। चुनाव निकलते ही खाने के दांत काम करने लगते हैं।
खबर है कि सीएमओ अपने सस्पेंशन से रो पड़े। जितने उनके आंसू निकले उतना ही जनता खुश हुई। जो अधिकारी जनता को खून के आंसू रूलाते हैं उनके ये साधारण आंसू भी कभी-कभार ही निकलते दिखते हैं। जलते दिलों पर सुकून का मलहम लगा। आमतौर पर अधिकारी बेखौफ और भगवान से न डरने वाले होते हैं। इन सीएमओ साहब के बारे में कलेक्टर जी ने अच्छा-अच्छा कहा है। मंत्रीजी से सिफारिश भी की।
 अब ये किसके लिये अच्छे हैं जनता के लिये या मंत्री/अफसरों के लिये…. ये प्रश्न खड़ा है। वैसे रोता भावुक और ईमानदार आदमी है। बेईमान रोता नहीं क्रोधित होता है। चली तो सरेआम नहीं चली तो मन ही मन गालियां बकता है।
जवाहर नागदेव, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, चिन्तक, विश्लेषक
mo. 9522170700
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