
शराब हर दल के लिये वरदान है। इसलिये हर कोई इसके आगे दण्डवत रहता है। बस जो सत्ता में है वो इस पर प्रायः मौन समर्थन में दिखता है और जो सत्ता मे नहीं उसे शराब से घर बरबाद होता दिखता है।
हर कोई किसी को भी पटाने के लिये शराब का सहारा लेता है। जनता को पटाने के लिये विपक्षी कांग्रेस ने शराब के विरोध का दिखावा किया।
पूर्व विधायक विकास उपाध्याय के नेतृत्व में सरकार का व्यंग्यात्मक विरोध करते हुए शराब खरीदने वालों को माला पहना कर स्वागत किया और चखने के रूप में मिक्स्चर मुफ्त में दिया। खबर पढ़कर कईयों ने सोचा होगा कि ‘काश हम भी वहां होते शराब खरीदने के लिये…. ’
किताबें कबाड़ में, कबाड़ी पकड़ाया,
सरकारी को माफी
खबर है कि एक कबाड़ी को पाठ्य पुस्तक निगम की डेढ़ क्विंटल किताबें बेच दी गयीं। ये किताबें पुरानी नहीं थीं धरसींवा विधानसभा क्षेत्र में किसी स्कूल की किताबें 5 जून को एक कबाड़ी के पास पकड़ाईं।
जाहिर है गैर कानूनी काम है तो कबाड़ी भी पकड़ाया और जैसी कि परम्परा रही है चालू किताबों को कबाड़ में बेचने वाले को नहीं पकड़ा गया, समझ गये न, सरकारी आदमी जो था। सरकारी को सजा होती है भला कभी।
खुलेआम रिश्वत खाता है। रिश्वत देने वाले को सूली पर चढ़ा दिया जाता है और रिश्वत लेने वाले को…. जांच जारी है।
अस्पताल की अकड़
मां की मौत
रावांभाठा अस्पताल की लापरवाही से मां की मौत हो गयी । परिवार को बच्ची के जन्म की खुशी अभी मनाई भी नहीं थी कि स्टाफ की लापरवाही और गलत इंजेक्शन के चलते मां की अकाल मृत्यु हो गयी।
9/10 जून की रात डिलीवरी के बाद करीब 1 बजे मां की तबियत बिगड़ी तो उसने दर्द की शिकायत की। उस समय कोई डाॅक्टर नहीं था और मेल नर्स था जिसने इसे बहाना बताया और घोर लापरवाही का परिचय दिया।
अंततः बेहद अनुनय-विनय के बाद उसने डाॅक्टर को तो नहीं बुलाया स्वयं ही इंजेक्शन लगा दी। मां की जान चली गयी और बच्ची के आगमन से खुशी मना रहा परिवार घोर शोक में डूब गया।
चीफ मेडीकल आॅफिसर डाॅ मिथिलेश चौधरी ने लापरवाही स्वीकारी और जवाबदारों की सजा देने की बात कही, हमेशा की तरह….. । बातें तो बातें हैं बातों का क्या…. ?
बेईमान को जेल नहीं
केवल स्थान परिवर्तन
यही परम्परा है। सरकारी के लिये बातें होती हैं सजा नहीं। चाहे किताबों की दुर्गति होती हो चाहे किसी की मौत हो जाए।
सरकारी आदमी को पहले तो मजा मिलता है फिर पोल खुलने पर भी सजा नहीं मिलती। अधिक से अधिक उसे आॅफिस अटैच कर दिया जाता है।
8 जून की ही एक खबर है कि ग्राम पंचायत कमरगा विकासखण्ड लैलूंगा का पटवारी एक शख्स से खुलेआम पैसे ले रहा है ऐसा वीडियो प्रचारित हुआ। जिसे एसडीएम अक्षा गुप्ता को पहुंचाया गया तो एसडीएम ने इसे भ्रष्टाचार होना पाया।
जानकर आश्चर्य होगा कि पटवारी को जेल भेजने के बजाए तहसील कार्यालय में अटैच कर दिया।
क्या ये कोई सजा है ? क्या रिश्वत खाने वाले को जेल नहीं भेजा जाना चाहिये ?
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जवाहर नागदेव, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, चिन्तक, विश्लेषकमोबा. 9522170700‘बिना छेड़छाड़ के लेख का प्रकाशन किया जा सकता है’
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