
भारत में विदेशी चंदे के नियमन से जुड़े एफसीआरए संशोधन विधेयक (Foreign Contribution Regulation Act) को लेकर संसद में बहस तेज है. इस बिल पर अमेरिकी कांग्रेस सदस्य रिले मूर ने अपनी प्रतिक्रिया दी है. मूर का आरोप है कि नए प्रावधानों से सरकार को चर्चों और धार्मिक संस्थाओं की गतिविधियों और उनकी संपत्तियों पर अधिक नियंत्रण मिल सकता है. मूर ने FCRA को ईसाई समुदाय पर सीधा हमला करार देते हुए कहा कि यह भारत और अमेरिका के बीच एक द्विपक्षीय मुद्दा बन सकता है.
सोशल मीडिया पर जताई चिंता
रिले मूर ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर भारत में ईसाई धर्म के पुराने इतिहास का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि संत थॉमस के मालाबार तट पहुंचने के बाद से भारत में ईसाई समुदाय की मौजूदगी रही है. इसके बाद उन्होंने आरोप लगाया कि प्रस्तावित संशोधन सरकार को चर्चों और धार्मिक चैरिटी संस्थाओं से जुड़ी संपत्तियों के प्रबंधन में हस्तक्षेप करने का अधिकार दे सकते हैं.
FCRA कानून क्या है?
विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम यानी FCRA भारत में विदेशी चंदा प्राप्त करने और उसका उपयोग करने वाली संस्थाओं पर लागू होता है. इनमें गैर-सरकारी संगठन, धर्मिकथ ट्रस्ट, शैक्षणिक संस्थान और अन्य संगठन शामिल हैं. मौजूदा व्यवस्था के तहत विदेशी चंदा लेने के लिए किसी संस्था को केंद्रीय गृह मंत्रालय से पंजीकरण कराना पड़ता है. यह पंजीकरण पांच साल के लिए मान्य होता है और इसके बाद इसे रिन्यू कराना जरूरी होता है.
प्रस्तावित संशोधनों में क्या बदलाव हैं?
विधेयक में एक नामित प्राधिकरण बनाने का प्रस्ताव है. इसका गठन केंद्र सरकार करेगी. यदि किसी संस्था का FCRA पंजीकरण रद्द हो जाता है, उसकी अवधि खत्म हो जाती है या संस्था खुद पंजीकरण वापस कर देती है, तो यह प्राधिकरण विदेशी चंदे और उससे बनाई गई संपत्तियों का प्रबंधन संभाल सकेगा.
2026 के संशोधित FCRA नियमों में प्रमुख बदलाव
- पंजीकरण प्रमाणपत्र में संस्था को अपने काम का सटीक उद्देश्य बताना होगा.
- संस्था किन राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों में काम करेगी, इसका साफ-साफ जिक्र करना होगा.
- संस्था के कार्य का उद्देश्य अब किसी व्यापक श्रेणी के बजाय तय अनुसूची में दिए गए विकल्पों से चुना जाएगा.
- FCRA पंजीकरण के रिन्यू के लिए संस्था को दिखाना होगा कि उसने पिछले दो सालों में कम-से-कम 10 लाख रुपये का विदेशी अंशदान इस्तेमाल किया है.
- संस्था को यह बताना होगा कि विदेशी धन किस परियोजना और किस गतिविधि पर खर्च किया गया.
- विदेशी अंशदान देने वाले वास्तविक या अंतिम दाता का पूरा विवरण देना अनिवार्य होगा.
- संस्था को अपनी वेबसाइट और सोशल मीडिया खातों की पूरी जानकारी वार्षिक रिपोर्ट में शामिल करनी होगी.
किस प्रावधान पर हो रहा सबसे अधिक विवाद?
सबसे अधिक आपत्ति नामित प्राधिकरण को दिए जाने वाले अधिकारों पर जताई जा रही है. विपक्षी दलों, गैर-सरकारी संगठनों और नागरिक समाज से जुड़े समूहों का कहना है कि इससे केंद्र सरकार को विदेशी धन पर निर्भर संस्थाओं पर बहुत अधिक नियंत्रण मिल सकता है. धार्मिक संस्थाओं को आशंका है कि अगर उनका पंजीकरण रद्द हुआ या उसका रिन्यू नहीं हुआ, तो विदेशी सहायता से बनाए गए स्कूल, अस्पताल, सामाजिक सेवा केंद्र और दूसरी संपत्तियां सरकारी प्रबंधन में जा सकती हैं.
सरकार ने क्या कहा?
सरकार ने प्रस्तावित बदलावों का बचाव किया है. केंद्र सरकार का कहना है कि इनका उद्देश्य विदेशी धन के इस्तेमाल में पारदर्शिता बढ़ाना, निगरानी व्यवस्था मजबूत करना और संस्थाओं की जवाबदेही तय करना है. सरकार के अनुसार, विदेशी चंदे का उपयोग तय उद्देश्यों के लिए हो और धन के दुरुपयोग को रोका जा सके, इसके लिए नियमों को सख्त करना जरूरी है.






