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भारतीय ज्ञान परम्परा की महानायिका पुण्यश्लोका लोकमाता अहिल्याबाई का जीवन चरित्र है प्रेरणापुंज : उच्च शिक्षा मंत्री परमार

अहिल्याबाई के जीवन के विविध आयामों को साहित्य में समृद्ध करने की आवश्यकता

उच्च शिक्षा मंत्री ने एनआईटीटीटीआर में “लोकमाता अहिल्याबाई : राष्ट्र पुनरुत्थान की संकल्पना” विषयक दो दिवसीय अखिल भारतीय सम्मेलन का किया शुभारंभ

भोपाल । उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा एवं आयुष मंत्री श्री इन्दर सिंह परमार ने शुक्रवार को भोपाल के श्यामला हिल्स स्थित राष्ट्रीय तकनीकी शिक्षक प्रशिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान (एनआईटीटीटीआर) के सभागृह में पुण्यश्लोक अहिल्याबाई जी होलकर के त्रिशताब्दी जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित “लोकमाता अहिल्याबाई : राष्ट्र पुनरुत्थान की संकल्पना” विषय पर आयोजित 2 दिवसीय अखिल भारतीय सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में सहभागिता की। सत्र को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि पुण्यश्लोका अहिल्याबाई होल्कर भारतीय ज्ञान परम्परा की महानायिका, सुशासन और लोक कल्याण की प्रतिमूर्ति हैं। उनका जीवन, सम्पूर्ण राष्ट्र के उत्थान को समर्पित रहा है। उनके कालखंड में नैतिक सत्ता विद्यमान थी। सामाजिक समरसता, न्याय और सुरक्षा के मजबूत स्तंभ, उनके कृतित्व की पहचान हैं। उनकी लोक समर्पित दृष्टि, दूरदर्शितापूर्ण नीतियां, कूटनीतिक कौशल, लोक कल्याणकारी प्रबंधन और पुरुषार्थ, भारत के गौरवशाली इतिहास को परिलक्षित करते हैं। लोकमाता अहिल्याबाई के जीवन चरित्र के विविध आयामों की वर्तमान संदर्भ में, राष्ट्र के पुनर्निर्माण में उपयोगिता सुनिश्चित करने की आवश्यकता है। मंत्री श्री परमार ने कहा कि लोकमाता अहिल्याबाई का जीवन चरित्र, प्रेरणापुंज है। उन्होंने प्रतिकूल परिस्थितियों में भी उत्कृष्ट प्रबंधन एवं चातुर्य से युद्ध कौशल का प्रकटीकरण किया। आदर्श नैतिक सत्ता के लिए संयुक्त परिवार प्रबंधन को मजबूत करने में लोकमाता अहिल्याबाई का योगदान भी अनुकरणीय है।

उच्च शिक्षा मंत्री श्री परमार ने कहा कि भारत का गौरवशाली इतिहास; शौर्य, पराक्रम, राजकीय पद्धति एवं ज्ञान से समृद्ध रहा है। अतीत के विभिन्न कालखंडों में विदेशी इतिहासकारों द्वारा भारतीय इतिहास का गलत चित्रण किया गया। स्वतंत्रता के कई दशकों बाद भी उन्हीं पदचिह्नों का अनुसरण किया गया। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 ने भारतीय इतिहास के साथ किए गए इस छल से मुक्त होने का सौभाग्यशाली अवसर दिया है। भारत की अपनी शिक्षा नीति में, भारतीय ज्ञान परम्परा का समावेश किया गया है। उन्होंने कहा कि यह भारतीय ज्ञान परम्परा लोकमाता अहिल्या बाई के जीवन चरित्र में राजकीय प्रबंधन, सामाजिक सद्भावना, समरसता और एकात्मकता के विभिन्न आयामों में परिलक्षित होती है। लोकमाता अहिल्या बाई ने भारतीय ज्ञान परम्परा से प्राप्त ज्ञान से प्रकृति के संरक्षण का संकल्प लिया था।

उच्च शिक्षा मंत्री श्री परमार ने कहा कि पर्यावरण के संरक्षण के लिए कृतज्ञता का भाव, परम्परा एवं प्रचलन के रूप में भारतीय समाज में सर्वत्र विद्यमान है। हमारे पूर्वजों ने वैज्ञानिक दृष्टिकोण के आधार पर, भारतीय समाज में परंपराएं एवं मान्यताएं स्थापित की थीं। भारतीय समाज, विशुद्ध रूप से वैज्ञानिक समाज है। हर विधा-हर क्षेत्र में विद्यमान भारतीय ज्ञान को युगानुकुल परिप्रेक्ष्य में वर्तमान वैश्विक आवश्यकतानुरूप, पुनः शोध एवं अनुसंधान कर दस्तावेजीकरण करने की आवश्यकता है। मंत्री श्री परमार ने कहा कि लोकमाता अहिल्याबाई का जीवन न केवल मालवा प्रांत बल्कि संपूर्ण राष्ट्र के लिए समर्पित रहा है। आने वाली पीढ़ी भारतीय ज्ञान परम्परा की महानायिका लोकमाता अहिल्याबाई की राज पद्धति, आदर्श कार्यकाल, न्याय पद्धति, समरसता एवं सद्भाव के साथ समाज संचालन सहित विविध आयामों से प्रेरित हो सकें, इसके लिए भारतीय ज्ञान परम्परा की महानायिका को साहित्य में समृद्ध करने की आवश्यकता है।

इस अवसर पर कैप्टन मीरा सिद्धार्थ दवे, श्री हेमंत मुक्तिबोध, संस्थान के निदेशक प्रो. चन्द्र चारु त्रिपाठी एवं विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलगुरू सहित विविध शिक्षाविद एवं शोधार्थी उपस्थित थे।

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