Friday, June 21

वरिष्ठ पत्रकार जवाहर नागदेव की बेबाक कलम ,,,सीधे रस्ते की टेढ़ी चाल,,कुमारी शैलजा को कांग्रेस ने प्रभारी बनाया है। यानि कि चुनाव की पूरी तैयारी। छत्तीसगढ़ ही एकमात्र उम्मीद। यदि यहां हार गये तो पूरे देश ही नहीं, विश्व भर में कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहेगी कांग्रेस

वरिष्ठ पत्रकार,चिंतक, लेखक             जवाहर नागदेव 

सीधे रस्ते की टेढ़ी चाल

अवसरवादी नेता विचलित, बड़े बेकरार
किसे मिले शिकस्त, किसे गले पड़ेंगे ‘हार’
कुमारी शैलजा को कांग्रेस ने प्रभारी बनाया है। यानि कि चुनाव की पूरी तैयारी। छत्तीसगढ़ ही एकमात्र उम्मीद। यदि यहां हार गये तो पूरे देश ही नहीं, विश्व भर में कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहेगी कांग्रेस। किसी समय यत्र-तत्र सर्वत्र छाए रहने वाली कांग्रेस को एक-एक स्टेट बचाने के लिये भारी जद्दोजेहद करनी पड़ी है, फिर भी वो नाकामयाब है। आश्चर्य है कि ऐसी स्थिति मंे भी अपनी बची-खुची साख बचाने के लिये कांग्रेस ‘उतनी’ एक्टिव नहीं हो पा रही है ‘जितनी’ होनी चाहिये। पुराने ढर्रे में सुधार ‘उतना’ नहीं हो पा रहा है ‘जितना’ होना चाहिये।
निस्संदेह छत्तीसगढ़ में कई अच्छे काम वर्तमान कांग्रेस सरकार ने किये है और इनका भरपूर प्रचार भी किया है। यहीे कारण है कि ज्ञानी लोग कह रहे हैं कि भाजपा की सरकार बनने में संदेह है। कहते हैं भूपेश बघेल ने निचले स्तर पर जाकर काम किया है और साथ ही उस काम का प्रचार भी किया है। इस बार कांग्रेस का राष्ट्रीय अधिवेशन भी राजधानी में किया जा रहा है। निश्चित ही इससे कार्यकर्ताओं में जोश आएगा। लेकिन परेशानी ये है कि कार्यकर्ता बचे ही कितने हैं, जो जमीन से जुड़े और कांग्रेेस की जड़ों से सारोकार रखने वाली पीढ़ी अब बची नहीं। बाकी जो हैं वो अपने-अपने काम और अपने-अपने मतलब से कांग्रेसी मंच पर जुटे हैं। पैसे से काम करने वाले कभी भी कहीं पर भी मिल जाते हैं। लगे वे लोग हैं जिन्हें टिकट लेना या भैया को दिलवाना है।

पुराने को पेड़ की छांव
और नये पर दांव
हवा चल रही है देश में कि पुराने नाकारा होते जा रहे हैं। कुछ ही अच्छे बचे हैं बाकी बदलने लायक हैं ऐसे में कई अच्छे भी हवा के थपेड़ों से लपेटे में आ रहे हैं। तात्पर्य ये कि हर दल का हाईकमान ये समझने लगा है कि नया चेहरा हो तो बात कुछ बन सकती है। भाजपा सहित कांग्रेस भी ‘पुराने नताओं को किनारे कर थोड़ा सुस्ताने और आराम की सलाह दे रही है और नये पर दांव लगाने के सिद्धांत पर काम कर रही है। ऐसे में अधिवेशन में आने वाले नेताओं के सामने अपनी उपलब्धियों को बताने सारे जुटेंगे इसमंे कोई शक नहीं है। लेकिन ये तय है कि अपनी उपलब्धियों के बजाए जिसे टिकट मिलने की संभावना है उसकी कमियां बताने पर ज्यादा जोर दिया जाता है। यानि अपनी लकीर को बढ़ाने के साथ-साथ अन्य दावेदारों की लकीर को छोटा करने पर पुरा फोकस किया जाएगा। सालों साल के साथी खंदक की लड़ाई में पीठ पर छुरी चलाने में संकोच नहीं करते। यही सियासत है।

काम’ काम करेगा
या ‘मैनेजमेन्ट’

वैसे चुनाव मैनजमेन्ट से जीता जाता है न कि काम से। तो इस बार मैनेजमेन्ट किसता तगड़ा होगा और कौन बाजी मार जाएगा ये देखना है। वैसे आदर्श स्थिति तो ये होती कि सरकार आम आदमी को प्रताड़ना देने वाली नौकरशाही पर अंकुश लगाती। कहीं छोटा-मोटा ही सही भ्रष्टाचार पकड़ती। कुछ चीजों को ऑनलाईन करके और कुछ विभागों को चेतावनी देकर जनता का काम जल्दी और बिना पैसे के करने की व्यवस्था करती। लेकिन ऐसा कुछ होता नहीं दिखा। जनता विभागों में बेइज्जत होती थी और अभी भी होती है। नया कुछ नहीं हुआ है जिसे ठोस कहा जा सके।

भाजपा भी चुस्ती में
ये कोई नयी बात नहीं है। सब जानते हैं कि एक तो भाजपा के पास अच्छे कार्यकर्ताओं की फौज हमेशा से रही है जो बिना किसी स्वार्थ के काम करते हैं। फिर मोदीजी के आने से तो इस संख्या में यानि भाजपा को चाहने वालों में बेतहाशा वृद्धि हुई है। दिनांेदिन भाजपा के नंबर इसीलिये बढ़ रहे हैं। दूसरी बात भाजपा हमेशा से चुनावी मोड मंे ही रहती है। इसके अनुयायी हमेशा तैयार रहते हैं। यानि अनुशासित फौज है भाजपा के पास।

रक्षा करे इनकी सियाराम
इस बार हर हाल में सत्ता वापस चाहिये इस मनोदशा से सियासतदां सरकस में लगे हैं। पिछले चुनाव के समय से थोड़ा सा पहले ही कई दिग्गज कांग्रेसियों ने कांग्रेस के जहाज से सीधे भाजपा के जहाज में कूदी लगा दी थी। इन नेताओं को टिकट मिलने की उम्मीद थी। कुछ एक को मिली भी पर हाए री किस्मत जिस जहाज को डूबता देखकर ईधर सरके थे वो तो तर गया और जिसकी पताका फहराने का अंदाजा था उसका तो पती ही नहीं चला किधर गया। लुब्बोलुआब ये कि कांग्रेस भारी भरकम तरीके से जीती और भाजपाईयों को जीत के लाले पड़ गये। कुछ एक्स्ट्रा एक्टिव नेता ही चुने गये। बाकी सब टायं… टांय… फिस्स। सबसे ज्यादा अखरा उन्हें जिन्हें कांगं्रेस की हार का और भाजपा में आकर अपने सत्कार का पूरा भरोसा था। वे विधायक के टिकट से तो गये ही सरकार न बनने से आयोग आदि का झुनझुना भी नहीं मिला। अब रक्षा करे इनकी सियाराम…

राहुल को गुस्सा क्यों… रागा का गुस्सा वाजिब है भाजपा माता सीता का अपमान कर रही है कि राम का नाम तो लेती है लेकिन सीता का नहीं। श्रीराम तो बोलती है सियाराम नहीं बोलती। यानि एक तरह से ये माता सीता का अपमान हुआ न। पहले भी उनके जनेउ धारण करने पर, यज्ञ-हवन में भाग लेने, शिवभक्त का दिखावा करने पर जनता हंसती थी, धीरे-धीरे जनता को कोफ्त होने लगी, उनकी ऐसी उटपटांग हरकतों से जनता चिढ़ने लगी। लेकिन भाई को अभी भी समझ में नहीं आया। नया शिगूफा छोड़ दिया। अब जनता ने इन्हें गंभीरता से लेना छोड़ दिया है।

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