
इमली का बूटा बेरी का बेर, इमली खट्टी मीठे बेर, इस जंगल में हम दो शेर, चल घर जल्दी हो गयी देर…..
ये पंक्तियां सौदागर फिलिम के दो हीरो जाॅनी फेम राजकुमार और ट्रैजिडी किंग दिलीप कुमार के गाने की हैं जो मस्ती में घूमते हैं और गाते हैं। 
महाराष्ट्र… साॅरी… मुम्बई के भी एक सीमित दायरे…. के दो शेर वहां पर घूमते फिर रहे हैं। इस गाने की एक पंक्ति लागू होती है कि चल घर जंल्दी हो गयी देर…. ये दोनों घूम रहे हैं मस्ती में नहीं चिन्ता में। चिन्ता अपने अस्तित्व की। दोनों ही मिट्टी के शेर रह गये हैं। दोनों राजनीति में ‘चुक’ गये हैं। अपनी साख बचाने के लिये हाथ-पांव चला रहे हैं। मगर अब घर जाकर आराम करने की नौबत दिख रही है।
मुम्बई के उद्धव और राज को पाश्चाताप के लिये वास्तव में देर हो गयी है। अब महानगर पालिका की सत्ता इनसे कोसों दूर हो गयी है।
उद्धव के पिता और राज के चाचा आदरणीय बाला साहब ठाकरे ने जितनी मेहनत की थी और जो उनके तेवर और उसूल थे, उससे महाराष्ट्र ही नहीं सारा हिंदुस्तान प्रभावित था। उतनी मेहनत उद्धव नहीं कर पाएंगे और उसूलों को तो उन्होंने तभी तिलांजलि दे दी थी जब मुख्यमंत्री बनने के लिये कांग्रेस और नेशनल कांग्रेस पार्टी से हाथ मिला लिया था।
मुख्यमंत्री तो वे बन गये पर दुर्गति भी हो गयी। कह सकते हैं कि इन दो शेरों को अब बिल्लियां भी आंख दिखाने लगी हैं।
दूसरी ओर दोनों ही अब बिल्लियों की भी चिरौरी करते नजर आ रहे हैं।
अमित शाह ने साफ नकारा
कांग्रेस-एनसीपी से भी गये
खबर है कि अपनी साख जमाने के लिये उद्धव फिर से भाजपा नेता अमित शाह के शरणागत होने की चहलकदमी करने लगे। लेकिन उद्धव के धोखे से बुरी तरह नाराज शाह ने कार्यकर्ता सम्मेलन में साफ तौर पर घोषणा कर दी कि गद्दारों को माफ नहीं किया जाएगा।
ईधर फिर से मराठी और कट्टरता का सहारा लेने से लगता नहीं कि अब कांग्रेस और शरद पवार एनसीपी उद्धव को गले लगाएंगे।
बिन ताले की चाबी लेकर
फिरते मारे-मारे
सुप्रसिद्ध पत्रकार प्रदीप सिंह ने अपने लेख में कहा कि इन पर ये गाना लागू होता है कि बिन ताले की चाबी लेकर फिरते मारे-मारे।
वास्तविकता तो ये है कि इनके पास सत्ता का ताला खोलने की चाबी भी नहीं है। चाबी के रूप में कोई तो मुद्दा होना चाहिये। दोनों ने ही पहले हिंदुत्व का ढिंढोरा पीटा था। राज को तो सफलता नहीं मिली और उद्धव अपने लालच में पटकनी खा गये।
उद्धव यदि लालच में आकर भाजपा से बगावत नहीं करते तो निस्संदेह अभी सम्मानजनक सत्ता में होते। उनके साथ भाग्य ने बड़ा बुरा किया। सत्ता बीच में चली गयी, पार्टी का निशान छिन गया। पूछ-परख कम हो गयी। अब उनके पास लक्ष्य ताला तो है मगर चाबी यानि मुद्दा नहीं है।
डूबते को तिनके का सहारा
लालच ने बिगाड़ा गेम सारा
अंत में दोनों असफल भाईयों ने अपने-अपने अंजाम की कल्पना कर एक होने का निर्णय लिया। कहते हैं डूबते को तिनके का सहारा। दोनांे डूबते दिखे तो एक दुसरे का हाथ थाम लिया। अब अपनी नाव को ठेलने के लिये पतवार चाहिये तो फिर से मराठी का सहारा लिया। मगर मराठी के नाम पर मराठी न बोलने वालों को पीटना शुरू कर दिया।
पुलिस ने घेर किरकिरा किया आंदोलन
यानि मराठी न बोलने वालों को मारना-डराना चालू किया। पर भूल गये कि अब उनका उतना प्रभाव नहीं रहा और इनका बहुत अच्छा विकल्प भाजपा के रूप में पहले की जनता स्वीकार कर चुकी है। इसके अलावा जनता को ये समझ में आ गया है कि अलगाव और घृणा को आधार बनाकर समाज को सुखी नहीं बनाया जा सकता।
और फिर दोनांे भाईयों का डर भी समाप्त हो गया है। दोनो राजनैतिक रूप से दमदार नहीं रहे। इसलिये उनके दादागिरी करने वाले सहयोगियों को पकड़ने में सरकारी महकमें ने कोई कोताही या संकोच नहीं किया। अब सहयोगी भी खुद को लावारिस और ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।
कुल मिलाकर पिक्चर पूरी तरह साफ है। महानगर पालिका के चुनावांे के लिये मारे जा रहे हाथ-पैर किसी सम्मानजनक मुकाम तक पहुंचा देंगे इसमें संदेह है।
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जवाहर नागदेव, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, चिन्तक, विश्लेषक
मोबा. 9522170700
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