
मुन्नाभाई एमबीबीएस, इसमें हीरो संजय दत्त झूठमूठ का डाॅक्टर बनता है क्योंकि उसके पिता सुनील दत्त आने वाले थे जिन्हें उसने अपने डाॅक्टर होने की झूठी बात कही थी।
मजेदार ये है कि झूठे डाॅक्टर के लिये एक झूठा अस्पताल भी बनाया जाता है और अस्पताल के लिये झूठे मरीज भी भर्ती किये जाते हैं। वहां पर धोबीघाट था जहां से सारे धोबियों को पलंग पर लिटाकर बीमार बता दिया जाता है।
शायद वहीं से प्रेरणा लेकर भिलाई और छत्तीसगढ़ के कई अस्पतालों में झूठमूठ के मरीज भर्ती किये गये औैर उनके आयुष्मान कार्ड से पैसे निकालने की धोखाधड़ी की गयी। मजे की बात ये है कि इस काम के लिये उड़ीसा से स्वस्थ लोगों को लाकर भर्ती किया जाता।
अस्पतालों की कमाई हो जाती और भर्ती स्वस्थ लोगों की पिकनिक। मजा तो तब आया जब इस सुगबुगाहट के बाद भिलाई के एक अस्पताल से 24 लोगों को एक साथ डिस्चार्ज कर दिया गया। स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने इसे गम्भीरता से लिया है।
अस्पतालों में लालच,
लापरवाही का ये भी रूप
अस्पताल में ऐसी हेराफेरी भी सामने आई है। एक नर्स ने पत्थलगांव के सिविल अस्पताल में एक मजदूर की नवजात बच्ची को कोरबा के निसंतान दंपत्ति को बेच दिया और बच्ची के इलाज के लिये उसे कहीं और ले जाने के बहाने उसके माता-पिता से साईन भी करवा लिये।
पता चला कि वो कागजात इलाज के नहीं बल्कि गोदनामा था।
बेहद दुखद एक और घटना जानना जरूरी है कि प्रतापपुर के झलगी से एक मरीज को 25 किलोमीटर दूर से पैदल अस्पताल तक लाया गया। जी हां 25 किलोमीटर से पैदल। लेकिन मरीज के परिजन तब निराश हो गये जब उन्हें कोई उचित इलाज वहां पर होता नहीं दिखा। जब निराश परिजन बिना किसी से कुछ कहे वहां से चले गये तब हड़कम्प मचा।
यहां सूरजपुर की ज़िला अस्पताल की चर्चा भी आवश्यक है जहां गर्भवती को समय पर अस्पताल पहंुचा देने के बाद भी इलाज सिर्फ इसलिये नहीं हो सका कि कोई डाॅक्टर या नर्स समय पर नहीं पहुंचे और तीन घंटे तक तड़पने के बाद पीड़िता ने दम तोड़ दिया।
और जब डाॅक्टर आया तो मृत्यु हो जाने के बाद भी पीड़िता को अंबिकापुर मेडीकल काॅलेज रेफर कर दिया। प्रदेश में चारों तरफ ऐसा ही माहौल है डाॅक्टर पूरी तरह अमानवीय और निरंकुश हो गये हैं।
हालात ये हैं कि कांसाबेल के स्वास्थ्य केंद्र में डाॅक्टर अनिल भगत को शराब के नशे मे अस्पताल में जमीन पर लोटपोट होते देखा गया जिसका वीडियों भी वायरल हुआ।
निस्संदेह सरकार को स्वास्थ्य सेवाओं में लापरवाही को बेहद गम्भीरता से लेना चाहिये।
चुनाव के दो साल बाद विधायकी रद्द
बेहद दिलचस्प खबर है कि एक विधायक को चुनाव जीते दो साल हो गये लेकिन दो साल के बाद माननीय न्यायालय के आदेश से उसकी विधायकी रद्द कर दी गयी।
कभी-कभार किसी चुनाव के खिलाफ याचिका लगाई जाती है, ये कोई नयी बात नहीं है। इसमें नया ये है कि समय बहुम कम लगा अन्यथा तो सुनवाई इतना लंबा चलती है और फैसला इतनी देर से आता है कि तब तक विधायकजी का कार्यकाल ही पूरा हो जाता है।
और ऐसे में उस याचिका का कोई अर्थ नहीं रह जाता और प्रार्थी को न्याय नहीं मिल पाता। कदाचित् बरसों बाद ऐसा हुआ है कि फैसला समय पर आया है जिसे न्याय कहा जा सकता है।
कर्नाटक के कोलार ज़िले के मालूर विधानसभा सीट में चुनाव हारे भाजपा प्रत्याशी ने विजित कांग्रेस विधायक के खिलाफ वोटों की गिनती में गड़बड़ी का आरोप लगाते हुए याचिका दायर की थी जिसमें कर्नाटक उच्च न्यायालय ने ये निर्णय दिया।
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जवाहर नागदेव, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, चिन्तक, विश्लेषक
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‘बिना छेड़छाड़ के लेख का प्रकाशन किया जा सकता है’








